ओडिशा उच्च न्यायालय ने दशक पुराने चिट फंड घोटाले के आरोपी को किया बरी

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ओडिशा उच्च न्यायालय ने एक दशक पुराने चिट फंड घोटाले के एक मामले में एक रियल एस्टेट एवं निर्माण कंपनी के पूर्व निदेशक को आरोपमुक्त कर दिया है।

न्यायमूर्ति डॉ. संजीव के. पाणिग्रही ने कहा कि अभियोजन पक्ष इंद्रजीत डे के खिलाफ धोखाधड़ी या आपराधिक साजिश का प्रथम दृष्टया मामला साबित करने में विफल रहा।

इंद्रजीत पर आईपीसी की धारा 420, 120-बी और 34 तथा पुरस्कार चिट्स और धन प्रचलन योजनाओं (प्रतिबंध) अधिनियम, 1978 की धारा चार, पांच और छह के तहत मामला दर्ज किया गया था।

अदालत ने पाया कि इंद्रजीत का नाम न तो मूल प्राथमिकी में था और न ही 2016 में दायर की गई पहली सीबीआई आरोपपत्र में शामिल था। अभियोजन पक्ष ने आरोप लगाया कि अवैध धन प्रसार योजना से जुड़ी एक आपराधिक साज़िश के तहत टॉवर इन्फोटेक लिमिटेड ने ईडन इन्फ्रा को 2.50 करोड़ रुपये हस्तांतरित किये थे।अदालत के समक्ष ऐसा कोई सबूत भी पेश नहीं किया जा सका , जिससे यह साबित हो सके कि इंद्रजीत ने निवेशकों को धोखा दिया, लोगों से जमा राशि लेने के लिए उकसाया या कोई गलत जानकारी दी, जिसके कारण यह हस्तांतरण हुआ।

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अदालत ने कहा कि आईपीसी की धारा 420 के तहत अपराध के लिए लेन-देन की शुरुआत में ही बेईमानी की मंशा होनी ज़रूरी है। इसलिए बाद में किसी वाणिज्यिक ज़िम्मेदारी को पूरा न कर पाना अपने आप में धोखाधड़ी नहीं माना जा सकता।

अदालत ने यह भी माना कि भले ही 2.50 करोड़ रुपये के लेन-देन के लिए कोई लिखित समझौता नहीं होने से वाणिज्यिक रूप से सही होने पर शक उत्पन्न हो सकता है लेकिन सिर्फ शक के आधार पर कानूनी रूप से धोखाधड़ी को साबित नहीं किया जा सकता।

अदालत ने टिप्पणी किया कि अदालतों से यह अपेक्षा नहीं की जाती कि वे “अभियोजन पक्ष के लिए मात्र एक डाकघर” की तरह कार्य करें बल्कि उन्हें किसी आरोपी के विरुद्ध मुकदमा चलाने से पहले स्वतंत्र रूप से यह निर्धारित करना चाहिए कि अभिलेख पर उपलब्ध सामग्री कथित अपराधों के आवश्यक तत्वों का खुलासा करती है या नहीं।

अदालत ने हालांकि यह भी स्पष्ट किया कि अगर भविष्य में ठोस सबूत मिलते हैं तो उनके खिलाफ़ नयी कार्यवाही शुरू की जा सकती है।

Pic Credit : ANI


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