रिश्तों की खामोशी, अवसाद की चीख

हमें फिर से ‘ठहरना’ सीखना होगा। बिना मोबाइल के, बिना किसी एजेंडा के। हमें फिर से पूछना होगा, “कैसे हो?” …रिश्ते समय मांगते हैं, उपस्थिति मांगते हैं, और सबसे बढ़ कर। साथ मांगते हैं। समय भी। यदि हम यह नहीं कर पाए, तो आने वाले समय में अवसाद केवल एक चिकित्सकीय समस्या नहीं रहेगा, बल्कि… Continue reading रिश्तों की खामोशी, अवसाद की चीख

उपजाऊ भूमि का विनाश क्यों ?

अणुबम से भी घातक कैमिकल्स, कीटनाशक दवाएं, रासायनिक खाद व जहरीली दवाओं के अमर्यादित प्रयोग से भूमि बंजर बन रही हैं। साथ ही साथ उद्योगों से निकला प्रदूषित जल वाष्पित होकर ऊपर जाता है। फिर प्रदूषित एवं क्षारीय जल की वर्षा से भूमि पूर्णतया बंजर बन रही है। इसी प्रकार इन दवाओं का प्रयोग होता… Continue reading उपजाऊ भूमि का विनाश क्यों ?

बीजिंग में बदल चुकी दुनिया का नज़ारा

फिलहाल चीन ने टकराव को एक सीमा के अंदर रखने और उसे यथासंभव संभालने के लिए आपसी संबंध में ‘रचनात्मक रणनीतिक स्थिरता’ का फॉर्मूला भर दिया है। ये फॉर्मूला तभी तक कारगर रहेगा, जब तक अमेरिका चीन की लक्ष्मण रेखाओं का पालन करे। मगर, अमेरिका के लिए भी लंबे समय तक ऐसा करना कठिन होगा,… Continue reading बीजिंग में बदल चुकी दुनिया का नज़ारा

सुवेंदु सरकार का आगाज तो अच्छा है

शपथ ग्रहण के एक हफ्ते के अंदर सुवेंदु अधिकारी की सरकार ने जो फैसले किए हैं अगर उनको थोड़ी बारीकी से देखें तो उसमें एक तारतम्य नजर आएगा। ऐसा नहीं लगेगा कि फैसले रैंडम हो रहे हैं। वे चूंकि खुद लंबे समय तक सरकार में भी रहे हैं और सरकार के कामकाज को करीब से… Continue reading सुवेंदु सरकार का आगाज तो अच्छा है

‘लालो- कृष्ण सदा सहायते’: आध्यात्म और थ्रिलर का संतुलन

‘लालो– कृष्ण सदा सहायते‘ को केवल एक गुजराती फ़िल्म कह देना उसके प्रभाव को सीमित कर देना होगा। यह दरअसल मनुष्य की भीतरी टूटनों, उसके अपराध बोध और ईश्वर से उसके निजी संवाद की कहानी है। फ़िल्म की सबसे बड़ी खूबी यही है कि यह धार्मिकता को किसी शोरगुल वाले चमत्कार में नहीं बदलती, बल्कि… Continue reading ‘लालो- कृष्ण सदा सहायते’: आध्यात्म और थ्रिलर का संतुलन

केरल को ले कर मीडिया का रोना धोना

कितनी टीवी डिबेटें हुईं इस पर कि पांच दिन हो गए, छह हो गए। अब तो सात हो गए। एंकरों को ऐसा लग रहा था कि वे सख्त से सख्त भाषा में बोलकर कांग्रेस का मुख्यमंत्री बनने को ही रोक देंगे या रोक देंगी! कांग्रेस बना ही नहीं सकती। फैसला लेना ही नहीं आता। अभी… Continue reading केरल को ले कर मीडिया का रोना धोना

तो अब सोने पर सरकारी नजर?

यह बहस सिर्फ सोने की नहीं, बल्कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता और सरकारी नियंत्रण की है। वायरल पोस्ट और उसके कमेंट्स ने आम आदमी की चिंता को आवाज दी है। सरकार को इस पर खुली बहस करनी चाहिए। सोना भारत की सांस्कृतिक धरोहर है, इसे सिर्फ वित्तीय संपत्ति बनाकर आम आदमी का भरोसा न खोया जाए। जब… Continue reading तो अब सोने पर सरकारी नजर?

कक्षा में बच्चे हैं पर शिक्षा अनुपस्थित!

पूरी शिक्षा व्यवस्था कक्षा में “उपस्थिति” के उत्पादन पर केंद्रित हो गई, “सीखने” पर नहीं। बच्चा स्कूल में है—यह पर्याप्त माना जाने लगा, चाहे वह कुछ भी सीख रहा हो या नहीं। यह साधारण भ्रष्टाचार नहीं है। यह एक नीति-तर्क है जो कागज़ पर ठीक दिखता है, लेकिन व्यवहार में राष्ट्र की सीखने की क्षमता… Continue reading कक्षा में बच्चे हैं पर शिक्षा अनुपस्थित!

ध्वंस के पार खड़ा सोमनाथ

आक्रमणकारियों ने धन के लोभ में मंदिर को लूटा, लेकिन वे उस श्रद्धा को नहीं लूट सके जो लोगों के हृदय में थी। सोमनाथ का पुनरुत्थान भारत की सांस्कृतिक संप्रभुता की पुनर्स्थापना है। सोमनाथ की यह गाथा केवल एक मंदिर का इतिहास नहीं, बल्कि आर्यावर्त की उस जिजीविषा का जीवंत प्रमाण है, जिसने समय के… Continue reading ध्वंस के पार खड़ा सोमनाथ

शब्दवीर (डींग) हिन्दू परंपरा

अतः यह क्लासिक हिन्दू विकत्थन परंपरा है। बड़े-बड़े शब्द, छोटे-छोटे कर्म। मजबूत से बचना, कमजोर पर चढ़ना। वफादार मजमे में उपदेशना। जहाँ कठिन सवालों का अंदेशा हो, वहाँ गायब रहना। …हिन्दी लेखक निर्मल वर्मा ने पचास वर्ष पहले कहा था: ‘हम सांस्कृतिक रूप से इतने असहाय अंग्रेजों के काल में भी नहीं थे।‘ आज वे… Continue reading शब्दवीर (डींग) हिन्दू परंपरा

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