अमेरिका ने गंवाया, ईरान ने पाया

Categorized as अजित द्विवेदी कालम

पश्चिम एशिया में ईरान की स्थिति 32 दांतों के बीच एक जीभ की तरह रही है। उसके चारों तरफ सुन्नी मुस्लिम देश हैं, जो किसी भी स्थिति में मजबूत ईऱान नहीं देखना चाहते। उसके निकट पड़ोस में इजराइल भी है, जो ईरान को अपने अस्तित्व के लिए खतरा मानता है। खाड़ी के एक दर्जन देशों में अमेरिका के सैन्य ठिकानें हैं और सबके निशाने पर ईरान है। 1979 की इस्लामिक क्रांति और अमेरिकी दूतावास पर कब्जे की घटना के बाद दोनों देशों के बीच दुश्मनी का ही संबंध रहा है। एक दूसरे के यहां दोनों के दूतावास नहीं हैं। तेहरान में स्विस दूतावास से अमेरिका का काम होता है तो वॉशिंगटन में पाकिस्तानी दूतावास से ईरान का काम होता है। लेकिन एक घटना ने सारे समीकरण बदल दिए हैं। बिना किसी उकसावे और तात्कालिक घटनाक्रम के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने 28 फरवरी को ईरान पर हमला करके एक निहायत गैरजरूरी युद्ध छेड़ा। हमले के एक महीने बाद अस्थायी युद्धविराम हो गया, हालांकि छिटपुट हमले होते रहे। लेकिन अब साढ़े तीन महीने के बाद स्थायी समझौता हो गया है और इस युद्ध में परोक्ष या प्रत्यक्ष रूप से शामिल सभी देशों की स्थिति बदल गई।

अमेरिका और इजराइल दोनों की बंद मुट्ठी खुल गई है। साढ़े तीन महीने में अमेरिका की सबसे बड़ी महाशक्ति होने की छवि बुरी तरह से क्षतिग्रस्त हुई है। वह एक और युद्ध से बिना जीते या बिना कुछ हासिल किए, अपनी साख गंवा कर बाहर निकला है। ईरान के साथ युद्ध में उसने सिर्फ गंवाया है। उसके सैनिक मारे गए या घायल हुए। उसके विमान क्रैश हुए हैं। लाखों करोड़ रुपए खर्च हुए हैं। ईरान में तख्तापलट करने का अभियान फेल हुआ है। अपनी सुरक्षा के लिए अमेरिका पर निर्भर खाड़ी देशों का मोहभंग हुआ है और वे नई व्यवस्था के बारे मे सोच रहे हैं। यह धारणा बनी है कि अमेरिका के सैन्य ठिकानों को निशाना बना कर अमेरिका को झुकाया जा सकता है। खाड़ी में अमेरिका के सहयोगी देशों को निशाना बना कर ईरान ने जिस तरह से अमेरिका पर दबाव बनाया, उससे युद्ध का एक नया स्वरूप सामने आया है। अमेरिका का पारंपरिक सैन्य ढांचा पूरी तरह से तहस नहस हो गया है। अमेरिकी हमले ने एक ऐसे संकट को जन्म दिया, जिसका अस्तित्व उससे पहले तक नहीं था। हमले के बाद ईरान ने होर्मुज की खाड़ी बंद कर दी। उसने अंतरराष्ट्रीय जल क्षेत्र को हथियार की तरह इस्तेमाल किया। इससे भी युद्ध का नया स्वरूप सामने आया है। कुल मिला कर अमेरिका ने अपनी साख गंवाई, महाशक्ति का स्टैट्स गंवाया, लाखों करोड़ रुपए गंवाए और अपने सहयोगियों सहित पूरी दुनिया के सामने नए तरह के संकट खड़े कर दिए।

जहां तक इजराइल की बात है तो उसका संकट सबसे ज्यादा बढ़ा है। कहां तो नेतन्याहू को लग रहा था कि वे इस युद्ध के जरिए ग्रेटर इजराइल के ऐतिहासिक सपने को पूरा करेंगे। उनको लग रहा था कि ईरान में इस्लामिक क्रांति के बाद बनी खुमैनी की सत्ता समाप्त हो जाएगी, अमेरिका में रह रहे रजा पहलवी फिर से तेहरान में स्थापित हो जाएंगे, ईरान टूट कर बिखर जाएगा या इतना कमजोर हो जाएगा कि उसका खतरा हमेशा के लिए समाप्त हो जाएगा। लेकिन इनमे से कुछ नहीं हुआ। इस्लामिक सत्ता और मजबूत हुई है। जिस अयातुल्ला अली खुमैनी को युद्ध के पहले दिन मारा गया उनके बेटे मोज्तबा खामेनेई की शर्तों पर ही अमेरिका ने समझौता किया है। खुमैनी के बारे में कहा जाता है कि उन्होंने परमाणु बम बनाने में ज्यादा दिलचस्पी नहीं दिखाई, जिससे यूरेनियम संवर्धन के बाद भी ईरान ने बम नहीं बनाया। उनके बेटे मोज्तबा खामेनेई और इस युद्ध में ज्यादा मजबूत हुई इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड्स कॉर्प्स यानी आईआरजीसी के बारे में ऐसा नहीं कहा जा सकता है। इजराइल के लिए एक समस्या यह भी है कि अमेरिका ने ईरान के प्रॉक्सी संगठन यानी हिजबुल्ला, हूती और हमास पर हमला रोकने का भी समझौता किया है। सोचें, इजराइल कैसे बैलेस्टिक मिसाइल से संपन्न ईरान के हूती और हिजबुल्ला जैसे संगठनों के बीच शांति से रह पाएगा!

दूसरी ओर ईरान है, जिसने युद्ध के कारण तबाही तो झेली है लेकिन अब उसके अच्छे दिन आने वाले हैं। अरब सागर में अमेरिका अपनी नाकेबंदी समाप्त करने वाला है। ईरान के ऊपर से पाबंदी हटने वाली है, जिससे वह अपना तेल और दूसरे पेट्रो केमिकल उत्पाद दुनिया भर को बेच सकेगा। उसकी फ्रीज की गई संपत्तियों पर से रोक हटने वाली है, जिससे तत्काल उसकी सवा लाख करोड़ रुपए की संपत्ति मुक्त हो जाएगी। इसके बाद ईरान के पुनर्निर्माण के लिए अमेरिका और उसके सहयोगी देशों की ओर से 28 लाख करोड़ रुपए का पैकेज दिया जाएगा। यह भी समझौता हुआ है कि अमेरिका या दूसरा कोई देश ईरान की संप्रभुता और उसके आंतरिक मामलों में दखल नहीं देगा। ईरान के सुप्रीम लीडर मोज्तबा खामेनेई की सत्ता बनी रहेगी। उसके साथ समझौते में यह शर्त होगी कि ईरान कभी परमाणु बम नहीं बनाएगा। लेकिन वैसे भी ईरान परमाणु परमाणु बम नहीं बना रहा था।

उसके पास 460 किलो संवर्धित यूरेनियम है, जिसके बारे में आगे बातचीत होगी। ईरान इस बात पर भी अड़ा हुआ है कि वह होर्मुज की खाड़ी से गुजरने वाले जहाजों से टोल वसूलेगा। इस प्रयास में ओमान भी उसके साथ शामिल है। हालांकि अमेरिका अभी इससे इनकार कर रहा है। लेकिन युद्ध में हुए नुकसान के मुआवजे के नाम पर अगर टोल वसूली का कोई तंत्र बनता है तो ईरान को अपने तेल से ज्यादा कमाई टोल से हो जाएगी। सबसे बड़ी बात यह है कि आर्थिक मजबूती के साथ साथ ईरान पश्चिम एशिया की क्षेत्रीय महाशक्ति के रूप में स्थापित हुआ है। इस युद्ध में गहरे भूमिगत ठिकानों से मिसाइल दाग कर ईरान ने अपनी सैन्य क्षमता दुनिया को दिखाई। मिसाइल और ड्रोन के इस्तेमाल से जैसे ईरान ने लड़ाई लड़ी उसने यह साबित किया कि नए युग के युद्ध में छोटे से छोटे देश को भी कोई महाशक्ति निर्णायक रूप से परास्त नहीं कर सकती है। कुल मिला कर ईरान ने जिस तरह से अमेरिका और इजराइल जैसी महाशक्तियों को चुनौती दी और खाड़ी देशों पर हमले किए उससे एक बात तो तय हो गई कि अब खाड़ी के देश ईरान से बचने के लिए अमेरिका पर भरोसा नहीं करेंगे। उन्हें नई व्यवस्था बनानी होगी।


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