पैथेटिक भारत, बेचारे लोग!

Categorized as हरिशंकर व्यास कालम

मैं शनिवार शाम एक शादी समारोह में था। लोगों को सुनते-देखते हुए मौके की फील ले रहा था। तभी एक रिटायर अफसर ने पूछा- कुछ खबर है, मोदीजी ने आठ बजे क्या कहा? अब मैं न भाषण सुनता हूं और न सोशल मीडिया देखता हूं, सो बेखबर था। पर स्वयंस्फूर्त मैंने कहा, क्या कहेंगे? कहा होगा, देखो, नारी वंदन बिल को विपक्ष ने पास नहीं होने दिया! और वही था। सोचें, भारत, भारत का प्रधानमंत्री, लोकशासन और लोकव्यवहार कब इतना प्रीडिक्टेबल था जितना आज है! क्योंकि भारत आज वह देश है, जिसके जीने में धोखे, झूठ के अलावा कुछ भी नहीं है। भारत न केवल झूठ में जीता है, बल्कि चौबीसों घंटे झूठ के उस प्रदूषण में जीता है, जिससे 140 करोड़ लोगों को न केवल भूलने की बीमारी हो गई है, बल्कि झूठ का कार्बन देश की अनिवार्यता है।

और जैसे भारत के भीतर सब प्रीडिक्टेबल है वैसे विश्व राजधानियों में भारत का अर्थ,रीति-नीति सब प्रीडिक्टेबल है। सभी देशों को मालूम है कि उसके कैसे नेता है और वे किस आचारण और लुढकते या झूठे है।

सोचें, बारीकी से यह सत्य बूझें कि नरेंद्र मोदी, अमित शाह दिन के चौबीस घंटों में से कितने घंटे नए-नए झूठ, नई-नई झूठी चाल, नए-नए झूठे मोहरे, नए-नए झूठे हेडलाइन, नैरेटिव, बाइट बनवाने, ब्रीफिंग करवाने में खपाते होंगे? दस-बीस या आधा घंटा भी ये लोग लोगों के सत्य, देश के सत्य, देश की ऑक्सीजन का ख्याल नहीं करते होंगे।

कैसा भोंडा, छिछला, बेशर्म जुमले के ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम, 2023’ का तमाशा था! फिलहाल का सत्य सिलेंडर की चिंता में ग्रामीण, गरीब के घर-चूल्हे में औरतों का जीवन है। अनुभव करना हो तो दिल्ली के झुग्गी-झोपड़ी इलाकों में रह रही महिलाओं, घरों में काम करने वाली कामवालियों से बात करें- सब बेहाल, बेचैनी के चेहरे हैं। हाल में नोएडा में मजदूरों के शोषण के किस्सों में यह जानकारी भी मिली कि एनसीआर क्षेत्र में लेबर सेवा सप्लायर (नाई, टॉयलेट, सफाई, घरेलू कामवालियों, खाना-सामान घर पहुंचाने जैसी सर्विस की लाखों-करोड़ों नौजवान भीड़) ऐप आधारित कंपनियों ने महिला कर्मियों की बेइंतहा भीड़ बढ़ाई है, लेकिन बेचारियों को जहां मात्र आठ-दस हजार रुपए मिलते हैं वही उन्हें कार्यक्षेत्र में पेशाब करने की सामान्य टॉयलेट जैसी बुनियादी सुविधाएं भी नहीं हैं।

और मोदीजी दिखला रहे नारी शक्ति वंदन! इससे उन्हे उम्मीद हैं कि दिल्ली या देश भर से वोट देने के लिए लौट रही ग्राम्य बंगाल की गरीब महिलाएं मोदी को वोट देंगी क्योंकि वे उन्हें एमएलए, एमपी बनाना चाहते हैं, जबकि ममता की पार्टी, कांग्रेस और राहुल गांधी ने अड़ंगा लगाया। सोचें, देश की एकमात्र दबंग, महिला शक्ति की पर्याय ममता बनर्जी को मिटाने के लिए मोदी सरकार ने बारह वर्षों में जैसे झूठ, जैसे प्रपंच किए, वह किसी भी कसौटी में, किसी भी तरह की मानवीयता, राजनीतिक-नैतिक मर्यादा में क्या जायज है? लेकिन झूठ, अहंकार, भूख की इंतहां देखें कि देश में एक भी महिला नेत्री का सत्ता में रहना इसलिए बरदाश्त नहीं है क्योंकि वह विपक्ष की है।

ममता में दस खराबियां हो सकती हैं। कहते है बंगाल में मुसलमान फैल रहे हैं, दबंगई दिखा रहे हैं, हिंदू बेचारे हो गए है, लेकिन यदि पूरे देश में ही हिंदू बेरोजगारी, सिलेंडर, नौकरी, दिन में बारह घंटों की अमानवीय मजदूरी और दस-बारह हजार महीने की पगार की बेचारगी वाली जिंदगी जी रहे है तो पूरे देश में भी हिंदू कैसा जीवन जीता हुआ है?

एक और हकीकत। बेसमय के बेतुके ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम, 2023’ पर बंगाल, दिल्ली में कयासबाजी है कि मोदी-अमित शाह-चुनाव आयोग ने बंगाल का चुनाव फिक्स कर दिया है। मतलब भाजपा सौ टका जीत रही है, तो मोदीजी ने लोकसभा में नारी शक्ति बिल लाकर, विपक्ष से हारने की नैरेटिव की प्लानिंग करके, नतीजों के बाद का यह निष्कर्ष पहले की बना दिया है कि विपक्ष ने नारी शक्ति बिल पास नहीं होने दिया तो बंगाल की औरतों ने ममता को हराने की ठानी। बंगाल की नारियों ने मोदी के राजतिलक की कसम खाई इसलिए वोटर लिस्ट की हेराफेरी से नहीं, बल्कि बंगाल में भाजपा की जीत असल है!

ओह! भारत आज कितने लेवल के झूठों में जी रहा है! इसलिए क्योंकि आबोहवा में सत्य का ऑक्सीजन लगभग खत्म है। किसी भी तरह के नैरेटिव में शासन, राजनीति, अर्थव्यवस्था, समाज, संस्था, रिश्तों में मंशागत सत्य झलकेगा ही नहीं।

सो, भारत अब उस मुकाम पर है, जिसमें झूठ की बोली के तरह-तरह के नैरेटिव जीवन की मानों अनिवार्यता हो। नरेंद्र मोदी ने राष्ट्र के नाम रात के आठ बजे के संबोधन में ममता बनर्जी से अधिक कांग्रेस को गालियां दीं। क्यों? इसलिए कि यदि ममता बनर्जी जीत गईं तो संभव है आगे चंद्रबाबू नायडू की तरह ममता का भी उपयोग हो। या ममता पर ही फोकस रखा, और ममता को यदि इश्यू बनाने का मौका मिला, तो बांग्ला महिला वोट में भाजपा को लेने के देने भी पड़ सकते है।  मतलब नरेंद्र मोदी को सत्ता के शतरंज के हर खाने के विकल्पों में तिकड़में सोचनी होती है। हर दांव, हर भाषण में प्रपंच झूठ ऐसे हैं कि प्रतिक्रियाएं भी झूठ से लथपथ!

सत्य की तनिक भी गुंजाइश नहीं। तभी अब चुनाव कवर करने, लोगों के सत्य को बूझने का न पत्रकारों में कोई कौतुक है और न जनता में चुनावों को लेकर पहले जैसा उत्साह। भारत की यह नई विचित्र तस्वीर है। एक तस्वीर है जो बोली जाती है और एक है जो जी जाती है मगर जो अब हमेशा ओझल रहती है।

एक तरफ जुमलों, भाषणों, ललकारों, हवाबाजी की ताकत का शोर है। और इससे वैश्विक मायनों में भी भारत पैथेटिक है। दुनिया में वह पूरी तरह अप्रासंगिक है। प्रमाण पड़ोस की खाड़ी का युद्ध है। इसने भारत का वह सत्य उजागर किया है, जिससे दुनिया की हर राजधानी में बूझा जा रहा होगा कि भारत काम का न काज का, दुश्मन अनाज का।

याद करें, पिछले बारह वर्षों में विश्व शक्ति, विश्व गुरु, विकसित अर्थव्यवस्था की हवाबाजी तो दुनिया का हर नेता, हर देश मानों मोदी को सलामी देता हुआ!  भारत जी-20, ब्रिक्स के नेता के अहंकार में डूबा हुआ कभी यह कहता हुआ कि यूरोप को अक्ल नहीं तो कभी पाकिस्तान को दलाल बताता हुआ। इतना ही नहीं, ट्रंप की सरकार बनवाने के लिए भी नरेंद्र मोदी का अमेरिका की जमीन में यह नारा लगवाना कि अबकी बार ट्रंप सरकार। मतलब अमेरिका में मनचाही सरकार बनवा दे रहे! सो, थोथा चना बाजे घना- झूठों का वह रेला, जिसमें बातें बड़ी-बड़ी, लेकिन परीक्षा का समय आया तो मुंह चुरा कर दुबके हुए।

इसलिए आश्चर्य नहीं कि दूसरे देशों में वहां के प्रधानमंत्री, सरकारें तेल-ईंधन, गैस, महंगाई, लड़खड़ाती विकास दर पर राष्ट्र को भाषण देते हुए है या उनकी संसद में ईंधन संकट विचार-बहस है वही प्रधानमंत्री मोदी और भारतीय संसद ने नारी वंदना में शक्ति परीक्षण का अखाड़ा सजाया।

ऐसे में बेचारे लोगों का यह देखना, सोचना संभव ही नहीं कि पाकिस्तान राष्ट्र-राज्य ने कैसे संकट को अपना अवसर बनाया।

पता है, एक महीने में पाकिस्तान की सेना खाड़ी में कितनी जगह अपने सैनिक अड्डे बनाते हुए है? भारत के प्रधानमंत्री ने खाड़ी के देशों के राष्ट्रीय सम्मान की कई कंठमालाएं अपने गले में पहनीं। पर पाकिस्तानी प्रधानमंत्री और उनका जनरल मुनीर पाकिस्तान के झंडे को सऊदी अरब, कतर में सैनिक उपस्थिति से गाड़ रहे हैं। पाकिस्तान वैश्विक पंच बना है। चीन और अमेरिका का वह भरोसेमंद है, तो ईरान, रूस भी उस भरोसा करते हुए, उसे समर्थ मानते हुए!

खाड़ी का युद्ध साफ कर दे रहा है कि अमेरिका और चीन की दो धुरी में अब विश्व राजनीति हैं। पाकिस्तान न केवल इन दोनों का, बल्कि इस्लामी-अरब देशों का एक तरह से संरक्षक देश भी बन बैठा है। रातों रात संकट पैदा हुआ और रातों रात दुनिया की नई तस्वीर उभरी। इस तस्वीर में न तो भारत और न नरेंद्र मोदी।

मोदी कहां चले गए? वे असम, बंगाल को जीत रहे हैं! वे इन राज्यों में कथित दुश्मनों, पाकिस्तान की पर्यायी भीड़ को हराने की आवश्यकता का वह नैरेटिव बनाए हुए हैं, जिसका निचोड़ है- न केवल पैथेटिक भारत, भारत की पैथेटिक लड़ाइयां और इनके शोर के कार्बन के मारे बेचारे लोग!

बेचारे लोगों को भक्त कहें या विरोधी, संतुष्ट या असंतुष्ट—असल बात यह है कि पृथ्वी पर युद्ध से सर्वाधिक प्रभावित जनसंख्या यदि कोई है, तो वे भारत के बेचारे लोग हैं। जबकि मोदी सरकार, शासन, व्यवस्था इन्हें बेचारा नहीं मानती। इनके झूठ में यह वह हिंदू ताकत है, हिंदू गौरव है, विश्वगुरुता का वह जयघोष है, जिस पर दुनिया हतप्रभ है।

इसलिए बेचारे लोगों का जीवन, उसकी कराह, दिक्कतें, प्रतिध्वनियां अनसुनी, अनसमझी हैं। भाव यह कि ऐसा है भी तो क्या हुआ, मोदीजी है न! लोग जिंदा तो हैं। भारत दुनिया का सबसे बड़ा बाजार तो है। और बाजार की खातिर रोड, हाईवे, एक्सप्रेसवे, बिजली का इंफ्रास्ट्रक्चर का विकसित भारत भी है।

क्या यह पैथेटिक भारत की दयनीयता का प्राथमिक सत्य नहीं है? भारत दुनिया का बाजार बन गया, मगर इसका न भान है और न बेचारे लोगों के भीतर बाजार में अपने स्थान, दशा-दिशा का बोध और विचार की गुंजाइश।

तभी पैथेटिक भारत में कोई जवाबदेह नहीं है। विश्व में भारत मनुष्यों का वह समाज है, जिसने लोकतंत्र में रहते हुए भी अपने यथार्थ से असहज होना छोड़ दिया है। और यही पैथेटिक भारत और बेचारी भीड़ का इक्कीसवीं सदी का सत्य है।


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