ढांचागत बदलाव की ओर

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चूंकि यूएई अब स्वतंत्र रूप से तेल का उत्पादन और बिक्री करेगा, अतः खरीदार देशों के पास सौदेबाजी के लिए ओपेक में बचे 11 और ओपेक+ के 22 देशों के अतिरिक्त भी एक विकल्प उपलब्ध हो जाएगा।

 ईरान और अमेरिका- इजराइल के युद्ध से दुनिया- खास कर पश्चिम एशिया में- कई तरह के ढांचागत बदलावों के संकेत उभरे हैं। उस दिशा में पहली ठोस खबर संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) के तेल उत्पादक देशों के संगठनों ओपेक एवं ओपेक+ से अलग होने के रूप में आई है। यूएई के इस फैसले का अर्थ है कि विश्व तेल बाजार अब पहले जैसा नहीं रह जाएगा। मासिक उत्पादन का कोटा तय कर मूल्य नियंत्रित करने की इन संगठनों की ताकत को अब तगड़ा झटका लगा है। इसका सबसे खराब असर सऊदी अरब पर पड़ेगा, जो ओपेक की धुरी रहा है।

चूंकि यूएई अब स्वतंत्र रूप से तेल का उत्पादन और बिक्री करेगा, अतः खरीदार देशों के पास सौदेबाजी के लिए ओपेक में बचे 11 और ओपेक+ के 22 देशों के अतिरिक्त भी एक विकल्प उपलब्ध हो जाएगा। अमेरिका के एक बड़े तेल उत्पादक के रूप में उभरने और वेनेजुएला के तेल भंडारों पर उसका कब्जा होने के बाद ओपेक+ ढांचे के अलावा पहले ही एक बड़े विक्रेता के रूप में वह मौजूद हो चुका है। कयास है कि यूएई अमेरिका से तालमेल कर तेल की कीमतें तय करेगा। इससे तेल बाजार पर अमेरिका की पकड़ मजबूत होगी। बहरहाल, तेल बाजार में आ रहे इस ढांचागत बदलाव के साथ-साथ विभिन्न देशों के ऊर्जा बास्केट में भी बड़े परिवर्तन के अनुमान हैं।

इनके मुताबिक इस बास्केट में ग्रीन एनर्जी, परमाणु ऊर्जा, और कोयला की जगह बढ़ने जा रही है। इससे दीर्घकाल में कच्चे तेल की मांग में गिर सकती है। इस संभावना को लेकर बड़ी तेल कंपनियां चिंतित हैं। फिर पश्चिम एशिया- खास कर खाड़ी क्षेत्र के समीकरणों में भी बदलाव की ठोस गुंजाइशें हैं। वहां अनेक देशों में ईरान के साथ सुरक्षा समझौते की संभावनाओं पर चर्चा हो रही है। इसके साथ ही तेल, गैस, एवं अन्य कारोबार की मुद्रा में क्रमिक परिवर्तन अब ठोस रूप ग्रहण कर रह है। चीन की मुद्रा युवान को डॉलर का विकल्प मानने की प्रवृत्ति बढ़ रही है। ये सारे बुनियादी परिवर्तन हैं। इनके ठोस आकार लेने के बाद दुनिया 28 फरवरी के पहले जैसी नहीं रह जाएगी।


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