हकीकत, जो चेतावनी है

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सात साल बाद बर्नस्टीन रिसर्च ने प्रधानमंत्री को अपनी दूसरी चिट्ठी लिखी है, जिसमें वह भारत को लेकर चिंता में डूबा नजर आया है। इसमें उसने भारत की विकास कथा के लिए खड़ी कठिन चुनौतियों पर रोशनी डाली है।

अंतरराष्ट्रीय इक्विटी रिसर्च एवं ब्रोकरेज फर्म बर्नस्टीन ने पत्र लिख कर प्रधानमंत्री को उन गंभीर आर्थिक स्थितियों से आगाह किया है, जो भारत की विकास कथा के लिए खतरा बन रही हैँ। इसी फर्म ने 2019 के आम चुनाव में भाजपा की बड़ी जीत के बाद भी नरेंद्र मोदी को पत्र लिखा था। तब बर्नस्टीन भारत की संभावनाओं को लेकर आशावादी थी। तब उसने कहा था कि पूंजी मुहैया करवा कर बैंकिंग सिस्टम को दुरुस्त कर लिया जाए और दिवालिया संहिता (आईबीसी कोड) को कारगर बना दिया जाए, तो आर्थिक विकास की पटरी पर भारत तेज रफ्तार से दौड़ सकता है।

अब सात साल बाद बर्नस्टीन रिसर्च भारत को लेकर गहरी चिंता में डूबा नजर आया है। उसने भारत की विकास कथा के लिए खड़ी चुनौतियों पर रोशनी डाली है। कहा है कि रोजगार का प्रश्न अब चक्रीय नहीं रहा, बल्कि यह भारत के अस्तित्व से जुड़ गया है। बर्नस्टीन ने कहा है कि भारतीय कृषि 1970 के दशक के नीति-जाल में अटकी हुई है। नतीजतन, जीडीपी में 15-16 प्रतिशत योगदान के बावजूद इस पर श्रम शक्ति का 42-45 प्रतिशत हिस्सा निर्भर है। पत्र में आगाह किया गया है कि भारत के सामने यह स्थायी खतरा खड़ा है, जिससे वह आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस का निर्माता नहीं, बल्कि उपभोक्ता भर बन कर रह जाएगा।

उधर मैनुफैक्चरिंग में गहराई के अभाव में देश की महत्त्वाकांक्षाएं ठोस आधार नहीं पा सकी हैं। जिन क्षेत्रों में निर्यात बढ़ा है, उनमें भी चीनी पाट-पुर्जों पर 30-40 प्रतिशत निर्भरता बनी हुई है। बर्नस्टीन ने चेताया है कि नकदी ट्रांसफर की योजनाओं की आई बाढ़ के कारण भारत के निम्न उत्पादकता वाला देश बने रह जाने की स्थिति बन रही है। और आखिर में बर्नस्टीन ने दो-टूक कहा है कि कोई देश अनुसंधान एवं विकास पर अपनी जीडीपी का महज 0.6- 0.7 प्रतिशत खर्च कर विकसित नहीं हो सकता। ये वो बातें हैं, जिनकी ओर देश के लिए चिंतित वर्ग अक्सर ध्यान खींचता है। मगर अब खास बात यह है कि वित्तीय पूंजीवाद की प्रमुख वैश्विक संस्थाएं भी वही बात कहने लगी हैं। यह भारत की संभावनाओं पर लगते ग्रहण का परिणाम है।


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