जनभावना का ध्यान रखने की जरुरत नहीं!

Categorized as अजित द्विवेदी कालम

क्या भारतीय जनता पार्टी इतनी बड़ी और इतनी ताकतवर हो गई है उसे चुनाव जीतने के लिए जनभावना का ध्यान रखने की भी जरुरत नहीं है? क्या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का नेतृत्व और अमित शाह का प्रबंधन इस स्तर तक पहुंच गया है कि जनभावना विपरीत होने के बावजूद वे भाजपा को चुनाव जिता दें? यह सवाल इसलिए है क्योंकि कई बार भारतीय जनता पार्टी जनभावना के खिलाफ काम करती दिखती है। ऐसे मुद्दों पर भी, जिन पर एक खास किस्म की जनभावना का निर्माण स्वंय भाजपा ने किया है। नागरिक इस बात को समझते भी हैं और सार्वजनिक विमर्श में इसकी चर्चा भी होती है। लोग सवाल भी उठाते हैं लेकिन मतदान के समय उनकी प्राथमिकताएं बदल जाती हैं और वे भाजपा के विरोध की मनःस्थिति के बावजूद उसी को वोट करते हैं। यह स्टॉकहोम सिंड्रोम है या नरेंद्र मोदी और अमित शाह ने कुछ ऐसे मुद्दे लोगों के अवचेतन में बैठा दिए हैं, जो मतदान के समय उनकी मनःस्थिति को प्रभावित करने वाले तात्कालिक मुद्दों से ज्यादा महत्वपूर्ण प्रतीत होते हैं? यह गहरे विश्लेषण का विषय है। इसके तत्व धर्म, जाति और सांप्रदायिक आधार पर गहरे राजनीतिक व सामाजिक विभाजन में खोजे जा सकते हैं।

अगर जनभावना की बात करें तो सबसे पहले उदाहरण के लिए भ्रष्टाचार का मुद्दा लिया जा सकता है। भाजपा और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भ्रष्टाचार के खिलाफ जनमत बनाया था और नारा दिया था कि ‘न खाऊंगा न खाने दूंगा’। लेकिन भाजपा भ्रष्टाचार के आरोपियों को खुले दिल से पार्टी में शामिल करती है और उन्हें उच्च पद पर बैठाती है। महाराष्ट्र में अजित पवार के ऊपर भाजपा ने 70 हजार करोड़ रुपए के सिंचाई घोटाले का आरोप लगाया था और कोऑपरेटिव बैंक व चीनी मिल से जुड़े कई घोटाले से थे। अमित शाह ने कहा था कि अजित पवार जेल जाएंगे और चक्की पीसेंगे। लेकिन वही अजित पवार भाजपा के साथ आ गए। उनको उप मुख्यमंत्री बना दिया गया और चुनाव में भाजपा को इसका फायदा भी मिला। यह कहानी एक के बाद एक कई राज्य में दोहराई गई। हिमंत बिस्वा सरमा के ऊपर कई गंभीर आरोप लगे थे। सीबीआई ने उनकी जांच की थी। वे भाजपा के मुख्यमंत्री हैं। सुवेंदु अधिकारी एक स्टिंग ऑपरेशन में कैमरे पर पैसे लेते पकड़े गए थे। लेकिन वे भी भाजपा के मुख्यमंत्री हैं। अभी ही तृणमूल कांग्रेस के जो सांसद सरोगेट तरीके से भाजपा से जुड़ रहे हैं उनमें कई भ्रष्टाचार के गंभीर मामलों के आरोपी हैं और उन्हीं के खिलाफ बंगाल के लोगों ने गुस्सा निकाला। लेकिन भाजपा को इसकी परवाह नहीं है। ऐसी अनगिनत मिसाले हैं। आम आदमी पार्टी के जिस सांसद के यहां ईडी ने छापा मार उसने 10 दिन के बाद ही भाजपा के बड़े नेताओं के सामने पार्टी ज्वाइन कर ली। ऐसा लग रहा है जैसे भाजपा भ्रष्टाचार को नापंसद करने वाले अपने समर्थकों को चिढ़ाने के लिए ऐसा काम कर रही है।

भ्रष्टाचार के बाद भाजपा और नरेंद्र मोदी का दूसरा बड़ा मुद्दा वंशवाद का था। उन्होंने जिस तरह से भ्रष्टाचार के खिलाफ जनभावना का निर्माण किया वैसे ही वंशवाद के खिलाफ भी किया। परिवारवाद को लोकतंत्र के लिए सबसे बड़ा खतरा बताया। लेकिन बिहार से लेकर उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र और कर्नाटक से लेकर आंध्र प्रदेश तक परिवारवादी पार्टियों को अपने साथ जोड़ा, उन्हें प्रश्रय दिया, उनको अपनी सरकार में मंत्री बनाया और राज्यों में सत्ता का सुख भोगने के बंदोबस्त किए। अपनी पार्टी में भी दूसरी या तीसरी पीढ़ी के नेताओं के आगे बढ़ाया।

ऐसे ही महंगाई का मामला है। 2014 में प्रधानमंत्री पद के दावेदार के तौर पर नरेंद्र मोदी ने ‘बहुत हुई महंगाई की मार, अबकी बार मोदी सरकार’ का नारा दिया। लेकिन सरकार में आने के बाद पिछले 12 साल में महंगाई बेतहाशा बढ़ी है। कच्चे तेल की कीमतें तो अब बढ़ी हैं, जब आपूर्ति प्रभावित हुई। परंतु भारत में तो पेट्रोल की कीमत एक सौ रुपए की मनोवैज्ञानिक सीमा पांच साल पहले ही पार कर गई थी। भाजपा ने 60 रुपए लीटर पेट्रोल को महंगा बताया था लेकिन उसकी सरकार ने 2021 में पेट्रोल की कीमत सौ रुपए लीटर कर दी। भाजपा ने चार सौ रुपए के रसोई गैस सिलेंडर के खिलाफ अभियान चलाया था लेकिन सरकार में आने के थोड़े दिन बाद ही उसने इसकी कीमत नौ सौ रुपए कर दी। मोदी के अनेक वीडियो आज भी शेयर किए जाते हैं, जिसमें 60 रुपए में एक डॉलर की कीमत को देश की प्रतिष्ठा के साथ जोड़ रहे थे। लेकिन आज 96 रुपए का डॉलर मिल रहा है फिर भी देश की प्रतिष्ठा बढ़ रही है!

प्रधानमंत्री ‘परीक्षा पर चर्चा’ करते हैं। उन्होंने ‘एग्जाम वॉरियर्स’ नाम से किताब लिखी है। आज नीट यूजी पेपर लीक और दोबारा परीक्षा के कारण 23 लाख और सीबीएसई की गड़बड़ियों के कारण 18 लाख छात्र परेशान हैं। परंतु प्रधानमंत्री ने एक शब्द नहीं कहा है। लाखों छात्र और करोड़ों अभिभावकों में असंतोष और गुस्सा है। प्रतियोगिता परीक्षाओं में गड़बड़ी और नौकरी की कमी से लोग नाराज हैं। सड़कों पर भी लोगों का गुस्सा निकल रहा है। कॉकरोच जनता पार्टी फल फूल रही है। इसके बावजूद भाजपा और उसकी सरकार को इसकी परवाह नहीं है। नरेंद्र मोदी ने हर साल दो करोड़ नौकरी का वादा किया था। आज चार हजार पद के लिए 14 लाख लोग आवेदन कर रहे हैं। आठवीं पास की योग्यता जिस नौकरी के लिए चाहिए उसमें एमए पास लोग लाइन लगा कर खड़े होते हैं। रेलवे की एक लाख नौकरी के लिए एक करोड़ आठ लाख लोगों ने आवेदन किया और कई साल बीत जाने के बाद भी उसकी प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ी।

सो, भ्रष्टाचार हो, परिवारवाद हो, महंगाई हो या नौकरी और रोजगार का मामला हो, हर मामले में जनभावना सरकार के विरूद्ध दिखती है। इसके बावजूद भाजपा चुनाव जीत रही है तो इसका मतलब यह है कि सामान्य दिनों में जनभावना का ज्वार और मतदान के दिन की प्राथमिकता दोनों में समानता नहीं भी हो सकती है। पहले ऐसा होता था कि अगर लोगों में गुस्सा था तो वह मतदान में और चुनाव नतीजों में प्रकट होता था। आज ऐसा नहीं होता है। इसका कारण यह है कि अपने जीवन से जुड़ी रोजमर्रा की चीजों पर सरकार से नाराज होने के बावजूद किसी बड़ी प्रत्याशा में या किसी बड़े नैरेटिव के असर में लोग भाजपा को वोट दे रहे हैं। जैसे जैसे यह धारणा स्थापित होती जा रही है वैसे वैसे भाजपा जनभावना का ख्याल करना बंद या कम करती जा रही है। वह सरेआम ऐसे तमाम काम कर रही है, जिसके खिलाफ उसने खुद जनभावना का निर्माण किया है।


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