मातृभाषा का हक और लोकतंत्र की कसौटी

राजस्थानी के संदर्भ में सुप्रीम कोर्ट ने जो कहा, वही बात भोजपुरी पर और भी अधिक तीव्रता से लागू होती है। अगर बच्चों को मातृभाषा में शिक्षा का अधिकार है, तो भोजपुरी बोलने वाले करोड़ों बच्चों को यह अधिकार क्यों नहीं मिलना चाहिए? क्या वे कम भारतीय हैं? क्या उनकी भाषा कम समृद्ध है?… सुप्रीम… Continue reading मातृभाषा का हक और लोकतंत्र की कसौटी

इस भीषण गर्मी में सोचे पारंपरिक उपाय

हर पर्यावरणविद् मानता है कि पारंपरिक जलाशयों को सुधार कर उनकी जल संचय क्षमता को बढ़ा कर और सघन वृक्षावली तैयार करके मौसम के मिज़ाज को कुछ हद तक बदला भी जा सकता है। प्रधान मंत्री मोदी का जल शक्ति अभियान और बरसों से चले आ रहे वृक्षारोपण के सरकारी अभियान अगर ईमानदारी से चलाए… Continue reading इस भीषण गर्मी में सोचे पारंपरिक उपाय

बुरी दशा भारतीय मेधा की

एआई के इस दौर में, जहां मशीनें इंसानों की तरह सोचने लगी हैं, इंसानों को उनसे अधिक रचनात्मक और मौलिक बनना होगा। यदि हम राजनीति को संकीर्णता से ऊपर उठाकर राष्ट्र निर्माण की दिशा में ले जा सकें, राष्ट्रीय शिक्षा नीति को सही अर्थों में लागू कर सकें और युवाओं को भयमुक्त वातावरण दे सकें,… Continue reading बुरी दशा भारतीय मेधा की

चीन ने नहीं किया है कोई चमत्कार!

भारत में आज मायूसी है और अब एक बड़ा आर्थिक संकट देश पर मंडरा रहा है, तो कारण 1991 के बाद पूंजी के सामने राज्य का पूर्ण समर्पण में तलाशने की जरूरत है। साथ ही इन प्रश्नों पर विचार की आवश्यकता है कि नेहरूवादी नीतियों के दौर में भारत में सार्वजनिक उद्यम लगाए गए, लेकिन… Continue reading चीन ने नहीं किया है कोई चमत्कार!

सुवेंदु के लिए सनातन प्रथम

सुवेंदु की सरकार ने सभी शिक्षण संस्थानों, जिनमें मदरसे भी शामिल हैं उनमें ‘वंदे मातरम’ का गायन अनिवार्य किया है। ध्यान रहे ‘वंदे मातरम’ कोई धार्मिक गीत नहीं है और अगर इसमें कुछ धार्मिक संदर्भ हैं भी तो वह बंगाल की संस्कृति से जुड़े हैं। बंकिम चंद्र चटोपाध्याय बांग्ला संस्कृति के प्रतिनिधि थे। उनकी रचना… Continue reading सुवेंदु के लिए सनातन प्रथम

‘चांद मेरा दिल’: प्रेम की बदलती भाषा

‘चांद मेरा दिल’ कोई कालजयी प्रेमकथा नहीं है, लेकिन यह पूरी तरह खोखली भी नहीं है। यह सुंदर है, ईमानदार है, संवेदनशील है, और कई क्षणों में प्रभावशाली भी। यह चांद तक पहुंचने वाली फ़िल्म नहीं, लेकिन उसकी रोशनी में बैठकर कुछ देर अपने पुराने प्रेम, अपनी असुरक्षाओं और अपने अधूरे संवादों को याद करने… Continue reading ‘चांद मेरा दिल’: प्रेम की बदलती भाषा

प्रश्न-फुहार को रोकती मुंह-मोड़ू छतरी

सोचे कि एक हेले और एक अभिजित का छोटा-सा कंकर भी हमारे संसार के समंदर में ऐसा अंधड़ पैदा कैसे कर देता है? इस के बीज कहीं तो हमारी ही शुष्क प्रणालीगत धरती में दफ़्न हैं। ज़रा-सी नमी मिलते ही वे फरफरा कर अंकुरित हो जाते हैं। नहीं क्या? भारत की सियासत आजकल बहुत ही… Continue reading प्रश्न-फुहार को रोकती मुंह-मोड़ू छतरी

सरकार आखिर क्या चाहती बच्चों से?

सोचें, इस साल 18 साल की उम्र के आसपास के जिन बच्चों ने 12वीं की परीक्षा दी थी और साथ ही मेडिकल में दाखिले के लिए नीट की परीक्षा में भी शामिल हुए थे उनकी क्या मनोदशा होगी? यह कितना हृदयविदारक है कि तीन मई को परीक्षा देकर खुशी मना रहे बच्चे फिर से परीक्षा… Continue reading सरकार आखिर क्या चाहती बच्चों से?

लोग अब मोदी को गलत मान रहे राहुल को नहीं

एक साल पहले अहमदाबाद के कांग्रेस अधिवेशन में राहुल ने चेतावनी दी थी कि आर्थिक तूफान आने वाला है। और एक साल जब सरकार ने कुछ नहीं किया केवल बातें, राहुल को गलत साबित करना तो राहुल ने फिर कहा कि आर्थिक तूफान आ गया। और अब खुद प्रधानमंत्री मोदी को मानना पड़ा कि हां… Continue reading लोग अब मोदी को गलत मान रहे राहुल को नहीं

इस शिक्षा प्रणाली से मुक्ति जरूरी!

शिक्षा की मौजूदा व्यवस्था में रचनात्मकता को कुचला जा रहा है। उदाहरण के लिए अधिकतर कक्षाओं में बच्चों को सरल दृश्य बनाने या मानकीकृत उत्तर लिखने को कहा जाता है, न कि स्वतंत्र सोच विकसित करने को। परिणामस्वरूप, वे किसी बड़े कारखाने की असेंबली लाइन से निकलने वाले उत्पादों की तरह एक जैसे बन जाते… Continue reading इस शिक्षा प्रणाली से मुक्ति जरूरी!

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