ज़मीनी लेकिन बेचैन फ़िल्म: ‘कॉट स्टीलिंग’

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हॉलीवुड फिल्मकार डैरेन एरोनोफ़्स्की की पिछली फिल्म ब्लैक स्वानयदि आत्म-विनाश की कविता थी, तो कॉट स्टीलिंगरोज़मर्रा के नरक की गद्य-कथा है। कॉट स्टीलिंगउन फिल्मों में से नहीं होगी, जिन्हें देखकर आप हल्के मन से बाहर निकलें। यह धीरे-धीरे चिपकती है, और बाद में याद आती है, खासतौर पर उन पलों में, जब आप सोचते हैं कि जीवन में एक छोटा-सा फैसला सब कुछ बदल सकता है।

सिने-सोहबत

आज के सिने-सोहबत में हॉलीवुड फिल्मकार डैरेन एरोनोफ़्स्की की हालिया फ़िल्म  ‘कॉट स्टीलिंग’ पर एक ज़रूरी विमर्श। डैरेन का सिनेमा हमेशा से आरामदेह दर्शक अनुभव के विरुद्ध खड़ा रहा है। उनकी फ़िल्में दर्शक को कहानी नहीं सुनातीं, बल्कि उसे भीतर से झकझोरती हैं मानो परदे पर नहीं, हमारे मानस में कुछ घट रहा हो। फिर चाहे ‘रिक्विम फॉर अ ड्रीम’ में लत का भयावह सौंदर्य हो, ‘ब्लैक स्वान’ में महत्वाकांक्षा का मनोवैज्ञानिक विघटन, या ‘द रेसलर’ में टूटते शरीर के साथ टूटती आत्मा, एरोनोफ़्स्की ने मनुष्य की सीमाओं को ही अपना स्थायी विषय बनाया है।

ऐसे में ‘कॉट स्टीलिंग’ का आना, पहली नज़र में, उनके सिनेमा से कुछ अलग प्रतीत होता है, एक अपेक्षाकृत “सीधा” क्राइम थ्रिलर। लेकिन यही इसकी सबसे बड़ी चाल भी है। ‘कॉट स्टीलिंग’ की कहानी कुछ ऐसी है कि इसमें अपराध को दुर्घटना के रूप में दिखाने की कोशिश हुई है। ‘कॉट  स्टीलिंग’ चार्ली ह्यूस्टन के इसी नाम के उपन्यास पर आधारित है। कहानी 1990 के दशक के न्यूयॉर्क में घटित होती है। एक ऐसा शहर जो आज की चमचमाती छवि से पहले, अपराध, नस्लीय तनाव और आर्थिक असमानता की प्रयोगशाला था।

फिल्म का नायक एक पूर्व बेसबॉल खिलाड़ी है, वह खिलाड़ी जो कभी उभर सकता था, लेकिन अब सिर्फ़ “हो सकता था” की स्मृति बनकर रह गया है। उसका वर्तमान साधारण है, लगभग नीरस। और फिर, एक छोटी-सी दुर्घटना, एक गलत समय पर लिया गया फैसला उसे ऐसे आपराधिक जाल में फंसा देता है, जहां से निकलने का कोई साफ़ रास्ता नहीं।

यहां एरोनोफ़्स्की का हस्तक्षेप महत्वपूर्ण हो जाता है। यह फिल्म अपराध को रोमांच या ग्लैमर की तरह नहीं, बल्कि संयोगजन्य त्रासदी की तरह देखती है। नायक अपराधी नहीं बनना चाहता। वह बस “गलत जगह, गलत समय” पर मौजूद है। और शायद यही बात इसे क्लासिक नॉयर परंपरा से जोड़ती है। फिल्मकार एरोनोफ़्स्की की फ़िल्म का न्यूयॉर्क शहर साफ़ तौर पर एक चरित्र के रूप में दिखाया गया है।

एरोनोफ़्स्की के सिनेमा में शहर कभी पृष्ठभूमि नहीं होता, वह एक जीवित, सांस लेता हुआ चरित्र होता है। ‘पाई’ का न्यूयॉर्क संकीर्ण और पागलपन से भरा था; ‘रिक्विम फॉर अ ड्रीम’ का ब्रुकलिन सपनों के टूटने की फैक्ट्री। ‘कॉट स्टीलिंग’ का न्यूयॉर्क उससे भी ज़्यादा क्रूर है—यहां गलियां आपको निगल लेती हैं, और लोग सिर्फ़ साधन हैं।

1990 का दशक इसलिए भी अहम है क्योंकि यह “डिजिटल नैतिकता” से पहले का समय है। यहाँ अपराध के प्रमाण मिटाने के लिए एल्गोरिद्म नहीं, बल्कि हिंसा काम आती है। यह शहर कैमरों से नहीं, आंखों से देखता है और आंखें अक्सर निर्दयी होती हैं।

इस फ़िल्म को देखते हुए दर्शकों में इस संशय की मौजूदगी हमेशा रहेगी कि ऑस्टिन बटलर दरअसल नायक है या फिर शिकार? ऑस्टिन बटलर इस फिल्म के केंद्र में हैं, और यह भूमिका उनके करियर की निर्णायक भूमिकाओं में से एक हो सकती है। ‘एल्विस’ में उन्होंने करिश्मा दिखाया था; ‘कॉट स्टीलिंग’ में उनसे अपेक्षा है कि वे असहायता दिखाएं।

यह किरदार न तो पारंपरिक हीरो है, न एंटी-हीरो। वह एक ऐसा व्यक्ति है जो लगातार स्थितियों से पीछे छूटता जा रहा है। उसकी आंखों में डर है, भ्रम है, और कहीं गहरे में यह स्वीकारोक्ति भी कि शायद वह हमेशा से इसी के लिए बना था—हार के लिए।

एरोनोफ़्स्की के सिनेमा में शरीर हमेशा महत्वपूर्ण रहा है। यहां भी नायक का शरीर मार खाता है, भागता है, थकता है—और उसी के साथ उसका आत्मविश्वास भी टूटता है। यह हिंसा “स्टाइलिश” नहीं, बल्कि थकाने वाली है।

ज़ोई क्राविट्ज़ और रेजिना किंग जैसे कलाकार फिल्म में स्त्री पात्रों को सिर्फ़ “सहायक” भूमिकाओं तक सीमित नहीं रहने देते। एरोनोफ़्स्की अक्सर स्त्री पात्रों को प्रतीक के रूप में इस्तेमाल करने के आरोप झेलते रहे हैं (‘मदर’! इसका उदाहरण है), लेकिन ‘कॉट स्टीलिंग’ में स्त्रियाँ नैतिक धुरी का काम करती प्रतीत होती हैं—कभी सहारा, कभी खतरा।

यह फिल्म स्पष्ट नैतिक रेखाएं नहीं खींचती। यहां कोई पूरी तरह सही या पूरी तरह गलत नहीं। यही इसकी बेचैनी है—दर्शक खुद तय नहीं कर पाता कि किसके साथ खड़ा हो।

यदि आप ‘जॉन विक’ जैसी कोरियोग्राफ़्ड हिंसा की उम्मीद लेकर आते हैं, तो यह फिल्म आपको असहज करेगी। एरोनोफ़्स्की की हिंसा हमेशा की तरह शारीरिक और मानसिक बोझ है। यहां हर वार का वज़न है, हर गोली का असर। हिंसा मनोरंजन नहीं, परिणाम है—और यही इसे सच्चा बनाता है।

संगीत और ध्वनि में भी बेचैनी की लय का बखूबी इस्तेमाल हुआ है। एरोनोफ़्स्की के साथ संगीत हमेशा कथा का अविभाज्य हिस्सा रहा है। ‘कॉट स्टीलिंग’ में भी बैकग्राउंड स्कोर शहर की नाड़ी की तरह धड़कता है। यह कभी तेज़ नहीं चिल्लाता, बल्कि धीरे-धीरे नसों में उतरता है। साइलेंस का इस्तेमाल विशेष रूप से प्रभावी है क्योंकि कभी-कभी सबसे डरावनी चीज़ वह होती है, जो सुनाई नहीं देती।

इस फिल्म में असल में अपराध से ज़्यादा असफलता की फिल्म है। यह उन लोगों की कहानी है जो “अगर” और “काश” के बीच फंसे हैं।

क्या नायक अपनी नियति से भाग सकता है? या क्या वह शुरू से ही इस जाल का हिस्सा था? एरोनोफ़्स्की इन सवालों के जवाब नहीं देते—वे बस उन्हें और तीखा बना देते हैं।

यह फिल्म शायद उनकी सबसे “सुलभ” फिल्म कही जाएगी, लेकिन यह सुलभता भ्रम है। भीतर से यह उतनी ही असहज और चुनौतीपूर्ण है जितनी उनकी पिछली फिल्में।

अगर ‘ब्लैक स्वान’ आत्म-विनाश की कविता थी, तो ‘कॉट स्टीलिंग’ रोज़मर्रा के नरक की गद्य-कथा है।

‘कॉट स्टीलिंग’ उन फिल्मों में से नहीं होगी, जिन्हें देखकर आप हल्के मन से बाहर निकलें। यह धीरे-धीरे चिपकती है, और बाद में याद आती है, खासतौर पर उन पलों में, जब आप सोचते हैं कि जीवन में एक छोटा-सा फैसला सब कुछ बदल सकता है।

डैरेन एरोनोफ़्स्की ने शायद यहां कोई नई शैली नहीं गढ़ी, लेकिन उन्होंने यह ज़रूर दिखाया कि क्राइम थ्रिलर भी आत्मा पर हमला कर सकती है।

और यही उनकी सबसे बड़ी चोरी है; उन्होंने दर्शक के आराम को चुपचाप चुरा लिया है।

नेटफ़्लिक्स पर है। देख लीजिएगा।(पंकज दुबे मशहूर बाइलिंगुअल उपन्यासकार और चर्चित यूट्यूब चैट शो ‘स्मॉल टाउन्स बिग स्टोरीज़” के होस्ट हैं।)


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