राष्ट्रपति विवाद में किसकी गलती?

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पश्चिम बंगाल में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू की यात्रा के बाद जिस तरह का विवाद हुआ है वह दुर्भाग्यपूर्ण है। इस विवाद को टाला जा सकता था। राष्ट्रपति को लेकर किसी तरह का विवाद न हो और किसी किस्म की राजनीति से उनको नहीं जोड़ा जाए यह देखने का काम उनके सचिवालय और केंद्र सरकार दोनों का है। पश्चिम बंगाल में चुनाव की घोषणा से एक हफ्ते पहले राष्ट्रपति का एक जातीय सम्मेलन में जाना, चाहे वह कितना भी बड़ा और महत्वपूर्ण सम्मेलन क्यों न हो, कोई अच्छा फैसला नहीं था। राष्ट्रपति संथाल समुदाय से आती हैं और संथाल समुदाय के किसी कार्यक्रम में उनके शामिल होने पर कोई सवाल नहीं उठा सकता है लेकिन यह सिर्फ संयोग नहीं था कि अंतरराष्ट्रीय संथाल कॉन्फ्रेंस का नौवां सम्मेलन पश्चिम बंगाल में हो रहा था और वह भी चुनाव से ठीक पहले।

इसे लेकर सवाल इसलिए भी उठ रहे हैं क्योंकि पिछले 16 साल से यह सम्मेलन नहीं हुआ था। उससे पहले जब 1980 के दशक में अंतरराष्ट्रीय संथाल सम्मेलन की शुरुआत हुई तो हर चार या पांच साल पर सम्मेलन होता था। अगर सिर्फ इस सदी की बात करें तो 2003, 2007 और 2010 में संथाल सम्मेलन हुआ। लेकिन 2010 के बाद यह सम्मेलन बंद हो गया था। अब पश्चिम बंगाल के चुनाव से ऐन पहले पश्चिम बंगाल में ही संथाल सम्मेलन रखा गया तो यह निश्चित रूप से राष्ट्रपति सचिवालय में सोचा जाना चाहिए था कि इसका कोई राजनीतिक अर्थ निकाला जा सकता है। भले कोई राजनीति न हो लेकिन राजनीतिक अर्थ निकाला जा सकता था और ममता बनर्जी ने वही अर्थ निकाला। उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि भारतीय जनता पार्टी की सरकार अपने राजनीतिक लाभ के लिए राष्ट्रपति का इस्तेमाल कर रही है।

दूसरी गलती ममत बनर्जी के स्तर पर हुई। राष्ट्रपति के प्रोटोकॉल और परंपरा दोनों लिहाज से सरकार के किसी वरिष्ठ व्यक्ति को उनके स्वागत के लिए मौजूद रहना चाहिए था। जरूरी नहीं है कि राज्यपाल या मुख्यमंत्री ही मौजूद रहे हैं। लेकिन ममता बनर्जी को किसी मंत्री को नियुक्त करना चाहिए था। इसके अलावा कार्यक्रम की जगह बदलना भी दुर्भाग्यपूर्ण है। लेकिन जब ममता बनर्जी ने यह निष्कर्ष निकाल लिया कि इससे जरिए राजनीति हो रही है तो फिर उन्होंने जो कुछ भी किया उस राजनीति के लिहाज से किया। गौरतलब है कि पश्चिम बंगाल में सात फीसदी के करीब आदिवासी वोट हैं, जिसमें सबसे ज्यादा संथाल हैं।


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