चुनाव नहीं जीत पा रहा है एमवीए

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महाराष्ट्र में महा विकास अघाड़ी यानी एमवीए की सबसे बड़ी समस्या क्या है? नेताओं के बयान सुनें तो ऐसा लगता है कि एमवीए की सबसे बड़ी समस्या यह है कि भाजपा उनकी पार्टियों को तोड़ रही है और कमजोर कर रही है। उद्धव ठाकरे की पार्टी में चार साल में दूसरी बार विभाजन हुआ है और शरद पवार की पार्टी भी एक बार टूट चुकी है। अब फिर से पार्टी टूटेगी या दोनों पार्टियां जुड़ेंगी यह देखने वाली बात होगी। तभी विपक्षी पार्टियों के नेता यह रग आलापते हैं कि उनके नेता गद्दार हो गए या भाजपा ने भय और लालच से उनके नेताओं को तोड़ दिया। पर असली समस्या यह नहीं है। असली समस्या यह है कि एमवीए की पार्टियां चुनाव नहीं जीत पा रही हैं। उनको जनता का समर्थन नहीं मिल पा रहा है। एक के बाद एक चुनाव हारते जाने के कारण पार्टी और उसके नेतृत्व के प्रति नेताओं का भरोसा घट रहा है। महाराष्ट्र जैसे राज्य में ज्यादातर नेताओं के लिए सत्ता ऑक्सीजन की तरह है। उसके बगैर ज्यादा समय तक उनका काम नहीं चल सकता है।

एमवीए के हारते जाने की ताजा मिसाल विधान परिषद की 17 सीटों के लिए हुआ चुनाव है। विधान परिषद के लिए स्थानीय निकायों के प्रतिनिधियों द्वारा चुनी जाने वाली 17 सीटों पर मतदान हुआ, जिसमें से 16 सीटें एनडीए ने जीतीं। इनमें से 11 सीटें भाजपा के खाते में गईं। शिव सेना ने तीन और एनसीपी ने दो सीट जीती। नासिक की एक सीट जो एनडीए नहीं जीत पाई वहां भी भाजपा के बागी गोकुल गीते ने शिव सेना के उम्मीदवार को हराया। इससे पहले इसी साल बृहन्नमुंबई महानगर निगम यानी बीएमसी सहित डेढ़ दर्जन शहरी निकायों में चुनाव हुए थे। बीएमसी सहित सभी बड़े शहरों में एमवीए हार गया। हालांकि एमवीए और एनडीए की पार्टियों में हर जगह तालमेल भी नहीं था। ध्यान रहे बीएमसी हारने के बाद ही उद्धव ठाकरे की पार्टी टूटने की चर्चा शुरू हो गई थी क्योंकि बीएमसी ही शिव सेना की लाइफ लाइन रही है। सो, पार्टी टूटने का कारण जन समर्थन कम होना है। अगर वह बढ़े, जनता साथ आए तो पार्टियों का टूटना रूक जाएगा।


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