बच्चों को बचाना जरूरी

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कोर्ट ने पाया कि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स ने एडिक्टिव डिजाइन फीचर्स बनाए। बच्चों पर उनके संभावित दुष्प्रभाव के बारे में उन्होंने पूर्व चेतावनी नहीं दी। इस कारण कोर्ट ने उन पर लगभग 60 लाख डॉलर का जुर्माना लगाया है।

सोशल मीडिया कंपनियों ने अपने प्लैटफॉर्म पर जानबूझ कर ऐसी तकनीकी व्यवस्था की है, जिससे यूजर्स को उन पर बने रहने की लत लग जाती है। खासकर बच्चों को इससे गहरा नुकसान हो रहा है। अमेरिका में कैलिफ़ोर्निया की एक अदालत ने पिछले हफ्ते इस संबंध में एक दूरगामी महत्त्व का फैसला दिया। उसमें सोशल मीडिया कंपनियों मेटा (इंस्टाग्राम) और गूगल (यूट्यूब) को बच्चों और किशोरों के मानसिक स्वास्थ्य हानि पहुंचाने का दोषी ठहराया गया। कोर्ट ने पाया कि इन प्लेटफॉर्म्स ने एडिक्टिव डिजाइन (लत डालने वाले) फीचर्स बनाए। बच्चों पर उनके हो सकने वाले दुष्प्रभाव के बारे में उन्होंने कोई पूर्व चेतावनी नहीं दी। इस कारण कोर्ट ने उन कंपनियों पर लगभग 60 लाख डॉलर का जुर्माना लगाया है।

यह फैसला एक 20 वर्षीय महिला की याचिका पर आया, जिसने बताया कि बचपन से ही इंस्टाग्राम और यूट्यूब के उपयोग ने उसके जीवन पर खराब असर डाला और उसकी मानसिक स्वास्थ्य समस्याएं बढ़ाईं। इस फैसले को सोशल मीडिया कंपनियों के लिए पहला बड़ा कानूनी झटका माना गया है। विशेषज्ञों के मुताबिक अब मेटा और गूगल जैसी कंपनियों पर अपने प्लेटफॉर्म डिजाइन बदलने और उन्हें बच्चों के लिए सुरक्षित बनाने के लिए दबाव बढ़ेगा। मगर ये बात अमेरिका के अंदर की है। बाहर में जब कभी किसी देश ने इन कंपनियों पर लगाम लगाने की कोशिश की है, अमेरिका सरकार अपनी कंपनियों के बचाव में आ खड़ी हुई है।

डॉनल्ड ट्रंप के शासनकाल में यह प्रवृत्ति अधिक आक्रामक नजर आई है। विनियमन की यूरोपियन यूनियन की कोशिश के खिलाफ ट्रंप खुद मोर्चा संभाले रहे हैँ। इसके बावजूद ऑस्ट्रेलिया ने सोशल मीडिया तक बच्चों की पहुंच रोकने के ठोस कदम उठाए हैँ। भारत में भी ऐसी चर्चा हाल में तेज हुई है। कर्नाटक सरकार ने इस दिशा में पहल की है। मगर जब ऐसा कदम केंद्र के स्तर पर नहीं उठाया जाता, उसके प्रभावी होने की संभावना नहीं है। अतः नरेंद्र मोदी सरकार को कम-से-कम इस मामले में अमेरिकी दबाव की परवाह ना करते हुए ठोस वैधानिक पहल करनी चाहिए। बच्चों को सिर्फ कंज्यूमर समझने वाली कंपनियों को विनियमित करने की अति-आवश्यकता है।


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