जनता की जान की क़ीमत पर वीआईपी सुरक्षा क्यों?

भारतीय मूल का 38 वर्षीय हिमांशु गुलाटी नॉर्वे का तीसरी बार सांसद है और वहाँ का उप-कानून मंत्री भी। उसे कोई वीआईपी सुरक्षा नहीं मिली हुई। उसने मुझे बताया कि नॉर्वे की पिछली प्रधानमंत्री एर्ना सोलबर्ग जब एक बार उसके घर रात्रि भोज पर आईं तो वे बिना किसी सुरक्षा बंदोबस्त के स्वयं कार चला… Continue reading जनता की जान की क़ीमत पर वीआईपी सुरक्षा क्यों?

सीपीएम के सामने है जो असल सवाल

1967 के बाद ऐसी स्थिति आई है, जब देश के किसी भी राज्य में ऐसी सरकार नहीं है, जिसमें कोई कम्युनिस्ट पार्टी शामिल हो। ।।।हाल के वर्षों में वर्ग दृष्टिकोण से हट कर अस्मिता के प्रश्नों को तरहीज देने की प्रवृत्ति अपने को कम्युनिस्ट कहने वाले अनेक दलों/ गुटों में भी बढ़ती चली गई है।… Continue reading सीपीएम के सामने है जो असल सवाल

बंगाल में सुवेंदु युग का आरंभ

संगठन के स्तर पर तृणमूल को चुनौती देना आसान नहीं था। सुवेंदु अधिकारी ने वह चुनौती भी दी और वैचारिक स्तर पर सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की अवधारणा को मजबूती से स्थापित किया।  सुवेंदु अधिकारी ने पश्चिम बंगाल के हिंदू मतदाताओं को यह भरोसा दिलाया कि इस बार भाजपा चुनाव जीतने जा रही है। इसके साथ ही… Continue reading बंगाल में सुवेंदु युग का आरंभ

एक थीं ममता और एक हैं राहुल

राहुल गांधी के फ़राख़-दिल मिज़ाज की बलैयां लेने का मन कर रहा है। पश्चिम बंगाल के चुनाव में राहुल कह रहे थे कि ममता बनर्जी के पिछले पांच बरस का राजकाज एकदम चैपट था, क़ानून-व्यवस्था चरम बदहाली का शिखर छू रही थी और उन्हीं की वज़ह से भारतीय जनता पार्टी को राज्य में अपनी जड़ें… Continue reading एक थीं ममता और एक हैं राहुल

बंगाल में आखिर हुआ क्या?

चुनाव का नैतिक सवाल आंकड़ों से बड़ा है। भाजपा के अनेक आलोचकों का प्रश्न यह नहीं कि ममता बनर्जी हार की हकदार थीं या नहीं? उनकी चिंता कुछ और है—क्या भारत में चुनाव अब ऐसे मुकाबले बनते जा रहे हैं जहां भारी वित्तीय शक्ति, मीडिया प्रभुत्व, केंद्रीय संस्थागत प्रभाव और सामाजिक ध्रुवीकरण मतदान से बहुत… Continue reading बंगाल में आखिर हुआ क्या?

नेहरू निन्दा की इन्तिहा!

मिर्जा गालिब ने कहा था: “गर्मी सही कलाम में लेकिन न इस कदर / की जिस से बात उसने शिकायत जरूर की।” सो, किसी की निन्दा भी अगर बेतरह करते रहो, तो निन्दक की ही शिकायत होने लगती है। हाल के वर्षों में, संसद से‌ लेकर सार्वजनिक भाषणों में भाजपा के बड़े नेता जिस तरह… Continue reading नेहरू निन्दा की इन्तिहा!

किन्नरों को वसूली का अधिकार नहीं: हाईकोर्ट

किन्नर समुदाय प्रायः अपने जजमानों से जबरन वसूली करता है। कभी-कभी तो वसूली का तरीका बहुत अभद्र होता है। जिसमें जजमान के परिवार के सामने निर्वस्त्र हो जाना, भद्दी गालियाँ देना, बद्दुआएँ देना और डराना धमकाना। कभी-कभी यह सब नाटक इस सीमा तक हो जाता है कि भयभीत जजमान अपनी आर्थिक हैसियत से कई गुना… Continue reading किन्नरों को वसूली का अधिकार नहीं: हाईकोर्ट

पश्चिम बंगाल भी केसरिया रंग में

सम्मिलित निष्कर्ष है कि बंगाल में भारतीय जनता पार्टी का प्रदर्शन बहुत अच्छा रहा है और बंगाल के मतदाताओं ने परिवर्तन के लिए मतदान किया है। आजादी के बाद पहली बार पश्चिम बंगाल में हिंदुत्व की सोच वाली सरकार बनने की वास्तविक संभावनाएं सामने हैं। साथ ही 50 साल के बाद पहली बार केंद्र की… Continue reading पश्चिम बंगाल भी केसरिया रंग में

जो मुद्दे चुनाव पर छाये और जो गायब रहे

भारत की ढांचागत आर्थिक समस्याएं हैं। ऊपर से ईरान युद्ध से पैदा हुई चुनौतियां हैं, जो वैश्विक ढांचागत बदलाव की जनक बन रही हैं। इन मुश्किलों के कारण दुनिया को गहरी आर्थिक पीड़ा से गुजरना पड़ रहा है। जो पहले से कमजोर है, लाजिमी है कि उसे ये पीड़ा ज्यादा महसूस होगी। बेशक, भारत उसी… Continue reading जो मुद्दे चुनाव पर छाये और जो गायब रहे

सादगी का साहस: ‘नुक्कड़ नाटक’

‘धुरंधर’ जहां अपने विशाल सेट्स, हाई-ऑक्टेन एक्शन और स्टार पावर के दम पर दर्शकों को बांधती है, वहीं ‘नुक्कड़ नाटक’ अपने विचारों और भावनाओं के सहारे आगे बढ़ती है। यह एक ऐसा अंतर है, जो दोनों फ़िल्मों को अपने-अपने स्थान पर महत्वपूर्ण बनाता है। सिने-सोहबत आज के समय में जब सिनेमाघरों और ओटीटी प्लेटफॉर्म्स पर… Continue reading सादगी का साहस: ‘नुक्कड़ नाटक’

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