सीमा-पार आतंकवाद नजरअंदाज नहीं किया जा सकता: राजनाथ सिंह

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शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) के रक्षा मंत्रियों की बैठक में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने आतंकवाद के मुद्दे पर बेहद स्पष्ट और कड़ा रुख अपनाया। उन्होंने कहा कि राज्य-प्रायोजित सीमा-पार आतंकवाद किसी भी राष्ट्र की संप्रभुता पर सीधा हमला है और इसे किसी भी स्थिति में नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। 

उन्होंने दो टूक कहा कि इस मामले में दोहरे मानदंड के लिए कोई जगह नहीं होनी चाहिए और एससीओ को उन देशों के खिलाफ उचित कार्रवाई करने से नहीं हिचकना चाहिए, जो आतंकवादियों को समर्थन, शरण या सुरक्षित ठिकाने उपलब्ध कराते हैं। उन्होंने ऑपरेशन सिंदूर का जिक्र करते हुए कहा, भारत ने यह स्पष्ट कर दिया है कि आतंकवाद के केंद्र अब दंड से अछूते नहीं रहेंगे। राजनाथ सिंह ने अपने संबोधन में वैश्विक परिदृश्य पर चिंता जताते हुए कहा कि दुनिया इस समय बढ़ते एकतरफावाद और संघर्षों के दौर से गुजर रही है। 

उन्होंने कहा कि वैश्विक सहमति कमजोर पड़ रही है और टकराव की स्थितियां बढ़ रही हैं। ऐसे समय में यह सुनिश्चित करना जरूरी है कि यह दौर हिंसा और युद्ध का दौर न बनकर शांति और समृद्धि का दौर बने। उन्होंने महात्मा गांधी के विचारों को याद करते हुए कहा कि “आंख के बदले आंख” की सोच अंततः पूरी दुनिया को अंधा बना देती है और हर निर्णय से पहले यह सोचना चाहिए कि उसका असर गरीब और जरूरतमंद लोगों पर क्या पड़ेगा। उन्होंने बीते साल 22 अप्रैल को पहलगाम में हुए भीषण आतंकवादी हमले का जिक्र करते हुए कहा कि इस घटना ने पूरी मानवता को झकझोर दिया। 

उन्होंने कहा कि ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारत ने यह स्पष्ट कर दिया है कि आतंकवाद के केंद्र अब दंड से अछूते नहीं रहेंगे। उन्होंने पिछले वर्ष जारी तियानजिन घोषणा का भी उल्लेख किया, जिसमें आतंकवाद के खिलाफ सामूहिक और दृढ़ रुख सामने आया था। यह घोषणा आतंकवाद और उसके समर्थकों के प्रति शून्य सहिष्णुता की नीति का प्रमाण है। राजनाथ सिंह ने कहा कि आतंकवाद का कोई धर्म या राष्ट्रीयता नहीं होती और किसी भी तरह की शिकायत, चाहे वह वास्तविक हो या काल्पनिक, उसे हिंसा और निर्दोष लोगों की हत्या का औचित्य नहीं ठहराया जा सकता। 

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उन्होंने एससीओ के क्षेत्रीय आतंकवाद निरोधक ढांचे की भूमिका की सराहना करते हुए कहा कि यह मंच कट्टरता, उग्रवाद और अलगाववाद से निपटने में महत्वपूर्ण योगदान दे रहा है। उन्होंने जोर देते हुए कहा कि इन तीनों खतरों से निपटने के लिए एकजुट और ठोस प्रयासों की आवश्यकता है, जिसमें आतंकवादियों के सुरक्षित ठिकानों को खत्म करना और किसी भी प्रकार के राजनीतिक संरक्षण को अस्वीकार करना शामिल है। उन्होंने कहा कि आज के समय में आतंकवाद वैश्विक व्यवस्था के लिए सबसे बड़ा खतरा बन गया है और इसी पृष्ठभूमि में एससीओ जैसे संगठन की प्रासंगिकता और भी बढ़ जाती है। 

अपने संबोधन में उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि क्या दुनिया को एक नई व्यवस्था की जरूरत है या एक अधिक व्यवस्थित विश्व की। उन्होंने कहा कि जरूरत ऐसी व्यवस्था की है जहां हर व्यक्ति को सम्मान और गरिमा मिले, जहां मतभेद विवाद में न बदलें और विवाद आपदा का कारण न बनें। राजनाथ सिंह ने कहा कि वर्तमान संकट किसी व्यवस्था के अभाव का नहीं, बल्कि स्थापित नियम-आधारित विश्व व्यवस्था पर सवाल उठाने की प्रवृत्ति का है। उन्होंने वैश्विक सहमति, सह-अस्तित्व, सह-निवास और करुणा को प्राथमिकता देने की आवश्यकता पर बल दिया। 

उन्होंने एससीओ को प्राचीन सभ्यताओं का घर बताते हुए कहा कि यह क्षेत्र ऐतिहासिक व्यापार मार्गों, सांस्कृतिक आदान-प्रदान और साहसिक परंपराओं का प्रतीक रहा है। आज के समय में जब दुनिया का दृष्टिकोण बिखरा हुआ नजर आ रहा है और देश अधिक आत्मकेंद्रित होते जा रहे हैं, ऐसे में एससीओ की भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो जाती है। अंत में उन्होंने कहा कि भारत एससीओ के उद्देश्यों को लागू करने के लिए रचनात्मक योगदान देने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है। उन्होंने विश्वास जताया कि समानता, पारस्परिक सम्मान और आपसी विश्वास के आधार पर सहयोग को बढ़ाकर एससीओ को शांति और आशा का प्रतीक बनाया जा सकता है। 

Pic Credit : ANI


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