कोई चमत्कार ही बचाएगा विपक्ष को

Categorized as अजित द्विवेदी कालम

लोकसभा में भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए के पास साधारण बहुमत है। इसे दो तिहाई करने की जैसी बेचैनी अभी दिख रही है वह थोड़े दिन पहले तक नहीं दिख रही थी। आखिर जून 2024 में आए लोकसभा चुनाव के नतीजों में ही भाजपा अकेले दम पर बहुमत हासिल करने से पीछे रह गई थी। उसे सहयोगी पार्टियों के समर्थन से सरकार बनानी पड़ी थी। लेकिन उसके बाद उसने इस बात का प्रयास नहीं किया कि वह दूसरी पार्टियों को तोड़ कर अपना बहुमत बनाए या एनडीए के लिए दो तिहाई बहुमत सुनिश्चित करे। अब अचानक वह एकदम बेचैन हो गई है। इसे देख कर ऐसा लग रहा है कि उसकी तैयारी पहले से थी और वह पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव जीतने का इंतजार कर रही थी। बंगाल का चुनाव जीतते ही भाजपा ने अपनी योजना पर अमल शुरू कर दिया।

यह योजना 2029 का लोकसभा चुनाव जीतने की है। उससे पहले बाकी जो कुछ हो रहा है वह उसकी तैयारियों का हिस्सा है। संसद के दोनों सदनों में दो तिहाई बहुमत हासिल करना अपने आप में कोई लक्ष्य नहीं है। लक्ष्य 2029 का चुनाव है। असल में भाजपा के शीर्ष नेताओं को पता है कि अगर कोई असाधारण घटनाक्रम नहीं होता है तो 2029 का चुनाव 2024 से ज्यादा मुश्किल होगा। वह असाधारण घटनाक्रम क्या हो सकता है? परिसीमन और महिला आरक्षण ये दो ऐसे मामले हैं, जिनसे मौजूदा व्यवस्था में अचानक बड़ी हलचल पैदा की जा सकती है। परिसीमन और महिला आरक्षण के लिए नारी शक्ति वंदन कानून में संशोधन करना होगा और उसके बाद परिसमीन बिल के जरिए सीटों की संख्या बढ़ानी होगी। इसका दूसरा चरण परिसीमन आयोग बना कर लोकसभा क्षेत्रों की भौगोलिक सीमा और जनसंख्या संरचना को बदलने का है।

इसमें पहले काम यानी संविधान संशोधन और सीटों की संख्या बढ़ाने के लिए संसद के दोनों सदनों में दो तिहाई बहुमत चाहिए और अपने हिसाब से परिसीमन कराने के लिए राज्यों में अपनी सरकार चाहिए। दूसरा काम पूरी तरह से सेट है। रणनीतिक रूप से अहम सभी राज्यों में भाजपा की अपनी सरकार है। इसलिए परिसीमन आयोग में राज्य के प्रतिनिधि के तौर पर उसके अपने लोग होंगे। ध्यान रहे जम्मू कश्मीर में राष्ट्रपति शासन में परिसीमन हुआ था। भाजपा चुनाव जीत नहीं सकी लेकिन उसकी सीटें बढ़ीं। जम्मू क्षेत्र में नई बनी छह सीटों में से पांच पर भाजपा जीती। असम में 2023 में भाजपा की अपनी सरकार की देखरेख में परिसीमन हुआ। इसमें क्षेत्रों की भौगोलिक सीमा इस तरह से खींची गई कि मुस्लिम मतदाताओं के असर वाले क्षेत्रों की संख्या सीमित हो गई। इसके अलावा हिंदू और मुस्लिम का नैरेटिव अपनी जगह है। इस नैरेटिव से ही असम में बांग्ला भाषी और अहोम भाषी हिंदू की दूरी मिटी और बंगाल में बांग्ला और गैर बांग्ला भाषी हिंदू के बीच की दूरी समाप्त हुई।

बहरहाल, परिसीमन के जरिए भाजपा वैसे तो देश के बड़े हिस्से की संरचना बदलना चाहती है लेकिन रणनीतिक रूप से अहम राज्यों पर ज्यादा नजर रहेगी। ऐसे राज्यों पर खास ध्यान होगा, जहां भाजपा पिछली बार अच्छा प्रदर्शन नहीं कर पाई थी। इनमें उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र और पश्चिम बंगाल सबसे महत्वपूर्ण हैं। इन तीन राज्यों में लोकसभा की 170 सीटें हैं, जिनमें से भाजपा और उसकी सहयोगियों को कुल मिला कर 65 सीटें मिलीं। यानी 105 सीट विपक्ष के खाते में गई। विपक्ष की लगभग आधी सीटें इन तीन राज्यों से आती हैं। हो सकता है कि अगले चुनाव में स्वाभाविक रूप से भी भाजपा की सीटें इन राज्यों में बढ़ें लेकिन भाजपा 2029 का चुनाव संयोगों के सहारे नहीं छोड़ सकती है।

इनके अलावा कुछ और राज्य हैं, जहां परिसीमन के जरिए भौगोलिक व जनसंख्या संरचना बदलने से भाजपा की अतिरिक्त सीटें सुनिश्चित हो सकती हैं। इनमें बिहार, झारखंड, हरियाणा, राजस्थान सबसे महत्वपूर्ण हैं। इन राज्यों में 89 सीटें हैं। इनमें से भाजपा और उसकी सहयोगी पार्टियों के पास 54 सीटें हैं, जो 2019 के मुकाबले 23 कम हैं। यानी 2024 के चुनाव में इन राज्यों में भाजपा को 23 सीटों का नुकसान हुआ था। दक्षिण के राज्यों में परिसीमन से भाजपा को कोई खास फायदा नहीं होगा। यह बात भाजपा वहां के सहयोगियों और संभावित सहयोगियों को समझाएगी।

बहरहाल, अब संसद में संशोधन बिल पास कराने के लिए जरूरी संख्या का सवाल है। वहीं जुटाने की बेचैन कोशिश हो रही है। इसके लिए राजनीति के सामान्य लोक लाज को ताक पर रख कर असाधारण अनैतिकता के सहारे आवश्यक संख्या जुटाई जा रही है। फिर भी सवाल अपनी जगह है कि इतना कुछ करने के बाद भी क्या संख्या पूरी हो पाएगी? नारी शक्ति वंदन कानून में संशोधन के लिए लोकसभा की मौजूदा संख्या के लिहाज से 360 और राज्यसभा में 163 सांसदों की जरुरत होगी। लोकसभा में एनडीए के 293 सांसद हैं। यानी उसे 67 अतिरिक्त सांसदों की जरुरत है। तृणमूल कांग्रेस के 20 सांसद त्रिपुरा की नेशनल सिटीजंस पार्टी ऑफ इंडिया में शामिल हो गए हैं और एनडीए को समर्थन दे रहे हैं।

उद्धव ठाकरे की शिव सेना के भी सात सांसद ऐसे ही रास्ते से एनडीए की संख्या बढ़ाएंगे। ये 27 सांसद जोड़ने पर संख्या 320 पहुंचती है। उसके बाद 40 का इंतजाम कैसे होगा? दूसरी ओर राज्यसभा में एनडीए के पास 148 सांसद हैं। झारखंड और मिजोरम के चुनाव के बाद इसमें दो का इजाफा होगा। पश्चिम बंगाल के चार राज्यसभा सांसदों के इस्तीफे हो गए हैं। ये सीटें भी भाजपा के खाते में जाएंगी। इससे एनडीए की संख्या 154 हो जाएगी। फिर भी 10 सीटों की जरुरत होगी। माना जा रहा है कि पश्चिम बंगाल और ओडिशा में कुछ और राज्यसभा सांसदों का इस्तीफा हो सकता है।

इसके बाद भाजपा के पास तुरूप का पत्ता डीएमके का है। कांग्रेस के अचानक साथ छोड़ने से आहत एमके स्टालिन प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से सरकार का समर्थन कर सकते हैं। असल में सरकार समझा रही है कि अगर परिसीमन के मौजूदा फॉर्मूले यानी हर राज्य में समान रूप से 50 फीसदी सीटें बढ़ाने के फॉर्मूले को नहीं स्वीकार करती है तो संविधान के प्रावधान के मुताबिक 2026 के बाद की जनगणना के आंकड़ों के आधार पर जनसंख्या के हिसाब से सीटों का निर्धारण होगा और उसमें तमिलनाडु की सीटें या तो नहीं बढ़ेंगी या बहुत कम बढ़ेंगी। उसके अनुपात में ज्यादा आबादी वाले राज्यों की सीटें ज्यादा बढ़ेंगी। यह बात समझ में आती है तो स्टालिन सरकार का समर्थन करेंगे। उनके पास लोकसभा में 22 और राज्यसभा में 10 सांसद हैं। उनके समर्थन से राज्यसभा में दो तिहाई बहुमत हो जाएगा और लोकसभा में भी एनडीए दो तिहाई बहुमत के नजदीक पहुंच जाएगा। उसके बाद सरकार के लिए मुश्किल नहीं होगी। सो, इस बार का मानसून सत्र बहुत दिलचस्प होने जा रहा है। विपक्ष ने 16 से 18 अप्रैल के विशेष सत्र में सरकार का विधेयक विफल करा दिया था। इस बार सरकार उसी विधेयक को पास कराने का प्रयास करेगी। इस बार कोई चमत्कार ही सरकार को रोक पाएगा।


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