ये जो चुनाव हुआ

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पहले चुनाव बिल्कुल दोषमुक्त होते थे ऐसा नहीं कहा जा सकता। लेकिन तब उन्हें ऐसे युद्ध की तरह भी नहीं लड़ा जाता था, जिसमें विरोधी को समूल नष्ट कर देने की भावना हो।

कभी चुनाव को लोकतंत्र का उत्सव समझा जाता था। तब चुनाव बिल्कुल दोषमुक्त थे या वे पूरी तरह स्वतंत्र एवं निष्पक्ष ढंग से आयोजित होते थे, ऐसा नहीं कहा जा सकता। लेकिन तब उन्हें ऐसे युद्ध की तरह भी नहीं लड़ा जाता था, जिसमें विरोधी को समूल नष्ट कर देने की भावना हो। अब ऐसा ही नजारा खास कर वैसे राज्य में देखने को मिलता है, जहां कोई गैर-भाजपा दल अब तक मजबूती से खड़ा रहा हो। पश्चिम बंगाल में इस बार विधानसभा चुनाव कुछ ऐसे ही माहौल में संपन्न हुआ।

एसआईआर प्रक्रिया सहित अन्य मामलों में निर्वाचन आयोग की विवादित भूमिका से लेकर अर्धसैनिक बलों द्वारा घेराबंदी और केंद्रीय जांच एजेंसियों की एकतरफा जैसी दिखने वाली कार्रवाइयों के निशाने पर ममता बनर्जी रहीं। भाजपा नेतृत्व ने अब अपनी पहुंच से बाहर रहे इस किले को जीत लेने की व्यूह-रचना में किसी राजनीतिक मान-मर्यादा का ख्याल नहीं रखा। ये कहने का अर्थ कतई यह नहीं है कि ममता बनर्जी नैतिक या मर्यादित राजनीति करती हैं। उनकी सियासत में भी बाहुबल और तोड़-जोड़ का उतना ही पुट रहा है। उनकी सफलता में ऐसे रुझानों का योगदान है।

बहरहाल, यही ध्यान देने की बात है। अब चुनावों में ऐसी प्रवृत्तियां ही निर्णायक महत्त्व की हो गई हैँ। इसका शिकार विकास और राष्ट्र-निर्माण से संबंधित मुद्दे बने हैं। नीतिगत बहसें हाशिये पर चली गई हैँ। जन-कल्याण के नाम पर अधिक से अधिक यही नजर आता है कि तमाम पार्टियां बैंक खातों में नकदी डालने के वादे बढ़-चढ़ कर करती हैं। उन्हें उससे भी ज्यादा भरोसा जाति-धर्म जैसे बांटने वाले मुद्दों पर लोगों को गोलबंद करने की रणनीति पर रहता है। ऐसे संकेत हैं कि इस बार केरल के विधानसभा चुनाव में भी ऐसे पहचान-गत मुद्दे प्रमुख हो गए। यानी जिस राज्य की राजनीतिक चर्चा के केंद्र में शिक्षा और स्वास्थ्य, और विकास संबंधी योजनाएं रहती थीं, वहां भी अगड़े- पिछड़े, हिंदू- मुस्लिम- ईसाई जैसी अस्मिताओं पर ध्रुवीकरण के संकेत मिले। ऐसे में उत्सव जैसे माहौल का गायब हो जाना लाजिमी ही है। उलटे अब हर चुनाव एक तरह का जख्म छोड़ कर जाने लगा है!


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