एक तस्वीर और “अजेय चीन”?

Categorized as श्रुति व्यास कालम

वह महज तस्वीर नहीं थी।  केवल एक रस्म नहीं थी। बल्कि भविष्यवाणी, आकाशवाणी की तरह गूंजी। फोटो के बीच में शी जिनपिंग, उनकी एक ओर व्लादिमीर पुतिन, दूसरी ओर किम जोंग-उन। ये तीनों बीजिंग में एक विराट सैन्य परेड के मंच पर सीढ़ियाँ चढ़ते हुए। मौक़ा गंभीर था: द्वितीय विश्व युद्ध की समाप्ति की 80वीं वर्षगांठ। सेना की रोबो जैसी टुकड़ियां, राष्ट्रगान और गूज़ से स्टेप करते सैनिक। भाषण के बोल और स्वर तमाशे से अधिक गहरे। कथानक जितना आकर्षक था, उतना ही ख़तरनाक। दर्जनों विश्व नेता मौजूद थे—ईरान, पाकिस्तान, म्यांमार आदि । पर पश्चिम देश ग़ैरमौजूद। और सबको लगा कि कभी-कभी अनुपस्थिति भी उपस्थिति से ज़्यादा बोलती है।

और भी ज़्यादा मायने वाली बात यह कि धुरी बदलती दिख रही थी। पृथ्वी का पूर्वी क्षेत्र अब वह भूमिका निभाने के लिए आगे बढ़ा जिसे पहले पश्चिम निभाता था—शक्ति का प्रदर्शन, एकता का मंचन, ताक़त की नई परिभाषा। कम से कम तस्वीर यही कह रही थी। एक बारीकी से रची गई छवि, एक सादा संदेश: अब शक्ति का केंद्र वहाँ नहीं है जहाँ दुनिया ने उसे दशकों तक मान लिया था।

परेड केवल तमाशा नहीं थी। यह मांसपेशियों का प्रदर्शन था। चीन ने केवल सैनिकों और नारों की गूंज ही नहीं दिखाई, बल्कि हथियारों की पूरी कैटलॉग पेश की। इंटरकॉन्टिनेंटल बैलिस्टिक मिसाइलें, ध्वनि से तेज़ हाइपरसोनिक वाहन, समुद्र के ऊपर और नीचे उड़ते ड्रोन, ज़मीनी मशीनें जो बिना सैनिक के लड़ सकें या माइन साफ़ कर सकें। यह केवल शक्ति का प्रदर्शन नहीं था, यह क्षमता का ऐलान था।

इतना विशाल हार्डवेयर बताता है कि चीन की औद्योगिक मशीन अब भाषणों के पीछे ठोस हक़ीक़त खड़ी कर सकती है। यह वही शस्त्रागार था जिसका कभी अमेरिका ने द्वितीय विश्व युद्ध जीतने के लिए निर्माण किया था। विडंबना यह कि यह परेड उसी जीत की स्मृति में थी। रेड स्क्वायर की परंपरा से भी भारी: टैंक और तोपें गुज़रतीं, हवाई जहाज़ बेड़े में उड़ते, और 80 हज़ार कबूतर बीजिंग के आसमान में छोड़े जाते हुए। तमाशे के पीछे संदेश साफ़ था—चीन अब वॉशिंगटन के बराबरी की ओर बढ़ रहा है, और शायद उससे भी आगे।

शी ने घोषणा की: “चीन अजेय है।” उन्होंने शांति या टकराव के बीच चुनाव की चेतावनी दी। यह चेतावनी सैद्धांतिक नहीं थी, निशाना सीधा वॉशिंगटन था। चाहे ट्रंप हों या पश्चिम के अन्य नेता, सुनना या न सुनना उनकी मर्ज़ी।

शी का मक़सद केवल सैन्य नहीं था, राजनीतिक भी था। 2012 से सत्ता संभालने के बाद से उन्होंने नियंत्रण को उतना केंद्रीकृत किया है जितना माओ के बाद नहीं देखा गया। शंघाई सहयोग संगठन (SCO) और बीजिंग में नेताओं की भीड़ जुटाकर उन्होंने यह संकेत दिया कि नई व्यवस्था अब बीजिंग से आकार ले रही है। SCO का संयुक्त बयान भी आतंकवाद-रोधी से ज़्यादा इस नए “क्रम” की वैधता पर था। यहाँ तक कि नरेंद्र मोदी ने भी, ट्रंप की टैरिफ़ जंग से आहत होकर, पुराने प्रतिद्वंद्विता को नरम किया और साथ निभाया।

पिछले तीस वर्षों में चीन का रक्षा बजट तेरह गुना से अधिक बढ़ा है। केवल पिछले बारह वर्षों में उसने अमेरिका की बढ़त आधी कर दी। अमेरिका अभी भी तीन गुना ज़्यादा खर्च करता है, पर क्षेत्रीय स्तर पर तस्वीर चौंकाने वाली है: चीन जापान से पाँच गुना, दक्षिण कोरिया से सात गुना ज़्यादा खर्च करता है। एशिया में यह बराबरी का मुक़ाबला नहीं, बल्कि प्रभुत्व की लड़ाई है।

इसलिए शी, पुतिन और किम का एक साथ खड़ा होना संयोग नहीं था। यह संकेत था कि चीन नई धुरी का केंद्र बनने को तैयार है, रूस और उत्तर कोरिया उसके चारों ओर घूमने को तैयार हैं। साथ मिलकर वे पश्चिम के टूटते गठबंधनों का विकल्प प्रस्तुत कर सकते हैं। यह धुरी टिकेगी या नहीं, यह अलग सवाल है। चीन मॉस्को पर उतना ही अविश्वास करता है जितना उसे रिझाता है; उत्तर कोरिया सहयोगी से ज़्यादा बोझ है। लेकिन तस्वीर काम कर रही थी—संशय बो रही थी, अनिवार्यता जता रही थी, भविष्य को लिखा हुआ सा दिखा रही थी।

यही है प्रचार और भविष्यवाणी की शक्ति। दशकों तक पश्चिम मानता रहा कि वैश्विक व्यवस्था स्थायी है, उसका प्रभुत्व स्वाभाविक है। पर व्यवस्था याददाश्त जितनी ही नाज़ुक होती है। जो परेड से शुरू होता है, वह रुख़ बन जाता है, और रुख़ नीति में बदल जाता है। चीन अभी वह महाशक्ति नहीं है जो बनना चाहता है, लेकिन वह भूमिका का अभ्यास कर रहा है, संवाद की रिहर्सल कर रहा है और दर्शक जुटा रहा है।

पश्चिम के लिए ख़तरा केवल यह नहीं कि चीन उठ रहा है, बल्कि यह कि वह अपने उत्थान का अभिनय पश्चिम की “दृढ़ता” से कहीं ज़्यादा विश्वसनीयता से कर रहा है। बीजिंग में लौह ताकत और तमाशा साथ चले: मिसाइलों की गड़गड़ाहट और पश्चिमी नेताओं की चुप्पी—दोनों ने एक ही संदेश दिया। इतिहास की पटकथा संपादित हो रही है, और संपादक अब चीन में बैठा है।

शी, पुतिन और किम की वह तस्वीर शायद केवल प्रतीकात्मक मंचन भर रह जाए। पर यह भी संभव है कि समय के साथ इसे उस बिंदु की तरह याद किया जाए जब दुनिया ने धुरी को झुकते देखा—और केवल देखती रह गई। क्योंकि अगर पश्चिम अनुपस्थित रहता है, तो इतिहास इंतज़ार नहीं करता। उसे कहीं और से कोरियोग्राफ़ कर लिया जाएगा।


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