औपनिवेशिक मानसिकता का सच बड़ा है!

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यूं तो प्रधानमंत्री मोदी ने मैकॉले मानसिकता की सही पहचान की है, लेकिन यह पूरा सच नहीं है। भारत का प्रभावशाली राजनीतिक, बौद्धिक और सामाजिक वर्ग सिर्फ मैकॉले ही नहीं, बल्कि कार्ल मार्क्स की विचारधारा से भी लंबे समय तक ग्रस्त रहा है। स्वतंत्रता के बाद से यह वैचारिक तंत्रकभी साथ मिलकर, कभी अलग-अलग अपने अधूरे एजेंडेको आगे बढ़ाता रहा।

हाल में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भारत को ‘मैकॉले मानसिकता’ से पूरी तरह मुक्त कराने का संकल्प दोहराया। उनके अनुसार— “वर्ष 1835 में मैकाले नाम के एक अंग्रेज ने भारत को अपनी जड़ों से उखाड़ने के बीज बोए थे। मैकाले ने भारत में मानसिक गुलामी की नींव रखी थी। दस साल बाद 2035 में उस घटना को 200 वर्ष पूरे हो रहे हैं… हमें दस वर्षों का लक्ष्य लेकर चलना है कि भारत को गुलामी की मानसिकता से मुक्त करके रहेंगे।” प्रधानमंत्री ने यह बात बिल्कुल उपयुक्त स्थान— अयोध्या में कही। श्रीरामजन्मभूमि मंदिर के निर्माण में सात दशक की देरी, दरअसल, उसी मानसिक गुलामी का प्रतीक है। यह मंदिर स्वतंत्रता के तुरंत बाद बन सकता था, जो भारत के आत्मगौरव और पहचान की पुनर्स्थापना में एक बड़ा कदम होता।

परंतु औपनिवेशिक सांचे में ढले नेताओं-बुद्धिजीवियों ने इसे हिंदू–मुस्लिम विवाद में परिवर्तित कर दिया। इस संबंध में विदेशी मानसपुत्रों ने ऐसे झूठे नैरेटिव गढ़े, जिनसे यह मामला दशकों तक मुकदमों के जाल में उलझा रहा, सांप्रदायिक सद्भाव बिगड़ा, अनगिनत निर्दोषों की जानें गई और अकूत संपत्ति का नुकसान हुआ। इस विषय को मैंने अपनी पुस्तक— ‘ट्रिस्ट विद अयोध्या: डिकॉलोनाइजेशन ऑफ इंडिया’ में विस्तार से समझाया है।

यूं तो प्रधानमंत्री मोदी ने मैकॉले मानसिकता की सही पहचान की है, लेकिन यह पूरा सच नहीं है। भारत का प्रभावशाली राजनीतिक, बौद्धिक और सामाजिक वर्ग सिर्फ मैकॉले ही नहीं, बल्कि कार्ल मार्क्स की विचारधारा से भी लंबे समय तक ग्रस्त रहा है। स्वतंत्रता के बाद से यह वैचारिक तंत्र— कभी साथ मिलकर, कभी अलग-अलग अपने ‘अधूरे एजेंडे’ को आगे बढ़ाता रहा। दोनों कभी मिले नहीं, लेकिन वे भारत की सनातन सभ्यता से गहरी घृणा करते थे।

थॉमस बैबिंगटन मैकॉले रुग्ण पूंजीवादी और साम्राज्यवादी थे। दूसरी ओर, कार्ल मार्क्स वामपंथी विचारधारा का अग्रदूत, जो पूंजीवाद की तीखी आलोचना करते और वर्ग–संघर्ष को अपना हथियार मानते थे। परंतु दोनों का एक ही लक्ष्य था— भारत की आत्मा को इस्लामी आक्रांताओं की तरह बलपूर्वक— तलवार के बजाय बौद्धिक स्तर से क्षीण करना। इसलिए जब कालांतर में अंग्रेजों ने जिहादियों (मुस्लिम लीग सहित) के साथ मिलकर भारतीय उपमहाद्वीप के विभाजन का रास्ता तैयार किया, तब वामपंथियों ने न केवल इसका समर्थन किया, बल्कि भारत को 15 से अधिक और टुकड़ों में विभाजित करने का ख्वाब देखना शुरू कर दिया।

वर्ष 1835 में मैकॉले की शिक्षा-नीति का लक्ष्य था— ऐसी हिंदुस्तानियों की जमात तैयार करना, जो “खून और रंग से तो भारतीय हो, मगर स्वाद, सोच, नैतिकता और बुद्धि से अंग्रेज।” इस नीति ने ही भारतीयों को अपनी मूल सनातन संस्कृति को हीन-दृष्टि से देखने और उससे घृणा करने का मार्ग प्रशस्त किया। समृद्ध भारतीय साहित्य–विद्या परंपरा से मैकाले की नफरत इतनी गहरी थी कि वे उन्हें “एक अच्छे यूरोपीय पुस्तकालय की छोटी अलमारी” के भी बराबर भी नहीं मानते थे।

औपनिवेशी मैकॉले का चिंतन मजहबी भी था। 12 अक्टूबर 1836 को अपने पिता के नाम लिखित पत्र में उसने साफ लिखा— “यदि हमारी शिक्षा नीति सफल रही, तो तीस वर्षों के भीतर बंगाल के सम्मानित घरानों में एक भी मूर्तिपूजक नहीं बचेगा।” यह मानस 1813 के ईस्ट इंडिया कंपनी चार्टर के उसी विवादास्पद प्रावधान के अनुरूप था, जिसमें यूरोपीय मिशनरियों को भारत में मतांतरण की खुली छूट देने और इसमें सहयोग करने की बात थी। इसी औपनिवेशिक प्रयोगशाला से आगे ‘आर्य आक्रमण सिद्धांत’, ‘द्रविड़ आंदोलन’ और “भारत राष्ट्र नहीं है” जैसे अनेक विभाजनकारी नैरेटिव जन्में, जिनका असर स्वतंत्र भारत के एक बड़े तबके (राजनीतिक सहित) पर आज भी है।

ब्रिटिशराज में भारत का बौद्धिक-सांस्कृतिक दमन कार्ल मार्क्स के मन-मुताबिक था। 8 अगस्त 1853 को ‘न्यूयॉर्क डेली ट्रिब्यून’ के एक कॉलम में मार्क्स ने लिखा— “अंग्रेज पहले विजेता थे, जिनकी सभ्यता श्रेष्ठतर थी, और इसलिए, हिंदू सभ्यता उन्हें अपने अंदर न समेट सकी। उन्होंने देशज समाज को उजाड़कर, स्थानीय उद्योग-धंधों को तबाह करके और मूल समाज के अंदर जो कुछ भी महान और उन्नत था, उन सबको धूल-धूसरित करके भारतीय सभ्यता को नष्ट कर दिया।” उसके अनुसार— “इंग्लैंड का भारत में दोहरा मिशन है: एक विनाशकारी और दूसरा पुनर्निर्माणकारी।” मार्क्स इस तबाही को जरूरी ‘क्रांति’ की सीढ़ी मानते थे, क्योंकि संस्कृति और अर्थव्यवस्था एक-दूसरे के पूरक होते हैं।

यही नहीं, 25 जून 1853 को ‘न्यूयॉर्क डेली ट्रिब्यून’ के अन्य कॉलम में मार्क्स ने हिंदू परंपराओं-मान्यताओं पर लिखा— “…मनुष्य प्रकृति का स्वामी बनने के बजाय उसके सामने झुकता था… इस पतन का सबसे बड़ा उदाहरण यह है कि मनुष्य बंदर ‘हनुमान’ और गाय ‘सबला’ की पूजा करता है…” भारत आए बिना मार्क्स ने यह विचार प्रकट किए थे और स्वतंत्र भारत में उनके अनुयायी आज भी इसका अनुसरण करते हुए सनातन आस्था-परंपराओं को कलंकित करते है। वास्तव में, भारतीय दर्शन मनुष्य को प्रकृति का हिस्सा मानता है, उसका स्वामी नहीं। वैदिक संस्कृति ने ही पहली से सत्रहवीं सदी तक भारतीय अर्थव्यवस्था को समृद्ध रूप दिया— इसका प्रमाण दुनियाभर के प्रामाणिक शोध में मिलता है।

जिस औपनिवेशिक मार्क्स-मैकाले मानसिकता से भारत को स्वतंत्रता के बाद मुक्त हो जाना चाहिए था, उसे 1998-2004 के कालखंड पश्चात बाद गति वर्ष 2014 के बाद मिली। इस संदर्भ में ब्रिटेन के प्रतिष्ठित अखबार ‘द गार्जियन’ का 18 मई 2014 का संपादकीय बहुत महत्वपूर्ण होत जाता है। उसके अनुसार— “मोदी की जीत उस लंबे दौर का अंत है, जिसमें सत्ता का ढांचा लगभग वैसा ही था जैसा ब्रिटेन ने भारत पर राज करते समय बनाया था। कांग्रेसी शासन में भारत कई मायनों में ब्रिटिशराज की ही दूसरी रूप में जारी व्यवस्था जैसा था।”

स्वतंत्रता के बाद अयोध्या में समाज (मुस्लिम सहित) और शासन-प्रशासन— सब एकमत थे कि हिंदुओं को श्रीरामजन्मभूमि सौंप दी जाए। परंतु तत्कालीन प्रधानमंत्री पं।नेहरू और उनके मार्क्स-मैकॉले चिंतन ने ऐसा नहीं होने दिया। आज पुनर्निर्मित श्रीरामजन्मभूमि मंदिर सिर्फ एक सांस्कृतिक धरोहर नहीं, बल्कि सनातन पुनर्जागरण का जीवंत प्रतीक भी है। 25 नवंबर को वैदिक मंत्रों के बीच जब प्रधानमंत्री मोदी ने अयोध्या में सनातन ध्वज स्थापित किया, तो यह भारत की सभ्यतागत उन्नति के आह्वान के साथ गुलाम मानसिकता की जंजीरों को तोड़ने की घोषणा भी थी। इससे मार्क्स-मैकॉले मानसपुत्रों की बौखलाहट लाजमी है।


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