गहरी समस्या, सतही सोच

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तेलंगाना विधानसभा ने ‘कर्मचारी उत्तरदायित्व एवं माता-पिता की सहायता निगरानी अधिनियम बिल-2026’ को मंजूरी दे दी है। इसमें प्रावधान है कि राज्य में सरकारी या निजी क्षेत्र के जो कर्मचारी अथवा जन प्रतिनिधि अपने माता-पिता की देखभाल नहीं करेंगे, उनकी तनख्वाह में से 15 प्रतिशत या 10,000 रुपये (इनमें जो कम होगा) काट कर उसे उनके माता-पिता को दे दिया जाएगा। राज्य सरकार का दावा है कि इस तरह वह 2007 में माता- पिता तथा वरिष्ठ नागरिकों की देखभाल एवं कल्याण के लिए बने केंद्रीय कानून से आगे गई है। इस तरह उसने अपना “सामाजिक दायित्व” निभाया है। मगर यह “सामाजिक दायित्व” निभाने से कहीं ज्यादा निभाते हुए दिखने का प्रयास भर है।

एक समस्या यह है कि राज्य सरकार की सारी चिंता संगठित क्षेत्र में मौजूद कर्मचारियों के माता-पिता तक सीमित रह गई है। राज्य की कुल श्रम शक्ति में बमुश्किल 20 फीसदी कर्मचारी औपचारिक क्षेत्र में हैं। तो अनौपचारिक क्षेत्र के कर्मियों के माता-पिता की देखभाल कैसे होगी? वैसे भी पारिवारिक या सामाजिक जिम्मेदारी को निभाने के लिए किसी बाध्य करना समस्याग्रस्त सोच है। जो कठिनाइयां सामाजिक एवं पारिवारिक व्यवस्था में बुनियादी बदलाव से खड़ी हुई हैं, उनका अतीत से प्रेरित दृष्टिकोण से समाधान ढूंढना निरर्थक प्रयास है। तेलंगाना सरकार को ये कदम उठाने से पहले समीक्षा करनी चाहिए थी कि 2007 के केंद्रीय कानून से क्या हासिल हुआ? तब उसके सामने स्पष्ट होता कि बुजुर्गों की ऐसी देखभाल के लिए अलग उपायों की जरूरत है, जिससे वे आत्म-सम्मान के साथ जी सकें।

राज्य सरकार तेलंगाना में आधुनिक सुविधाओं एवं चिकित्सा की उत्तम व्यवस्था के साथ सरकारी क्षेत्र में वृद्धावस्था आश्रमों का जाल बिछाने का फैसला करती, तो वह सारे देश के लिए एक मिसाल पेश कर सकती थी। इसके लिए प्रगतिशील कराधान से धन जुटाने की पहल सही सोच होती। लेकिन उसने जबरन तनख्वाह काट कर नकदी माता- पिता को देने का जो नजरिया अपनाया है, उससे वृद्धों को उपेक्षित जिंदगी जीने की समस्या से नहीं बचाया जा सकेगा। इस सतही प्रयास का अधिक से अधिक सीमित लाभ ही होगा। स्पष्टतः यह “सामाजिक दायित्व” की संकुचित समझ की मिसाल है।


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