दुनिया जलाने का कौन करेंगा फैसला?

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सबसे चिंताजनक बात सिर्फ बमबारी नहीं, बल्कि नियमों का कमजोर होना है। जब नागरिक संविधान पर भरोसा खोने लगें, जब अंतरराष्ट्रीय कानून वैकल्पिक लगे, जब संस्थाएं निष्पक्ष फैसले न दे सकें, तब ताकत का सिद्धांत हावी होने लगता है। लोकतंत्र का उद्देश्य यही था कि युद्ध जैसे फैसले जनता की सहमति से हों। नेता शक्ति के मालिक नहीं, उसके संरक्षक होते हैं।

युद्ध अक्सर यह कहकर शुरू किए जाते हैं कि वे जरूरी हैं। लेकिन वे अक्सर पछतावे में खत्म होते हैं। ईरान के साथ बढ़ता तनाव हमें फिर उसी मोड़ पर खड़ा कर रहा है। जिन हमलों के कारण अमेरिका और इज़राइल सीधे तेहरान के खिलाफ खड़े हुए हैं, उन पर अब राजनीतिक, कानूनी और नैतिक बहस शुरू हो चुकी है। वॉशिंगटन में सांसद पूछ रहे हैं कि क्या राष्ट्रपति ने युद्ध की शक्ति का सही इस्तेमाल किया। संयुक्त राष्ट्र में विशेषज्ञ चर्चा कर रहे हैं कि क्या आत्मरक्षा का आधार सचमुच मौजूद था। अंतरराष्ट्रीय कानून याद दिलाता है कि युद्ध में भी नियम होते हैं।

लेकिन कानून कोई दूर की चीज नहीं है। उसका असर आम आदमी की जिंदगी पर पड़ता है। पेट्रोल की कीमत बढ़ती है। सेना में भर्ती का नोटिस आता है। तेहरान, तेल अवीव या दुबई में कोई परिवार फोन हाथ में लिए यह संदेश पढ़ने का इंतजार करता है कि “मैं सुरक्षित हूं।” युद्ध की कीमत वही लोग चुकाते हैं जिनका फैसला लेने में सीधा हाथ नहीं होता।

जो लोग सख्ती का समर्थन करते हैं, उनका कहना है कि ईरान के मिसाइल कार्यक्रम और उसके समर्थित समूहों की गतिविधियां जवाब मांगती थीं। कुछ अमेरिकी अखबार लिखते हैं कि यदि किसी देश की धमकियां खाली साबित हों, तो उसकी विश्वसनीयता घटती है और खतरा बढ़ता है। उनका तर्क है कि कमजोरी दिखाने से संघर्ष और बढ़ सकता है।

लेकिन दूसरे पक्ष का कहना है कि बिना साफ लक्ष्य के ताकत का इस्तेमाल भटकाव है। किसी नेता को हटाने से देश स्थिर नहीं हो जाता। अगर यह तय न हो कि अंत में क्या हासिल करना है, तो युद्ध ऐसा दरवाजा बन जाता है जिसमें प्रवेश तो आसान है, लेकिन बाहर निकलना मुश्किल। अमेरिका के संविधान में युद्ध घोषित करने की शक्ति कांग्रेस को इसलिए दी गई थी ताकि कोई एक व्यक्ति जल्दबाजी में देश को लंबे संघर्ष में न धकेल दे। यदि स्पष्ट अनुमति के बिना लड़ाई बढ़ती है, तो यह सिर्फ कानून को नहीं, लोकतांत्रिक व्यवस्था को भी कमजोर करती है।

कुछ विशेषज्ञ याद दिलाते हैं कि कूटनीति से पहले भी समाधान निकले हैं। ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर समझौता हुआ था, जिसमें निगरानी और प्रतिबंधों में ढील के बदले नियंत्रण तय हुआ था। अगर बातचीत का रास्ता छोड़कर सिर्फ ताकत का रास्ता अपनाया जाए, तो कट्टर ताकतों को बल मिल सकता है और हथियारों की दौड़ तेज हो सकती है।

अमेरिका में भी मतभेद हैं। कुछ लोग कहते हैं कि बड़े फैसले आम जनता की राय से दूर लिए जाते हैं। उन्हें लगता है कि सत्ता में बैठे लोग अपने नजरिये से निर्णय लेते हैं, जबकि आम नागरिकों पर उसका असर पड़ता है। इराक और अफगानिस्तान के लंबे युद्धों के बाद अमेरिका में थकान है। इज़राइल और ईरान के लोग भी लगातार तनाव में जीते-जीते थक चुके हैं। जब लोगों को लगता है कि युद्ध उनकी इच्छा से नहीं, बल्कि ऊपर से थोपा गया है, तो असंतोष बढ़ता है।

इस बीच दुनिया की अर्थव्यवस्था चुपचाप सब सुनती है। होरमुज़ जलडमरूमध्य से दुनिया के तेल का बड़ा हिस्सा गुजरता है। अगर वहां हल्का भी संकट होता है, तो तेल की कीमतें बढ़ जाती हैं। अगर कीमत 130 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर टिक जाए, तो असर सिर्फ पश्चिम एशिया तक सीमित नहीं रहेगा। मुंबई में खाने-पीने की चीजें महंगी होंगी, नैरोबी में बस का किराया बढ़ेगा, बर्लिन में हीटिंग महंगी होगी। महंगाई किसी विचारधारा से नहीं, सीधी गणना से चलती है।

संयुक्त राष्ट्र, जिसे युद्ध रोकने के लिए बनाया गया था, कमजोर दिख रहा है। सुरक्षा परिषद में वीटो के कारण कई फैसले अटक जाते हैं। जांच तो होती है, पर कार्रवाई अक्सर अधूरी रह जाती है। जब कानून के साथ सख्त परिणाम न जुड़े हों, तो उसका असर कम हो जाता है।

कुछ लोग सुधार की बात करते हैं। जैसे कि आपात स्थिति में तुरंत बैठक बुलाने के नियम हों, या युद्ध से जुड़े फैसलों की स्वतंत्र समीक्षा हो, या हथियारों की बिक्री को मानवीय नियमों से जोड़ा जाए। ये उपाय युद्ध को पूरी तरह नहीं रोकेंगे, लेकिन जल्दबाजी कम कर सकते हैं।

आज एक और खतरा है—तेजी। सोशल मीडिया पर खबरें और अफवाहें तेजी से फैलती हैं। गुस्सा तथ्यों से पहले पहुंच जाता है। नेता सिर्फ दुश्मनों को नहीं, जनता की प्रतिक्रिया को भी देखते हैं। गलत जानकारी मिसाइल से तेज फैलती है। ऐसे माहौल में संयम सबसे कठिन लेकिन सबसे जरूरी कदम है।

अगर यह संघर्ष सीमित रहता है, तो इतिहास इसे नियंत्रित संकट कह सकता है। लेकिन अगर यह फैलता है—अगर अन्य देश इसमें शामिल होते हैं, अगर समुद्री रास्ते बंद होते हैं, अगर रक्षा प्रणाली टूटती है—तो असर लंबे समय तक रहेगा। तेल का झटका अर्थव्यवस्था को मंदी में धकेल सकता है। मंदी राजनीति को कट्टरता की ओर ले जा सकती है। यह सिलसिला नया नहीं है।

सबसे चिंताजनक बात सिर्फ बमबारी नहीं, बल्कि नियमों का कमजोर होना है। जब नागरिक संविधान पर भरोसा खोने लगें, जब अंतरराष्ट्रीय कानून वैकल्पिक लगे, जब संस्थाएं निष्पक्ष फैसले न दे सकें, तब ताकत का सिद्धांत हावी होने लगता है। लोकतंत्र का उद्देश्य यही था कि युद्ध जैसे फैसले जनता की सहमति से हों। नेता शक्ति के मालिक नहीं, उसके संरक्षक होते हैं।

जब फैसले लेने वाले और उनके परिणाम भुगतने वाले लोगों के बीच दूरी बढ़ती है, तो भरोसा टूटता है। सुरक्षा के नाम पर छोड़ी गई मिसाइल किसी ऐसे मोहल्ले में गिर सकती है, जहां रहने वाले उस नीति को जानते तक नहीं जिसने उसे उचित ठहराया।

युद्ध सीमाएं बदलते हैं, बजट बदलते हैं, यादें बदलते हैं। लेकिन एक सवाल पीछे रह जाता है—क्या यह सचमुच आखिरी और एकमात्र रास्ता था? यही सवाल अदालतों में, संसदों में, बाजारों में और शरणार्थी शिविरों में गूंजता रहता है। यही सवाल इतिहास के पन्नों के बीच ठहरता है, जब धुआं छंट चुका होता है लेकिन पछतावा बाकी रहता है।


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