यूरोप की बेचारगी

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ग्रीनलैंड मामले में हकीकत यह है कि सब कुछ डॉनल्ड ट्रंप पर निर्भर है। अगर उनके अमेरिका फर्स्ट की सोच में अपने सहयोगी देशों को निगलना भी शामिल है, तो फिर उन्हें कैसे रोका जाएगा, यह साफ नहीं है। 

ग्रीनलैंड को अमेरिका में मिलाने के डॉनल्ड ट्रंप के जुनून से यूरोप में गुस्सा तो फैला है, लेकिन एक किस्म की लाचारी का अहसास भी वहां है। यूरोपीय नेता जानते हैं कि ट्रंप अपने इरादे पर अड़े रहे, तो उन्हें रोकना आसान नहीं होगा। इसलिए आठ यूरोपीय देशों के नेताओं के डेनमार्क से एकजुटता जताने और यूरोप-अमेरिका के संबंधों पर खराब असर की चेतावनी देने का व्यावहारिक मतलब कम ही है। ग्रीनलैंड मुद्दे पर अमेरिका का विरोध कर रहे देशों के ऊपर 10 फीसदी टैरिफ लगाने के ट्रंप के एलान के बाद जारी साझा बयान में इन नेताओं ने उपरोक्त बातें कही हैं। उधर यूरोपियन यूनियन की विदेश नीति प्रमुख काया केलास ने चीन और रूस का खतरा दिखाते हुए ट्रंप प्रशासन का विवेक जगाने की कोशिश की है।

बहरहाल, सवाल यही है कि ट्रंप ने अपना रुख नहीं बदला, तो यूरोप क्या करेगा? दूसरे विश्व युद्ध के बाद अमेरिका ने अपनी खास योजना- मार्शल प्लान- के तहत यूरोप को ढाला। नतीजतन, उसकी सुरक्षा के सूत्र हमेशा अमेरिका के हाथ में रहे। आज भी पूरे यूरोप में लगभग 76,000 अमेरिकी सैनिक तैनात हैं। यूरोप के 80 प्रतिशत तक हथियार अमेरिकी कंपनियां सप्लाई करती हैँ। जिस नॉर्थ अटलांटिक ट्रीटी ऑर्गनाइजेशन (नाटो) के भरोसे यूरोप के देश सुरक्षित रहते आए हैं, उनका निर्विवाद नेता अमेरिका है। 1990 के दशक के बाद यूरोप की वित्तीय व्यवस्था भी अभिन्न रूप से अमेरिका से जुड़ गई। तब अमेरिकी मंशा से अलग निर्णय लेने की यूरोप की रणनीतिक स्वतंत्रता और सिकुड़ गई। इस दौर में अमेरिका का पिछलग्गू बन कर यूरोप ने अपना नैतिक बल और भी गंवा दिया।

मसलन, ताजा प्रकरणों को ही देखें, तो एक संप्रभु देश- वेनेजुएला- के राष्ट्रपति के अपहरण पर अगर-मगर भरा रुख अपनाने के बाद ग्रीनलैंड मुद्दे पर यूरोपीय नेता जब डेनमार्क की संप्रभुता का समर्थन करते हैं, तो बाकी दुनिया को उनकी बातें विडंबनाभरी नजर आती हैँ। इसीलिए हकीकत यह है कि सब कुछ ट्रंप पर निर्भर है। अगर उनके अमेरिका फर्स्ट की सोच में अपने सहयोगी देशों को निगलना भी शामिल है, तो फिर उन्हें कैसे रोका जाएगा, यह साफ नहीं है।


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