भारत: विरासत की पूंजी और शक्ति का भ्रम

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आज भारत के सामने सबसे महत्वपूर्ण विदेश नीति का प्रश्न यह नहीं है कि देश उभर रहा है या नहीं।….वह पूछता है कि विरासत में क्या मिला था, क्या खर्च किया गया और क्या नया जोड़ा गया। फिर वह दोनों के बीच का अंतर दर्ज कर देता है। सवाल यह है कि उसकी कूटनीति अपनी विरासत में कुछ जोड़ रही है या चुपचाप उसी पर जीवित है। …लगभग पचहत्तर वर्षों तक भारत ने एक रणनीतिक पूंजी जमा की। सभी सरकारें लगभग हर विषय पर असहमत थीं, लेकिन एक बुनियादी बात पर उनका मतभेद नहीं था—भारत को अपने फैसले स्वयं लेने चाहिए।… आज क्या है?  

किसी राष्ट्र के जीवन का खतरनाक क्षण पराजय नहीं होता। आखिर पराजय दिखाई देती है। वह भ्रम तोड़ती है और आत्मपरीक्षण के लिए मजबूर करती है। असली खतरा सफलता के बाद पैदा होता है, जब कोई देश दशकों से संचित शक्ति के लाभ तो खाता रहता है, लेकिन धीरे-धीरे यह पहचानने की क्षमता ही खो देता है कि जो संपत्ति उसके पास है, उसमें कितना हिस्सा उसकी अपनी कमाई का है और कितना विरासत से मिला है।

इतिहास में ऐसी ही मानसिक कमजोरी, भ्रम, नासमझी को साम्राज्यों को बरबाद किया है, कंपनियों को डुबोया है, राजनीतिक दलों को खोखला किया है और सभ्यताओं को पतन की ओर धकेला है। इससे विदेश नीति भी अछूती नहीं रहती।

जो परिवार विरासत की पूंजी खर्च करता है, वह अक्सर अपने बैंक खाते का आकार देखकर यह मान बैठता है कि यह उसकी अपनी कमाई का परिणाम है। सच्चाई तब सामने आती है, जब विरासत समाप्त होने लगती है और उसे भरने के लिए कोई नई आय दिखाई नहीं देती। राष्ट्र-राज्य की शासन कला में भी कुछ ऐसा ही होता है। राष्ट्र केवल धन नहीं विरासत में पाते। वे विश्वसनीयता विरासत में पाते हैं। वे भरोसा, गठबंधन, संस्थाएं और ऐसी प्रतिष्ठा विरासत में पाते हैं, जिसे कई पीढ़ियों की संयमित नीतियों, निरंतरता और त्याग ने बनाया होता है।

ये संपत्तियां आर्थिक आंकड़ों में नहीं दिखतीं, लेकिन अक्सर सैन्य बजटों और कूटनीतिक घोषणाओं से कहीं अधिक मूल्यवान होती हैं। वही तय करती हैं कि संकट के समय किस देश का फोन उठाया जाएगा, किसकी चेतावनी को गंभीरता से लिया जाएगा और किसके निर्णय पर भरोसा किया जाएगा। सबसे बढ़कर, वही यह तय करती हैं कि किसी राष्ट्र के पास स्वतंत्र निर्णय लेने की कितनी वास्तविक गुंजाइश होगी।

लगभग पचहत्तर वर्षों तक भारत ने इसी प्रकार की रणनीतिक पूंजी जमा की। यह उपलब्धि किसी एक नेता या एक दल की नहीं थी। यह धीरे-धीरे बनी। कई बार अधूरी रही। अनेक सरकारें लगभग हर विषय पर असहमत थीं, लेकिन एक बुनियादी बात पर उनका मतभेद नहीं था—भारत को अपने फैसले स्वयं लेने चाहिए। जवाहरलाल नेहरू समझते थे कि एक गरीब उपनिवेशोत्तर राष्ट्र महाशक्तियों से उनकी शर्तों पर प्रतिस्पर्धा नहीं कर सकता। इसलिए उन्होंने प्रभाव का रास्ता स्वतंत्रता में खोजा। गुटनिरपेक्षता की सफलताओं और असफलताओं पर दशकों से बहस होती रही है, लेकिन उसके मूल उद्देश्य को अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है। गुटनिरपेक्षता नैतिक श्रेष्ठता का प्रदर्शन नहीं थी। वह किसी बाहरी शक्ति खेमे पर रणनीतिक निर्भरता से इनकार करने की व्यवस्था थी।

इंदिरा गांधी ने इस विरासत को और कठोर भाषा दी। 1971 के बांग्लादेश संकट ने दिखाया कि स्वायत्तता का अर्थ तभी है, जब वह दबाव झेल सके। उस दौर का सबक यह नहीं था कि भारत पश्चिम का विरोध करे या सोवियत संघ का साथ दे। सबक यह था कि भारत के निर्णय नई दिल्ली में होंगे, किसी और राजधानी में नहीं। यह प्रवृत्ति शीत युद्ध के बाद भी बनी रही।

पी. वी. नरसिंह राव ने अर्थव्यवस्था खोली, लेकिन कूटनीतिक लचीलापन बनाए रखा। अटल बिहारी वाजपेयी ने परमाणु परीक्षण किए और साथ ही अमेरिका से संबंध भी विकसित किए। मनमोहन सिंह ने ऐतिहासिक असैनिक परमाणु समझौता किया, लेकिन स्वतंत्र निर्णय की परंपरा को छोड़ा नहीं। इन नेताओं ने गलतियां भी कीं। कुछ ने गंभीर गलतियां कीं। लेकिन हर एक ने उस रणनीतिक विरासत में कुछ न कुछ जोड़ा, जिसकी कीमत बढ़ा-चढ़ाकर बताना भी कठिन है।

तभी सदी के मोड़ तक भारत के पास एक ऐसी संपत्ति थी, जो कई अधिक समृद्ध और अधिक शक्तिशाली देशों के पास भी नहीं थी। उसके पास विश्वसनीयता थी। दुनिया भारत से असहमत हो सकती थी, कई बार तीखे ढंग से असहमत होती थी, लेकिन बहुत कम लोग यह संदेह करते थे कि भारत जो कह रहा है, वह उसका अपना विचार है। मित्र उसे हल्के में नहीं ले सकते थे। प्रतिद्वंद्वी उसे आसानी से पढ़ नहीं सकते थे। किसी को यह विश्वास नहीं था कि भारत की विदेश नीति किसी और की प्राथमिकताओं की मात्र प्रतिछाया बन जाएगी। यह गणराज्य की सबसे बड़ी रणनीतिक पूंजियों में से एक थी।

इसी दौरान भारत की सीमाओं के बाहर भी एक दूसरी पूंजी बन रही थी। भारतीय प्रवासी समुदाय आधुनिक इतिहास की सबसे उल्लेखनीय सामाजिक यात्राओं में से एक तय कर रहा था। अमेरिका, यूरोप, खाड़ी देशों, अफ्रीका और एशिया में भारतीय मूल के लोग चिकित्सक बने, वैज्ञानिक बने, उद्यमी बने, निवेशक बने, शिक्षाविद बने और सार्वजनिक संस्थाओं में प्रभावशाली पदों तक पहुंचे। उन्होंने प्रभाव लॉबिंग से नहीं, प्रदर्शन से अर्जित किया।

कई पीढ़ियों ने मिलकर विश्वास के ऐसे नेटवर्क बनाए, जिन्हें कोई सरकार आदेश देकर खड़ा नहीं कर सकती थी। इक्कीसवीं सदी के दूसरे दशक तक भारत के पास एक असाधारण विरासत थी—कूटनीतिक विश्वसनीयता, महाशक्तियों के बीच रणनीतिक लचीलापन और ऐसा वैश्विक प्रवासी समुदाय जिसका प्रभाव देश की औपचारिक शक्ति से कहीं अधिक था। भारत के किसी भी पूर्व नेतृत्व को इससे मजबूत शुरुआती स्थिति विरासत में नहीं मिली थी।

यहीं से वह प्रश्न शुरू होता है जो सबसे महत्वपूर्ण है। क्या भारत ने इस विरासत का उपयोग नई रणनीतिक पूंजी बनाने में किया है? या उसने केवल पुरानी पूंजी खर्च की है और उसी खर्च को अपनी शक्ति का प्रमाण बताना शुरू कर दिया है?

पिछले एक दशक की प्रमुख कहानी परिचित है। भारत पहले से कहीं अधिक दिखाई देता है। उसके नेता वैश्विक ध्यान आकर्षित करते हैं। अंतरराष्ट्रीय शिखर सम्मेलन उसकी उपस्थिति के बिना अधूरे लगते हैं। विदेशी सरकारें उसके साथ संबंध बढ़ाना चाहती हैं। यह सब काल्पनिक नहीं है। भारत वास्तव में अधिक दृश्य है। लेकिन प्रश्न यह है कि कहीं दृश्यता और प्रभाव को एक ही चीज तो नहीं मान लिया गया है। दिखाई देना शक्ति नहीं होता। पहचान मिलना प्रभाव नहीं होता। चर्चा में बने रहना स्वायत्तता नहीं होती।

अंतरराष्ट्रीय राजनीति का इतिहास ऐसे देशों से भरा पड़ा है जो सुर्खियों में छाए रहे, लेकिन उन घटनाओं पर उनका प्रभाव सीमित था जो वास्तव में उनके लिए महत्वपूर्ण थीं। राज्यकला की कसौटी यह नहीं है कि दुनिया आपको देख रही है या नहीं। असली कसौटी यह है कि दुनिया आपके हिसाब

बुद्धिमान सरकार विरासत में मिली ताकत को स्थायी रणनीतिक लाभ में बदलती है। कम बुद्धिमान सरकार विरासत में मिली ताकत को अपनी प्रतिभा का प्रमाण समझ बैठती है। अंतर अक्सर लंबे समय तक दिखाई नहीं देता, लेकिन इतिहास अंततः उसी अंतर का हिसाब रखता है।

फर्क इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि विरासत की पूंजी खर्च हो सकती है। कोई देश अपनी कूटनीतिक विश्वसनीयता खो सकता है यदि वह अत्यधिक पूर्वानुमेय हो जाए। वह अपनी रणनीतिक लचीलेपन को गंवा सकता है यदि बहुध्रुवीय दुनिया में वह स्वयं को किसी एक खेमे से बहुत अधिक जोड़ ले। वह सद्भावना खो सकता है यदि दशकों में बने संबंधों को जीवित निवेश की जगह स्थायी संपत्ति समझ लिया जाए।

और सबसे खतरनाक बात यह है कि वह यथार्थबोध भी खो सकता है। क्योंकि यथार्थबोध का पहला नियम हिसाब-किताब है। वह पूछता है कि वास्तव में क्या प्राप्त हुआ है, केवल यह नहीं कि क्या घोषित किया गया है। वह उपलब्धियों को नारों से नहीं मापता। वह परिणामों को तस्वीरों से नहीं तौलता।

भारत आज बीस वर्ष पहले की तुलना में अधिक शक्तिशाली है। उसकी अर्थव्यवस्था बड़ी है। उसकी सैन्य क्षमता अधिक है। उसकी तकनीकी ताकत गहरी है। उसकी वैश्विक दृश्यता कहीं अधिक है। यह सब सच है। लेकिन इनमें से कोई भी उस प्रश्न का उत्तर नहीं देता जो अंततः निर्णायक है। क्या भारत जितनी तेजी से ध्यान आकर्षित कर रहा है, उतनी ही तेजी से प्रभाव भी अर्जित कर रहा है? क्या उसकी दृश्यता के अनुपात में उसकी स्वतंत्र कार्रवाई की क्षमता भी बढ़ी है? क्या वह केवल उन कमरों में उपस्थित है जहां निर्णय होते हैं, या वह निर्णयों की दिशा भी बदल सकता है? क्या वह शक्तिशाली मित्रों को नाराज करने का जोखिम उठा सकता है? क्या वह बाहरी दबाव बढ़ने पर भी स्वतंत्र निर्णय बनाए रख सकता है?

यही वे प्रश्न हैं जो तय करते हैं कि रणनीतिक पूंजी बन रही है या खर्च हो रही है। जब दबाव बढ़ता है, तब पता चलता है कि किसी देश की स्वतंत्रता कितनी वास्तविक है। जब मित्र असहमत होते हैं, तब पता चलता है कि संबंध बराबरी के हैं या निर्भरता के। जब संकट आता है, तब स्पष्ट होता है कि प्रतिष्ठा वास्तव में अर्जित की गई थी या केवल प्रचारित की गई थी।

इतिहास निर्मम होता है। उसे इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि कितने शिखर सम्मेलनों में भाग लिया गया, कितने भाषण दिए गए, कितनी तस्वीरें खिंचीं या कितनी घोषणाएं जारी हुईं। अंततः वह बहीखाता खोलता है। वह पूछता है कि विरासत में क्या मिला था, क्या खर्च किया गया और क्या नया जोड़ा गया। फिर वह दोनों के बीच का अंतर दर्ज कर देता है। इसलिए आज भारत के सामने सबसे महत्वपूर्ण विदेश नीति का प्रश्न यह नहीं है कि देश उभर रहा है या नहीं। वह स्पष्ट रूप से उभर रहा है। प्रश्न यह है कि उसकी कूटनीति अपनी विरासत में कुछ जोड़ रही है या चुपचाप उसी पर जीवित है। एक रास्ता महाशक्ति बनाता है। दूसरा केवल महाशक्ति का आभास पैदा करता है। दोनों के बीच का अंतर वर्षों तक दिखाई नहीं देता। फिर अचानक दिखाई देने लगता है।


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