एसआईआर पर फिर कोर्ट जाने का क्या मतलब?

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मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर का काम मंगलवार, चार नवंबर से शुरू होने वाला है। उससे पहले तमिलनाडु में डीएमके नेता और राज्य के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन ने सभी पार्टियों की बैठक बुला कर तय किया कि इसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया जाए। उन्होंने कहा कि तमिलनाडु को बिहार नहीं बनने दिया जाएगा। सोचें, बिहार में एसआईआर की प्रक्रिया शुरू हो गई और शुरुआती आपत्तियों को छोड़ दें तो किसी विपक्षी पार्टी को कोई आपत्ति नहीं है। अंतिम मतदाता सूची जारी होने के बाद किसी पार्टी ने एक भी नाम पर आपत्ति नहीं की और न एक नाम जोड़ने के लिए चुनाव आयोग के पास आवेदन पहुंचा। लेकिन तमिलनाडु के मुख्यमंत्री कह रहे हैं कि वे अपने राज्य को बिहार नहीं बनने देंगे!

उधर ममता बनर्जी चार नवंबर को भतीजे अभिषेक बनर्जी को साथ लेकर अपनी पार्टी के नेताओं के साथ सड़क पर उतरेंगी। अब सवाल है कि एसआईआर की प्रक्रिया के खिलाफ फिर से सुप्रीम कोर्ट जाने का क्या मतलब है? ध्यान रहे एसआईआर का मामला अब भी सुप्रीम कोर्ट में लंबित है। उस पर अंतिम फैसला नहीं आया है। लेकिन सिद्धांत रूप में सुप्रीम कोर्ट ने इस पर रोक लगाने से इनकार कर दिया है। तभी ऐसा लग रहा है कि एसआईआर का विरोध जारी रखने का मकसद राजनीतिक है। विपक्षी पार्टियां मतदाताओं को बताना चाह रही हैं कि भाजपा उनका वोट चुराने का प्रयास कर रही है। यह उनके लिए एक अच्छा चुनाव मुद्दा बन गया है। लेकिन अगर किसी सही मतदाता का नाम नहीं कटा तो फिर उसको वोट चुराने के नैरेटिव पर कैसे यकीन दिलाया जा सकेगा?


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