अमेरिका की हैसियत नहीं बची: ईरान

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नई दिल्ली। पश्चिम एशिया में स्थायी युद्धविराम के लिए किए जा रहे प्रयासों के बीच ईरान ने बड़ा बयान दिया है। ईरान ने कहा है कि अमेरिका की ऐसी हैसियत नहीं बची कि वह किसी देश पर अपनी शर्तें थोप सके। ईरान ने मंगलवार को कहा कि अब अमेरिका ऐसी स्थिति में नहीं है कि वह दूसरे देशों को बताए कि उन्हें क्या करना चाहिए। इस बीच ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची एक बार फिर पाकिस्तान पहुंचे। रूस का दौरा खत्म करके वे मंगलवार को तीन दिन में तीसरी बार इस्लामाबाद पहुंचे।

उधर ईरान के रक्षा मंत्रालय के प्रवक्ता रेजा तलाएई निक ने सरकारी टीवी बातचीत में कहा कि ईरान ट्रंप का दबाव नहीं सहन करेगा। उन्होंने कहा कि अमेरिका को अपनी गलत मांगों को छोड़ना ही होगा। गौरतलब है कि ईरान ने अमेरिका को होर्मुज की खाड़ी खोलने का नया प्रस्ताव दिया है, जिस पर अमेरिका विचार कर रहा है। गौरतलब है कि अमेरिका, ईरान और इजराइल के बीच फिलहाल युद्धविराम लागू है, लेकिन इस संघर्ष को पूरी तरह खत्म करने के लिए जो बातचीत चल रही है, उसमें अभी तक कोई ठोस नतीजा नहीं निकला है।

इस बीच ईरान ने पहली बार अपनी ओर से होर्मुज की खाड़ी खोलने का प्रस्ताव दिया है। ईरान ने अमेरिका से समुद्री नाकेबंदी हटाने की भी अपील की है। ‘न्यूयॉर्क टाइम्स’ ने ईरानी अधिकारियों के हवाले से बताया है कि ईरान ने अमेरिका को बातचीत के लिए रविवार को एक नया प्रस्ताव दिया था। इसमें मुख्य रूप से तीन शर्तें थीं। पहली, अमेरिका व इजराइल के साथ चल रहा युद्ध खत्म हो और आगे हमला न करने की गारंटी मिले। दूसरी, अमेरिका की समुद्री नाकेबंदी हटे, होर्मुज खुले और जहाजों की आवाजाही फिर से शुरू हो और तीसरी शर्त, परमाणु कार्यक्रम और यूरेनियम संवर्धन जैसे विवादित मुद्दों पर बात हो।

खबर है कि राष्ट्रपति ट्रंप इस प्रस्ताव को मानने को तैयार नहीं हैं। अमेरिकी मीडिया समूह ‘सीएनएन’ के मुताबिक ट्रंप सरकार का मानना है कि अगर बिना परमाणु कार्यक्रम का मामला सुलझाए होर्मुज की खाड़ी खुली, तो बातचीत में अमेरिकी पक्ष कमजोर हो जाएगा। इसलिए दोनों का हल एक साथ ही निकाला जाना चाहिए। गौरतलब है कि ट्रंप ने दो दिन में दूसरी बार ईरान का प्रस्ताव ठुकराया है।

असल में पिछले कई दिनों से ईरान और अमेरिका के बीच पाकिस्तान के जरिए प्रस्तावों का आदान प्रदान हो रहा है, लेकिन परमाणु कार्यक्रम से जुड़े अहम मुद्दों पर अब तक सहमति नहीं बन सकी है। अमेरिका चाहता था कि ईरान 20 साल तक अपना परमाणु कार्यक्रम रोक दे और अपने पास मौजूद 440 किलो संवर्धित यूरेनियम सौंप दे। ईरान ने इन मांगों को बहुत ज्यादा और अनुचित बताते हुए मानने से इनकार कर दिया था। इस बीच फ्रांस ने भी कहा है कि अगर जंग खत्म करनी है तो ईरान को बड़े समझौते करने होंगे और अपने रुख में बदलाव लाना होगा। हालांकि जर्मन चांसलर फ्रेडरिक मर्ज ने कहा कि ईरान के सामने अमेरिका कमजोर दिख रहा है। उन्होंने वॉशिंगटन की रणनीति पर भी सवाल उठाए हैं।


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