मुद्दा दलगत नहीं है

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मुद्दा संसदीय गतिरोध नहीं, बल्कि सड़कों पर खड़ा हो रहा गतिरोध है। सरकार को इसे समझने की संवेदनशीलता दिखानी चाहिए। मुद्दे को दलगत दायरे में समेटने का नजरिया जोखिम भरा साबित हो सकता है।

मुद्दा शिक्षा व्यवस्था से जुड़ा है, लेकिन सरकार ने अपना पक्ष रखने की जिम्मेदारी स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्री को सौंपी। उधर अपनी प्रेस कांफ्रेंस में जेपी नड्डा ने कॉकरोच आंदोलन की मांगों पर चर्चा करने के बजाय संसदीय गतिरोध दूर करने के लिए विपक्ष के सामने प्रस्ताव रखा। कहा कि नीट और अन्य परीक्षाओं में ‘वर्तमान एनडीए एवं पूर्व यूपीए सरकारों के दौरान हुई’ पेपर लीक की घटनाओं पर सरकार संसद में पूरी चर्चा के लिए तैयार है। स्पष्टतः इस मुद्दे को उन्होंने दलगत रंग दिया। मतलब सरकार चाहती है कि सड़क पर उठ रहे सवालों को दरकिनार कर सत्ता पक्ष और विपक्ष पेपर लीक एवं परीक्षा व्यवस्था ध्वस्त के प्रश्नों पर आपसी तू तू-मैं मैं का साया डाल दें!

और अगर विपक्ष ऐसा करने के लिए तैयार नहीं होता है, तो संसदीय गतिरोध की जिम्मेदारी उसके माथे पर डाली जाए। बहरहाल, विपक्षी दल इतना तो शायद समझते ही हैं कि युवा मन की उथल-पुथल को नजरअंदाज करना उनके लिए अपनी प्रासंगिकता को दांव पर लगाना होगा। तो विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने यह साफ कर दिया है कि कॉकरोच आंदोलन की इन तीन मांगों को मानना गतिरोध तोड़ने की पूर्व शर्त हैः शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान इस्तीफा दें, दिल्ली में 20 जुलाई को ‘शांतिपूर्ण’ प्रदर्शनकारियों पर हुए ‘जुल्म’ की जवाबदेही तय की जाए, और प्रधानमंत्री छात्रों से माफी मांगें।

देश में युवा असंतोष के इजहार से जिस तरह की सूरत बन रही है, सरकार के लिए इन मांगों को मान लेना बुद्धिमानी की बात होगी। 20 जुलाई को राजधानी में लाठी चार्ज, आंसू गैस और कथित रूप से पैलेट गन के इस्तेमाल की खबरों ने युवा आक्रोश को और भड़काया है। दिल्ली हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट की कुछ टिप्पणियों ने मरहम लगाने के बजाय विपरीत प्रतिक्रिया पैदा की है। ऐसे में मुख्य मुद्दा संसदीय गतिरोध नहीं, बल्कि सड़कों पर खड़ा हो रहा गतिरोध है। सरकार को इस स्थिति को समझने की संवेदनशीलता दिखानी चाहिए। सड़क पर के गतिरोध का समाधान फिलहाल उसकी प्राथमिकता होनी चाहिए। मुद्दे को दलगत दायरे में समेटने का नजरिया जोखिम भरा साबित हो सकता है।


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