रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने प्रादेशिक सेना को ‘नागरिक-सैनिक’ सहयोग की अवधारणा का जीता-जागता उदाहरण बताते हुए कहा है कि ‘विकसित भारत’ के विज़न को आगे बढ़ाने में इसकी भूमिका महत्वपूर्ण है। श्री सिंह ने राष्ट्रीय सुरक्षा, आपदा राहत, पर्यावरण संरक्षण और समाज सेवा में बल की दोहरी भूमिका पर जोर दिया। श्री सिंह ने गुरुवार को यहां रक्षा मंत्रालय की संसदीय सलाहकार समिति की बैठक की अध्यक्षता की, जिसमें प्रादेशिक सेना पर विस्तार से चर्चा हुई। वरिष्ठ अधिकारियों ने सदस्यों को बल के काम, भूमिका और उपलब्धियों के बारे में जानकारी दी, जबकि समिति के सदस्यों ने इसकी कार्यक्षमता को और बढ़ाने के लिए सुझाव दिये।
रक्षा मंत्री ने कहा कि प्रादेशिक सेना प्रशिक्षित कर्मियों का रिजर्व तैयार करके सशस्त्र बलों के लिए ‘सर्ज कैपेसिटी’ (जरूरत पड़ने पर अतिरिक्त क्षमता) बनाती है, जिन्हें जरूरत पड़ने पर तुरंत तैनात किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि नागरिक जीवन में लौटने के बाद, इसके सदस्य समाज और सेना के बीच एक पुल का काम करते हैं और खासकर युवाओं को सशस्त्र बलों में शामिल होने के लिए प्रेरित करते हैं।
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प्रादेशिक सेना को 59 इकाईयों में लगभग 44,400 कर्मियों वाला एक प्रशिक्षित और प्रेरित बल बताते हुए श्री सिंह ने कहा कि यह प्राकृतिक आपदाओं के दौरान सबसे पहले मदद करने वाले बल के रूप में उभरा है। इसने केरल में बाढ़, ओडिशा में चक्रवात और हाल ही में असम में आई बाढ़ के दौरान राहत, बचाव और चिकित्सा सहायता प्रदान की।
पर्यावरण संरक्षण में इसके योगदान की सराहना करते हुए, उन्होंने कहा कि प्रादेशिक सेना की इकोलॉजिकल टास्क फोर्स ने लगभग 10 करोड़ पौधे लगाए हैं, जिनके जीवित रहने की दर 80-85 प्रतिशत है। इससे प्रधानमंत्री के ‘मिशन लाइफ़’ और ‘पंचामृत’ लक्ष्यों को हकीकत में बदलने में मदद मिली है। उन्होंने जम्मू-कश्मीर में ‘हर घर तिरंगा’ अभियान को नई ऊंचाइयों तक ले जाने में इसकी भूमिका की भी सराहना की।
बैठक में रक्षा राज्य मंत्री संजय सेठ, प्रमुख रक्षा अध्यक्ष जनरल एनएस राजा सुब्रमणि, सेना प्रमुख जनरल धीरज सेठ, रक्षा सचिव राजेश कुमार सिंह और अन्य वरिष्ठ अधिकारी मौजूद थे।
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