जेपीसी पर सारी पार्टियां खामोश हैं

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गिरफ्तारी और 30 दिन की हिरासत पर मंत्रियों, मुख्यमंत्रियों और प्रधानमंत्री को पद से हटाने का कानून बनाने के लिए लाए गए तीनों विधेयकों पर विचार के लिए बनी संयुक्त संसदीय समिति यानी जेपीसी का गठन नहीं हो पाया है। गठन तो छोड़िए अभी तक किसी भी पार्टी ने इसके लिए नाम नहीं भेजे हैं। लोकसभा स्पीकर ओम बिरला ने पिछले दिनों सभी पार्टियों को नाम भेजने के लिए चिट्ठी लिखी थी। लेकिन खुद ओम बिरला ने शनिवार, 13 सितंबर को बताया कि किसी पार्टी ने नाम नहीं भेजे हैं। यह भी दिलचस्प है कि किसी भी पार्टी ने इस जेपीसी का बहिष्कार करने की चिट्ठी भी स्पीकर को नहीं भेजी है। हालांकि तृणमूल कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, उद्धव ठाकरे की शिव सेना, आम आदमी पार्टी आदि ने ऐलान कर दिया है कि वे बहिष्कार करेंगे। तृणमूल ने बताया है कि पहले भी जेपीसी का बहिष्कार होता रहा है। बोफोर्स बनी जेपीसी का छह दलों ने बहिष्कार किया था, जिसमें से दो दल, टीडीपी और असम गण परिषद अभी एनडीए में हैं। यह इसलिए याद दिलाया गया है ताकि भाजपा और एनडीए के नेता यह नहीं कह सकें कि बहिष्कार करने वाली पार्टियां संविधान विरोधी हैं।

बहरहाल, तीन बिल पेश होकर और लोकसभा से मंजूर होकर जेपीसी के पास भेजे जाने के तीन हफ्ते से ज्यादा हो जाने के बावजूद पार्टियां इस पर फैसला क्यों नहीं कर रही हैं? सवाल के साथ दो जरूरी सवाल हैं। पहला तो यह कि कांग्रेस किस बात का इंतजार कर रही है? एक बार कांग्रेस का फैसला हो जाएगा तो फिर तस्वीर साफ हो जाएगी? कांग्रेस के फैसले के कारण डीएमके, राजद, जेएमएम आदि का फैसला रूका है। ये तीनों पार्टियां ‘इंडिया’ ब्लॉक का हिस्सा हैं और दो पार्टियों की तो सरकार है, जिसमें कांग्रेस शामिल है। जानकार सूत्रों का कहना है कि कांग्रेस लोकप्रिय भावना का आकलन कर रही है। उसको लग रहा है कि ज्यादातर पार्टियां इस बिल के खिलाफ हैं। कोई नहीं चाहता है कि ऐसा कानून बने, जिससे 30 दिन हिरासत में रहने के बाद मंत्री पद चला जाए। पार्टियां चाहती हैं कि इस मामले में यथास्थिति रहनी चाहिए। यानी यह व्यवस्था चले कि नेता गिरफ्तारी के बाद नैतिकता के आधार पर पद छोड़ दें। लेकिन केजरीवाल जैसे नेता हुए तो क्या होगा?

दूसरा अहम सवाल है कि सरकार की समर्थक पार्टियां यानी एनडीए के घटक दलों की ओर से स्पीकर को नाम क्यों नहीं भेजे जा रहे हैं? स्पीकर ने शनिवार को कहा कि किसी ने नाम नहीं भेजा है इसका मतलब है कि भाजपा और उसकी सहयोगी पार्टियों ने भी नाम नहीं भेजा है। तभी सवाल है कि क्या एनडीए में भी इस बिल को लेकर किसी तरह का संशय है? या एनडीए की पार्टियों ने नाम तय कर लिए हैं और विपक्षी गठबंधन का इंतजार कर रही हैं? ये बहुत दिलचस्प सिनेरियो है। ऐसा लग रहा है कि सरकार और सत्तारूढ़ गठबंधन बहुत ज्यादा सावधानी से इस पर काम कर रहे हैं। दोनों नहीं चाहते हैं कि मनमाने तरीके से काम करने का मैसेज जाए या कुछ ऐसा हो जाए, जिससे बाद में शर्मिंदा होना पड़े। तभी भाजपा, जनता दल यू, टीडीपी, शिव सेना आदि की ओर से नाम नहीं भेजा जा रहा है। उनको लग रहा है कि अगर नाम सार्वजनिक हो जाए और विपक्ष बहिष्कार कर दे तो कोई भी फैसला मुश्किल हो जाएगा। तब या तो बिना विपक्ष के जेपीसी बना कर विचार करना होगा या जेपीसी का विचार छोड़ना होगा। तभी सत्तारूढ़ गठबंधन भी चुपचाप इंतजार कर रहा है।


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