कांग्रेस की समस्याएं खत्म नहीं हो रही हैं

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कांग्रेस पार्टी की समस्याएं खत्म नहीं हो रही हैं। ऐसा लग रहा है कि वहां पार्टी छोड़ने और सबसे बड़े नेता यानी राहुल गांधी पर अटैक करने का कोई सीरियल चल रहा है। एक एक करके नेता पार्टी छोड़ते हैं और राहुल को निशाना बनाते हैं। इनमें से कई लोग ऐसे होते हैं, जो भाजपा में शामिल हो जाते हैं या किसी दूसरी राजनीतिक पार्टी में चले जाते हैं। कई लोग ऐसे भी होते हैं, जो अपनी पार्टी बनाते हैं और कई लोग ऐसे होते हैं, जो सब कुछ करके अप्रासंगिक हो जाते हैं। लेकिन इस सीरियल के नए एपिसोड का आना बंद नहीं होता है। इस सीरियल के एक एपिसोड शशि थरूर का था, जिसे राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खड़गे ने संभाला है। दोनों ने थरूर से मुलाकात की और उनको केरल चुनाव में पार्टी के साथ एकजुट होकर काम करने को कहा। हालांकि उसके तीन दिन बाद ही शशि थरूर ने केंद्र सरकार के बजट की उस तरह से आलोचना नहीं की, जैसी कांग्रेस के दूसरे नेता कर रहे हैं।

बहरहाल, कांग्रेस छोड़ो और राहुल गांधी पर निशाना साधो का जो धारावाहिक पिछले 12 साल से चल रहा है उसकी नई कड़ी में डॉक्टर शकील अहमद, राशिद अल्वी और नसीमुद्दीन सिद्दीकी नए कैरेक्टर हैं। शकील अहमद ने कांग्रेस पहले छोड़ दी थी और राहुल गांधी पर अटैक बाद में किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी पुराने नेताओं के साथ सहज होकर काम नहीं करते हैं। शकील अहमद का कहना था कि जहां राहुल गांधी को लगता है कि वे बॉस की तरह नहीं हैं वहां वे असहज हो जाते हैं। उन्होंने राहुल गांधी असुरक्षा बोध से ग्रसित नेता भी बताया। नसीमुद्दीन सिद्दीकी ने पार्टी छोड़ी लेकिन राहुल गाधी पर हमला नहीं किया। फिर भी उनका तंज गहरा था। उन्होंने कहा कि कांग्रेस के बड़े बड़े नेता चले गए तो मेरे जाने से क्या फर्क पड़ता है। उनकी बात सही है। वे बसपा छोड़ कर कांग्रेस में गए थे और कोई बड़ी भूमिका उन्होंने कांग्रेस में नहीं निभाई थी। लेकिन सवाल है तो है कि बड़े बड़े नेता आखिर क्यों चले गए? क्या शकील अहमद जो कह रहे हैं उस वजह से बड़े नेताओं को पार्टी छोड़ कर जाना पड़ा?

कांग्रेस के पुराने नेता राशिद अल्वी ने भी पार्टी के कामकाज पर सवाल उठाया हालांकि वे पार्टी छोड़ कर नहीं गए हैं। लेकिन ऐसा लग रहा है कि कांग्रेस ने पश्चिम बंगाल की पूर्व सांसद मौसम नूर की पार्टी में वापसी कराई तो तीन मुस्लिम नेताओं ने तेवर दिखाए। पश्चिम बंगाल और केरल के चुनाव से पहले तीन मुस्लिम नेताओं की नाराजगी मामूली बात नहीं है। ध्यान रहे सलमान खुर्शीद भी पहले तेवर दिखा चुके हैं और वे भी ऑपरेशन सिंदूर के बाद दुनिया के देशों में गए थे और सरकार के एजेंडे का समर्थन किया था। असल में अहमद पटेल के निधन और गुलाम नबी आजाद के पार्टी छोड़ने के बाद कई मुस्लिम नेता अपने लिए बड़ी जगह देख रहे थे। सलमान खुर्शीद, शकील अहमद, राशिद अल्वी आदि ऐसे ही नेता हैं। इनका कद भी है और अनुभव भी है। लेकिन कांग्रेस ने राज्यसभा में किसको भेजा, इमरान प्रतापगढ़ी और सैयद नासिर हुसैन को। नासिर हुसैन कर्नाटक के हैं और मल्लिकार्जुन खड़गे के करीबी हैं। पार्टी में पहले से जुड़े हैं। लेकिन इमरान प्रतीपगढ़ी का मामला लोगों को ज्यादा परेशान करने वाला था। वे शायरी करते थे और भाजपा व मोदी विरोधी शायरी पढ कर सभाओं में मजमा लगाते थे। उनको सीधे राज्यसभा भेज दिया गया और वह भी महाराष्ट्र से। वे उत्तर प्रदेश के रहने वाले हैं। उनकी वजह से मुस्लिम नेताओं का मोहभंग हुआ। शकील अहमद के कहने का मकसद यही था। राहुल गांधी जितने सहज होकर इमरान प्रतापगढ़ी से बात करेंगे वह सहजता सलमान खुर्शीद या शकील अहमद के साथ नहीं होगी। दूसरी ओर कांग्रेस की यह भी समस्या है कि जो भी व्यक्ति पार्टी छोड़ता है उसे गद्दार, जयचंद, संघी आदि कहा जाने लगता है। यह भी ध्यान नहीं रखा जाता है कि एक दिन पहले तक वह व्यक्ति कांग्रेस के साथ था और पार्टी में कोई न कोई भूमिका निभा रहा था।


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