जम्मू कश्मीर विधानसभा में हिंदी का बोलबाला

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एक तरफ जहां तमिलनाडु से लेकर कर्नाटक तक भाषा के आधार पर हिंदी पट्टी के लोगों के साथ भेदभाव की खबरें आ रही हैं और राजनीतिक दल चुनाव में हिंदी विरोध के नाम पर ध्रुवीकरण करा रही है वहीं दूसरी ओर जम्मू कश्मीर से बहुत सुखद खबर है। जम्मू कश्मीर में जहां बुनियादी रूप से सारे कामकाज उर्दू में होते थे वहां अब हिंदी का इस्तेमाल बढ़ रहा है। सरकारी स्तर पर भले नहीं लागू हो लेकिन ऐसा लग रहा है कि व्यावहारिक तरीके से जम्मू कश्मीर में त्रिभाषा फॉर्मूला लागू हो गया है। वहां उर्दू के साथ साथ हिंदी और अंग्रेजी दोनों का इस्तेमाल बढ़ रहा है। आम लोग रोजमर्रा के जीवन में इन तीनों भाषाओं का इस्तेमाल तो कर ही रहे हैं साथ ही सरकारी और विधायी कामकाज में भी हिंदी का चलन बढ़ा है।

पिछले हफ्ते शुक्रवार को खत्म हुए विधानसभा सत्र को लेकर एक रिपोर्ट आई है, जिसमें कहा गया है कि विधानसभा की कार्यवाही में अलग अलग दलों के विधायकों ने हिंदी के ढेर सारे शब्दों का इस्तेमाल किया। कहा जा रहा है कि सही अर्थ में हिंदुस्तानी भाषा में सदन की कार्यवाही चली। हालांकि अभी भी उर्दू की ही प्रधानता है लेकिन हिंदी शब्दों का प्रयोग बढ़ रहा है। रिपोर्ट के मुताबिक संसद या हिंदी क्षेत्र की विधानसभाओं में हिंदी में बोलने वाले सांसद या विधायक जिन शब्दों का इस्तेमाल करते हैं यानी विधायी कामकाज में जिन हिंदी शब्दों का इस्तेमाल होता है उनका चलन जम्मू कश्मीर में बढ़ रहा है। जैसे पिछले सत्र में ‘आपत्ति’ शब्द का इस्तेमाल खूब हुआ है। आमतौर पर हिंदी क्षेत्र में नेता इसका इस्तेमाल करते हैं।

इसी तरह ‘आवश्यक’, ‘दुर्घटना’, ‘कृपया’, ‘अनुरोध’, ‘महोदय’ जैसे शब्दों का भी खूब प्रयोग किया गया। ऐसे ही ‘खेद’, ‘पक्ष में’, ‘हित में’, ‘देश’, ‘समय’, ‘पर्यावरण’ आदि शब्दों का भी विधायकों ने इस्तेमाल किए। इससे पहले इन शब्दों के बदले उर्दू के शब्द इस्तेमाल होते थे या अंग्रेजी के। विधानसभा की कार्यवाही में बार बार श्रद्धालु शब्द का इस्तेमाल हुआ तो ‘परिवार’, ‘आशीर्वाद’, ‘आशा’, ‘माध्यम’ जैसे शब्दों का भी इस्तेमाल किया गया। इनमें कई भारी भरकम शब्द हैं, लेकिन इनका इस्तेमाल विधायी कामकाज में होता है इसलिए माननीय सांसदों और विधायकों की जुबान पर ये शब्द चढ़ जाते हैं। ऐसे शब्द जो आम बोलचाल में कम इस्तेमाल होते हैं उनका भी प्रयोग सदन की कार्यवाही में हुआ।

माना जा रहा है कि जम्मू कश्मीर में पिछले छह साल में हुए बदलावों के कारण हिंदी का चलन बढ़ रहा है। छह साल पहले केंद्र सरकार ने अनुच्छेद 370 समाप्त करके जम्मू कश्मीर का विशेष राज्य का दर्जा खत्म किया था। एक बड़ा बदलाव यह हुआ है कि पांच साल से मनोज सिन्हा उप राज्यपाल हैं, जो बहुत जरूरी होने पर ही अंग्रेजी बोलते हैं। वे अधिकारियों और नेताओं से लेकऱ आम लोगों में हिंदी में ही बात करते हैं। एक तीसरा कारण यह बताया जा रहा है कि परिसीमन के बाद गिनती की सही लेकिन जम्मू क्षेत्र की सीटें बढ़ी हैं और हिंदी बोलने वालों का प्रतिनिधित्व भी बढ़ा है। हिंदी बोलने वाले विधायक सदन में सहज रूप से हिंदी शब्दों का प्रयोग कर रहे हैं। भाजपा के विधायक तो खासतौर से हिंदी का इस्तेमाल ही करते हैं। यह भी कहा जा रहा है कि दिल्ली के केंद्र सरकार और संसद में ज्यादातर कामकाज हिंदी में हो रहे हैं इसलिए राज्यों में भी सरकारी और विधायी कामकाज में हिंदी का चलन बढ़ा है। सो, कारण चाहे जो हो कह सकते हैं कि जम्मू कश्मीर में कम से कम भाषा के स्तर पर पहले से बना हुआ विभाजन कम हो रहा है। बताया जा रहा है कि वे तीन भाषाओं में सारे साइनबोर्ड भी लिखने की तैयारी है। कुछ जगह लिखा भी जाने लगा है।


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