पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव से बहुत दिलचस्प ट्रेंड निकल कर आ रहा है। एक ट्रेंड की चर्चा सोशल मीडिया में भी बहुत हो रही है। वह ट्रेंड है कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस के मुस्लिम विधायकों का। इससे आगे की राजनीति की तस्वीर भी जाहिर हो रही है। 20 फीसदी या उससे ज्यादा मुस्लिम आबादी वाले राज्यों में क्या होने वाला है यह इससे पता चल रहा है। परिसीमन के बाद यह ट्रेंड स्थायी होगा। साफ दिख रहा है कि ऐसे राज्यों में भाजपा विरोधी पार्टियों के पास सिर्फ मुस्लिम विधायक बचेंगे। यह बहुत स्वाभाविक तरीके से होगा लेकिन उसके बाद भाजपा पूरे देश में इसे इस रूप में पेश करेगी, जैसे ये पार्टियां सिर्फ मुसलमानों को टिकट देती हैं या इन पार्टियों को सिर्फ मुसलमान वोट देते हैं, जबकि यह अधूरा सच होगा। लेकिन राजनीति में सच की किसको परवाह है!
बहरहाल, पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी के 80 विधायक जीते हैं, जिसमें से 33 विधायक मुस्लिम हैं। सोचें, ममता बनर्जी ने 294 सदस्यों की विधानसभा में 47 मुस्लिम उम्मीदवार उतारे थे। यह संख्या पिछली बार से सात कम है। उन 47 में से 33 उम्मीदवार जीते हैं। ममता बनर्जी के कुल विधायकों में साढ़े 42 फीसदी विधायक मुस्लिम हैं। इसे ऐसे प्रचारित किया जा रहा है कि ममता के आधे विधायक मुसलमान हैं। पश्चिम बंगाल में कांग्रेस के दो विधायक जीते हैं और दोनों मुस्लिम हैं। लेफ्ट का एक विधायक जीता है और वह भी मुस्लिम है।
असम के कांग्रेस विधायकों की चर्चा बहुत हो रही है। वहां कांग्रेस 19 सीटों पर जीती है, जिसमें से 18 मुस्लिम हैं। ऐसा इसलिए हुआ है क्योंकि असम में परिसीमन के बाद विधानसभा सीटों की भौगोलिक संरचना ऐसी बनाई गई कि चुनिंदा क्षेत्रों में मुस्लिम आबादी ज्यादा सघन हो जाए। पहले असम में 40 के करीब सीटें थीं, जहां मुस्लिम निर्णायक होते थे। लेकिन अब ऐसी सीटों की संख्या 20 के करीब कर दी गई है। इन सीटों पर अब कोई न कोई मुस्लिम ही जीतेगी। इसलिए भाजपा इन पर ध्यान नहीं देती है।
