‘नरककुंड’ मोदी, केजरीवाल, चड्ढा

Categorized as हरिशंकर व्यास कालम

ये चार शब्द! मतलब गुजरे सप्ताह की चार सुर्खियां! और इनमें सर्वाधिक चौंकाने वाली बात जो अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप (जिनके लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने क्या कुछ नहीं किया!) ने भारत को ‘हेलहोल्स’ बताया। ‘नरककुंड’ की भारत ख्याति बनाई। अपने सोशल मीडिया अकाउंट में उन्होंने अपने रूढ़िवादी भक्त रेडियो होस्ट माइकल सैवेज के “hellhole on the planet” (पृथ्वी के नरक) बतलाए जाने वाले बयान को रिपोस्ट किया।

सोचें, यदि अमेरिका को गाली देने वाले ऐसे किसी भारतीय पॉडकास्ट या वीडियो को प्रधानमंत्री मोदी अपने मीडिया प्लेटफॉर्म से नत्थी करके प्रसारित करते तो अमेरिका में कैसी प्रतिक्रिया होती? सभी एक सुर में भारत पर पिल पड़ते। यों माइकल सैवेज ने चीन को भी ‘नरककुंड’ बताया है। लेकिन चीन को लेकर अमेरिका में नफरत, उसे निरंकुशता का नरक माना जाना पुराना है। फिर यह भी अब हकीकत है कि वह अमेरिका को हैसियत दिखला रहा है।

जबकि भारत और प्रवासी भारतीयों का ऐसा कोई पहलू नहीं है, जिसे आधार बनाकर अमेरिका में भारत को नरक करार दिया जाए। एनआरआई पेशेवरों, आईटी कुलियों का अमेरिका की प्रभुता बढ़ाने में पॉजिटिव योगदान है। मौजूदा उप राष्ट्रपति की पत्नी भारतीय मूल की हैं। राष्ट्रपति पद के लिए पिछली डेमोक्रेटिक उम्मीदवार व उप राष्ट्रपति कमला हैरिस की मां भारत से गई थीं। गूगल के सुंदर पिचई जैसे ढेरों प्रवासी भारतीय अमेरिकी कंपनियां संभाल रहे हैं।

तब अचानक ऐसा कैसे कि ट्रंप ने शपथ लेने के तुरंत बाद पहले अवैध रूप से अमेरिका गए भारतीयों को हथकड़ी पहनाकर भारत लौटाया। दुनिया को उसके वीडियो दिखलाए। भारत पर मनमाना, रिकॉर्ड तोड़ टैरिफ लगाया। मई 2025 के ऑपरेशन सिंदूर के बाद तो भारत को, नरेंद्र मोदी को ट्रंप ने इतनी तरह से झूठा ठहराया, इतना बेइज्जत किया मानों ट्रंप प्रशासन की प्राथमिकता भारत, भारत की सैन्य क्षमता या इमेज को रसातल में पहुंचाना है। पाकिस्तान के जनरल मुनीर को व्हाइट हाउस में निजी तौर पर लंच कराया। खाड़ी की ताजा जंग में पाकिस्तान की कूटनीतिक क्षमता का वैश्विक नगाड़ा बजा रखा है। संकेत साफ है कि अमेरिकी अनुदारवादियों में, ट्रंप के भक्तों में भारत के प्रति नस्लीय चिढ़, नफरत पैठ गई है। वही डेमोक्रेटिक पार्टी और उसके नेताओं में (सोचें, उप राष्ट्रपति रहते कमला हैरिस एक बार भारत नहीं आईं और न वे नरेंद्र मोदी से अमेरिका में मिलीं) अलग लोकतांत्रिक कसौटियों में मोदी सरकार से नफरत थी और है!

ऐसे में भारत के ट्रंप विरोधी रवैए से क्या अमेरिका की उदारवादी, डेमोक्रेटिक पार्टी में कोई प्रतिक्रिया होगी? क्या इनमें भारत के प्रति सहानुभूति बनेगी? यों भारत एक ‘नरककुंड’ की बात अमेरिका की अंदरूनी राजनीति के ‘इमिग्रेशन’ मसले से है। बाकी सभी देशों के लोगों के साथ अमेरिकी चाह रहे हैं कि गैर अमेरिकी परिवारों के अमेरिका में रहते हुए बच्चे के जन्म से उसे अमेरिकी नागरिकता का अधिकार नहीं मिले। अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट में बहस चल रही है। पर अमेरिका में, ट्रंप प्रशासन, अनुदारवादियों, वॉशिंगटन की कुलीन जमात में नफरत के निशाने में लातिनी आबादी, मुसलमान, चीनी, हैती, अश्वेत, कम्युनिस्ट रहे हैं। भारत, प्रवासी भारतीय फोकस में कभी नहीं रहे। मेरा प्रत्यक्षत: अनुभव है कि रिपब्लिकन पार्टी के अनुदारवादी उप राष्ट्रपति एच डब्ल्यू बुश (मई 1984 में भारत आए थे, दिल्ली के दूतावास में उनकी प्रेस कॉन्फ्रेंस थी, मैं उसमें था और एक वामपंथी पत्रकार (जॉन दयाल) ने उनसे ढेड़ा सवाल किया तो बुश ने उसके चेहरे, दाढ़ी, भाव भंगिमा को समझ कटाक्ष से जवाब दिया- चाहो न चाहो लोकतांत्रिक अमेरिका और भारत के संबंध स्वाभाविक हैं।

फिर उनके बेटे जॉर्ज डब्ल्यू बुश ने बतौर राष्ट्रपति भारत आकर डॉ. मनमोहन सिंह से 2008 में वह एटमी करार किया, जिसके कम्युनिस्ट घोर विरोधी थे। लेफ्ट ने डॉ. मनमोहन सिंह की सरकार खतरे में डाल दी थी। पर मनमोहन सिंह ने लौह हिम्मत दिखाई और विश्व राजनीति से भारत का अछूतपन खत्म हुआ। ऐसे ही डेमोक्रेटिक पार्टी के नेताओं ने भारत को लगातार अहमियत दी। इमरजेंसी की मरणावस्था से जब 1977 में भारत का लोकतंत्र वापस जिंदा हुआ तो डेमोक्रेटिक पार्टी के जिमी कार्टर 1978 में दिल्ली आए। उनके लिए दिल्ली के कनॉट प्लेस में उमड़ी भीड़ ऐतिहासिक थी। मैंने वह भी समय देखा जब प्रधानमंत्री नरसिंह राव के साथ वॉशिंगटन, व्हाइट हाउस जाने का मौका मिला और उस यात्रा का एक परिणाम था जो भारत के आईटीकर्मियों के लिए क्लिंटन प्रशासन ने विशेष वीजा बनाया।

उस नाते हकीकत है कि अमेरिका में भारतीयों का जाना, सिलिकॉन वैली में आईटीकर्मियों का छाना नरसिंह राव के उदारवाद तथा डॉ. मनमोहन सिंह की वैश्विक प्रतिष्ठा और साख का नतीजा था। इन दो प्रधानमंत्रियों से भारत की उभरते देश की वैश्विक ख्याति हुई। भारत की, प्रवासी भारतीयों की पहचान और संख्या दोनों बढ़ी!

उस पहचान पर अब ट्रंप का ‘नरककुंड’ वाला ठप्पा है! और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी में प्रतिवाद की हिम्मत नहीं है! भारत के विदेश मंत्रालय ने जरूर बयान दिया, यह कहते हुए कि माइकल सैवेज की टिप्पणी “अज्ञानपूर्ण, अनुचित और बेहद भद्दी” है। यह मामूली तंज भी नहीं कि हैरानी है जो राष्ट्रपति ट्रंप ने इसका प्रसार किया। सोचें, ट्रंप का नाम लेने में संकोच। जबकि दिल्ली के अमेरिकी दूतावास ने बात को समझते हुए सफाई दी कि “राष्ट्रपति ने कहा है, ‘भारत एक महान देश है, और उसके शीर्ष (नरेंद्र मोदी) पर मेरा एक बहुत अच्छा मित्र है!’ तब क्या प्रधानमंत्री मोदी को फोन उठाकर अपने कथित ‘बहुत अच्छे मित्र ट्रंप’ को इतना भी नहीं कहना था कि आपसे ऐसी ‘अज्ञानपूर्ण’ रिपोस्ट की उम्मीद नहीं थी!

सोचें, एक डॉ. मनमोहन सिंह का मौन था, जिससे भारत का एटमी अछूतपन खत्म हुआ। भारत उभरती महाशक्ति कहलाया वही बारह वर्षों से एक प्रधानमंत्री मोदी हैं, जिनके चौबीसों घंटे के शोर के बावजूद भारत वैश्विक तौर पर ‘नरककुंड’ के रूप में आज चर्चित है। और बेचारे प्रवासी भारतीयों का बिगड़ा हुआ समय है।

पिछले सौ वर्षों में वैश्विक नेताओं की भारत सोच पर गौर करें। 1947 से पहले चर्चिल के ये दो वाक्य रिकॉर्ड में हैं, “मुझे इंडियन से घृणा है। वे एक घृणित लोग हैं और उनका धर्म भी घृणित है… इन्हें आजादी नहीं दी जानी चाहिए… क्योंकि तब “सत्ता बदमाशों, ठगों और लुटेरों के हाथों में चली जाएगी… पानी की एक बोतल या रोटी का एक टुकड़ा भी टैक्स से नहीं बचेगा”। जुलाई 1971 में अमेरिकी विदेश मंत्री किसिंजर से बात करते चीन के माओ की यह टिप्पणी अमेरिकियों का दिमाग बदलने वाली थी कि भारत एक ऐसा देश है जो न काम का है और न काज का! वह अपने आपको महान शक्ति बनाना चाहता है पर बन नहीं सकता। और अब सर्वाधिक भारी ट्रंप का यह हल्ला बनाना कि भारत तो ऐवें ही है। वह ऐसा है वैसा है और सुनों भारत एक ‘नरककुंड’!

1930–32 में चर्चिल का कहा, 1970 में माओ का बोला और 2026 में डोनाल्ड ट्रंप का भारत ‘हेलहोल्स’ की बात के साथ इस सप्ताह देश में कौन से चेहरे सुर्खियां लिए हुए थे? बंगाल के चुनाव को चाहे जैसा नरक बनाते हुए नरेंद्र मोदी का चेहरा! फिर अदालत में जज से भिड़ते हुए अरविंद केजरीवाल का चेहरा और आखिर में राजनीतिक दिन ईमान के नरक का चेहरा- राघव चड्ढा!

इन तीनों में समान खूबी क्या है? ये 1947 में स्वतंत्रता के बाद पैदा हुए चेहरे हैं। मतलब चर्चिल से आजाद हुए, स्वतंत्र भारत में पैदा व भारत के बने कर्णधार। 1950 में नरेंद्र मोदी, 1968 में केजरीवाल और 1988 में जन्मे राघव चड्ढा ने स्वतंत्र भारत में जो शिक्षा ली वह निश्चित ही अंग्रेजों के समय की शिक्षा, छात्र चेतना, छात्र राजनीति, विचार और नैतिकता की पढ़ाई की अनिवार्यताओं से जुदा थी। इन तीनों ने 2014 में भारत माता की जय की नारेबाजी से सत्ता की भूख में राजनीति की। इन तीन चेहरों में एक चाल, चेहरे, चरित्र की दुकानदारी बनाए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से प्रशिक्षित था तो दूसरा कथित सिविल सोसायटी के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन से उभरा चेहरा और तीसरा गैर कांग्रेसवाद की अलख में योगेंद्र यादव की छत्रछाया में नई जनरेशन का चेहरा राघव चड्ढा।

मेरा जन्म स्वतंत्र भारत की पहली पीढ़ी में था। यानी 1947–1957 के बीच जन्मा एक वह भारतीय जिसका स्थान मेवाड़ यानी सामंती परिवेश से भरा-पूरा था। उसी के असर की स्कूली शिक्षा थी। मैंने बाद में गौर किया कि स्वतंत्रता के बाद प्रदेश के स्कूली शिक्षा प्रभारी अफसर भी मेवाड़ से थे। और उन लोगों ने माध्यमिक शिक्षा की आवश्यकता में स्कूल की दीवारों पर क्या लिखवाया था? विषय क्या था? नैतिक शास्त्र तब एक विषय हुआ करता था। मतलब पंचतंत्र की कथाएं और स्कूल की दीवारों पर लिखे हुए ये वाक्य कि झूठ बोलना पाप है। विद्या ददाति विनयम्… मतलब अहंकार नहीं, विनय धारण करो। लोभ, लालच बुरा है। संतोषी होना चाहिए। स्कूली शिक्षा के ही समय मैंने ‘संतोषी माता’ नाम की फिल्म का हल्ला सुना… महिलाओं और लोगों को व्रत करते देखा। आदि आदि!

ये बातें, नैतिक शास्त्र की शिक्षा को क्या नरेंद्र मोदी, केजरीवाल, राघव चड्ढा ने शायद ही जाना, समझा और धारा। बारह वर्षों में इन्होंने वह सब काम किया जिससे नैतिकता को नरक ने निगला है।

परिणाम क्या? दुनिया भर में हिंदू निशाने पर! भारत की अब कोई परवाह नहीं करता। और भारत माता का कोई भी सच्चा बंदा मोदी, केजरीवाल, राघव चड्ढा जैसे लोगों की फोटो के आगे चर्चिल की इस बात को झूठा करार नहीं दे सकता है, भारत में तब “सत्ता बदमाशों, ठगों और लुटेरों के हाथों में चली जाएगी… पानी की एक बोतल या रोटी का एक टुकड़ा (सोचें क्या आज भारत में लोग रोटी के टुकड़े, पानी की बोतल पर जीएसटी टैक्स नहीं दे रहे हैं) भी टैक्स से नहीं बचेगा।” या माओ का यह कथन कि भारत वह देश है जो न काम का है और न काज का!

बहरहाल, सप्ताह का लब्बोलुआब कि ट्रंप ने ‘नरककुंड’ का जुमला ऐसे वक्त बोला है जब उन्हीं की अमेरिकी एआई कंपनियां भी 140–150–160 करोड़ लोगों की भारत भीड़ को ऐसा बना देने के मिशन में हैं, जिससे आने वाले दशकों में किसी को भी समझ नहीं आएगा कि भारत है किस काम का!


Previous News

More News

क्या सचमुच कीमतें नहीं बढ़ेंगी?

April 27, 2026

एक तरफ जनता का यह अटूट विश्वास है कि 29 अप्रैल को पश्चिम बंगाल में आखिरी चरण का मतदान समाप्त होने के तुरंत बाद सरकार पेट्रोल और डीजल की कीमतों में भारी बढ़ोतरी करेगी और दूसरी ओर सरकार का यह दावा है कि कीमतें नहीं बढ़ेंगी। सवाल है कि इन दोनों में से किसकी बात…

राम माधव सच बोल कर पलट गए

April 27, 2026

क्या राम माधव ने भाजपा के अंदर अपनी वापसी की संभावना पर खुद ही पानी फेर दिया है? कह नहीं सकते हैं क्योंकि पार्टी में कोई बड़ा पद देने का क्राइटेरिया अलग होता है। लेकिन इतना जरूर हुआ है कि राम माधव की एक बौद्धिक नेता होने की छवि को नुकसान हुआ है। वह नुकसान…

केजरीवाल की पार्टी पर संकट नहीं

April 27, 2026

दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के लिए लोधी इस्टेट का नया मकान शुभ नहीं साबित हुआ है। जिस दिन वे नए मकान में शिफ्ट हुए उसी दिन सात राज्यसभा सांसद पार्टी छोड़ कर भाजपा के साथ चले गए। अब केजरीवाल के सामने अपनी पार्टी को एकजुट रखने का संकट है। पंजाब में आप के 92…

काठ की हांड़ी दोबारा चढ़ा रही है भाजपा

April 27, 2026

भारतीय जनता पार्टी के नेताओं ने दिल्ली विधानसभा का 2025 का चुनाव अरविंद केजरीवाल की आम आदमी की छवि को ध्वस्त करके जीता। केजरीवाल ने अपने जीवन में संभवतः सबसे बड़ी गलती की थी दिल्ली में बड़ा बंगला बनाने की। उसकी पोल खुल गई और करोड़ों रुपए के खर्च का ब्योरा सामने आ गया। सो,…

आप सांसदों की सामूहिक पलटी

April 27, 2026

यह घटना राजनीति को एक ‘धंधा’ साबित करती है, जहां सिद्धांतों की जगह स्वार्थ हावी है। लेकिन एक सकारात्मक पक्ष यह भी है कि जनता अब ज्यादा सजग हो रही है। 2027 के चुनाव में मतदाता इन ‘ट्रैक्टरों’ को याद रखेंगे और वोट से जवाब देंगे। अशोक मित्तल पर ईडी के छापे के महज 10…

logo