एक मसला बाकी है

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एक बड़ी समस्या बच्चों में ऑनलाइन गेमिंग की बढ़ी लत है। इसे कैसे नियंत्रित और अनुशासित किया जाए, इस चुनौती का सामना तमाम समाजों को करना पड़ रहा है। भारत में क्या किया जाए, यह महत्त्वपूर्ण सवाल है।

ऑनलाइन गेमिंग को विनियमित करने का कानून पारित करने के लगभग एक साल बाद केंद्र ने इस पर अमल के नियम तय किए हैं। स्पष्टतः इनमें गेमिंग के हानिकारक असर और तकनीकी प्रगति के बीच संतुलन बनाने का प्रयास किया गया है। कहा जा सकता है कि इस कोशिश में सरकार काफी हद तक सफल है। ऑनलाइन गेमिंग प्रोत्साहन एवं विनियमन कानून मुख्य रूप से ऑनलाइन जुए को रोकने के लिए बनाया गया था। गेम के नाम पर तब सट्टेबाजी का धंधा इतने बड़े पैमाने पर फैलाया गया कि परिवारों के बर्बाद होने की खबरें आम हो गई थीं। इसका चस्का लगाने के लिए खास कर क्रिकेट मैचों को जरिया बनाया गया।

इसीलिए जब सरकार ने उस पर रोक लगाई, तो समाज के विवेकशील तबकों ने राहत महसूस की। ये अच्छी बात है कि उद्योग जगत की भारी लॉबिंग के बावजूद सरकार अपने इरादे पर अडिग रही है। तय नियमों के तहत जिन गेम्स में पैसे का लेन-देन होता है, उन पर रोक लगी रहेगी। इनमें पोकर, रमी, फैंटेसी स्पोर्ट्स और दांव लगाने से संबंधित गेम शामिल हैं। बाकी ई-स्पोर्ट्स को वैध प्रतिस्पर्धा माना गया है। ऐसे गेम्स को डेवलप करने और संचालित करने पर सामान्यतः कोई रोक नहीं होगी। अगर किसी मामले में सरकार को लगता है कि उस गेम के हानिकारक प्रभाव हो रहे हैं, तो उस पर जरूर रोक लगाई जा सकेगी।

इन पर निगरानी के लिए सूचना तकनीक मंत्रालय के तहत एक ऑनलाइन गेमिंग प्राधिकरण बनाया जाएगा। ये सारे नियम सही दिशा में हैं। लेकिन इन नियमों के दायरे से बाहर रह गई एक बड़ी समस्या बच्चों और किशोरों में ऑनलाइन गेमिंग की बढ़ी लत है। इसे कैसे नियंत्रित और अनुशासित किया जाए, इस चुनौती का सामना तमाम समाजों को करना पड़ रहा है। कुछ देशों में इसकी वैधानिक व्यवस्था की गई है, जिसमें इस रुझान को अनुशासित करने का दायित्व संचालक कंपनियों पर डाला गया है। भारत में इस दिशा में क्या किया जाए, यह महत्त्वपूर्ण सवाल है। लगे हाथ सरकार को इस बारे में भी चर्चा छेड़नी चाहिए थी। बहरहाल, अभी भी देर नही हुई है।


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