कंकाल हाज़िर है!

Categorized as हरिशंकर व्यास कालम

अप्रैल 2026 की सत्ताईस तारीख। स्थान, ओडिशा में क्योंझर ज़िले के गांव मालीपोसी की बैंक शाखा! जीतू मुंडा नाम का एक इंसान (यदि मानें तो) भरी दोपहरी की तेज़ गर्मी में अपने गवाह को लेकर पहुंचा। गवाह था वह कंकाल, जो दो महीने पहले मरी उसकी 56 वर्षीय बहन कालरा मुंडा का था! जीतू मुंडा ने बोरी से कंकाल निकाला। उसे इस भाव हाजिर किया मानों कंकाल बोलेगा कि देख लीजिए, मेरी शिनाख्त करें, मैं शपथ लेकर कहती हूं कि मेरे बैंक खाते में जो 19,300 रुपए जमा हैं, वह मेरे भाई को दें।

यमराज व्यवस्था के चित्रगुप्त घबरा गए। ऐसा संकट! ऐसी हिमाकत कि चित्रगुप्त (अफसरों) की रिकॉर्ड-कीपिंग सिस्टम के आगे कंकाल बोले- मैं सत्य, तुम झूठे। तुरंत यमदूतों को तलब किया गया। वे डंडा लहराते पहुंचे। उन्होंने मनुष्य (जीतू मुंडा) से कहा- जा, वापस ले जा कंकाल। श्मशान में वापस दफना!

वह बेचारा! समझा नहीं। आखिर अफसरों ने ही तो कहा था- मौत का सबूत दो। वह ले आया तो पुलिसवाले कह रहे हैं- ले जाओ! वह क्या करता। जैसे वह कंकाल को लेकर आया था, वैसे ही वापस बोरी में भर पैदल तीन किलोमीटर दूर श्मशान घाट गया। वहीं बहन के अवशेष दफनाए, जहां से निकाले थे।

दियानाली गांव का पचास वर्षीय जीतू मुंडा एक आदिवासी है। उसे न स्वर्ग का पता है और न नरक का। न वह साक्षर है, न उसकी कोई हैसियत है या पहचान है। उसने तो वही किया जो उसे कहा गया था। बाद में पत्रकारों ने बात की तो बताया- मैं कई बार बैंक गया, लेकिन वहां के लोगों ने कहा कि पैसे निकालने के लिए खाताधारक को साथ लाओ। मैंने उन्हें बताया कि मेरी बहन की मौत हो चुकी है, पर उन्होंने मेरी बात नहीं मानी। सबूत देने को कहा। मैंने श्मशान खोदा, कंकाल निकाला, बैंक ले आया।

बैंक सूत्रों के अनुसार कालरा मुंडा के बैंक खाते में जो नॉमिनी था, उसकी भी मृत्यु हो चुकी है। इसलिए उसके नाम पर जमा पैसों पर दावा करने वाला एकमात्र व्यक्ति जीतू मुंडा ही था। पर जीतू नहीं जानता कि मौत के सबूत का एक मृत्यु प्रमाणपत्र होता है। कानूनी वारिस और नॉमिनी होते हैं। खबर में यह भी मालूम हुआ कि इलाके के जनाब हाकिम बीडीओ साहिब ने कहा, ‘मुझे आज ही इस बारे में पता चला है। हम देखेंगे कि इस मुद्दे को सुलझाने के लिए क्या किया जा सकता है’!

क्या आपको पता है भारत में कितने करोड़ लोग जीतू मुंडा होंगे? करोड़ों! कैसे? पिछले वर्षों में नरक को स्वर्ग बनाने के चक्कर में प्रधानमंत्री मोदी की सरकार ने जीतू मुंडा जैसे भोले जीवों को जनधन खातों का झुनझुना दिया। कोई 57–58 करोड़ खाते हैं। इनमें लगभग छह करोड़ वे खाते हैं, जिनमें सरकारी धनराशि, इंसानों को परजीवी लाभार्थियों में बदलने वाली कोई 327 सरकारी योजनाओं का पैसा (बूढ़ों-दिव्यांगों को दो-तीन-पांच सौ रुपए की पेंशन, किसान-महिला सम्मान निधि) छह-सात करोड़ लोगों के खातों में जाता है। मेरा मानना है कि जीतू मुंडा की बहन का बैंक खाता ऐसे ही जनधन वाला होगा। और इसे मैंने गांव-देहात की बैंक शाखाओं में खुद देखा है कि बेचारे अनपढ़ बूढ़े लाभार्थी कैसे पैसे निकलवाने के लिए बाबुओं, बिचौलियों के आगे गिड़गिड़ाते हैं। भटकते रहते हैं।

पर जनधन खातों का ही क्यों, खाते-पीतों और खासकर रिटायर लोगों को भी नरक के भंवर में घूमना होता है। मेरा खुद का ताज़ा अनुभव था कि मेरा केवाईसी के कारण खाता बंद हुआ। बेटी ने बैंक के चक्कर लगाए, दरखास्त दी, पर नहीं हुआ। मुझे पहचान के लिए जाना पड़ा। और अर्से बाद बैंक गया तो देखा- बैंक में पहले जैसा, उतना स्टाफ ही नहीं। सब ऑनलाइन, डिजिटल है तो बैंक न्यूनतम स्टाफ के हैं। वे भी अस्थायी, कामचलाऊ कर्मचारियों के बूते। मालूम हुआ कि दिल्ली की बैंक शाखाओं का बैक ऑफिस नोएडा में है। कागज़ वहां जाते हैं और रिमोट से हां-ना होती है। और मेरे मामले में दिक्कत यह है कि आधार से पुष्टि नहीं हो रही। मशीन मेरे सामने रखी गई। मैंने अंगूठा लगाया। मशीन न अंगूठे की छाप पकड़े और न उंगलियों की। बार-बार कोशिश, पर जीरो नतीजा। फिर पता पड़ा- यह तो बुजुर्गों की आम समस्या है। उम्र के साथ अंगूठे की रेखाएं सपाट हो जाती हैं या बदलती हैं, और आपको साठ साल की उम्र के बाद बहुत पहले ही वापस आधार केंद्र जाकर फिर से फिंगरप्रिंट दर्ज करा देने थे!

बहरहाल, मैं क्योंकि इस व्यवस्था का पासपोर्टधारी भी हूं तो काम हो गया, पर मैंने लगे हाथ आधार ठीक कराने की सोची। पोस्ट ऑफिस पहुंचा और वहां आधार के लिए इतनी भीड़ देखी कि मैंने तौबा की। फिर समझ आया- हिंदुओं के बेचारे यमराज, उनकी रिकॉर्ड-कीपिंग सिस्टम के मालिकान चित्रगुप्त (अफसर), यमदूत (फोर्स) भी क्या कर सकते हैं। वे भी तो फाइल का हिस्सा है! तभी भारत 21वीं सदी का वह नरक है जो गरुड़ पुराण, भागवत पुराण, मनुस्मृति में वर्णित नरक से भी ऊंचा और बिरला है।

जान लें, भारत के नरक और हिंदू शास्त्र के नरक में एक बुनियादी फर्क है।

हिंदू धर्म का नरक “कर्म सिद्धांत” से जुड़ा है। मतलब जो जैसा करेगा वैसा भोगेगा। वही भारत का नरक इस सिद्धांत से निर्मित है- जो पाप करेगा वही पुण्य पाएगा। जीतू मुंडा क्योंकि भोला-नादान है तो बैंक के अफसरों का ऐसे सताना उनका भारत राष्ट्र-राज्य के धर्म में पुण्य है। मोदी-भागवत छाप हिंदुओं को कभी गरुड़ पुराण के “प्रेतकल्प” भाग के 28 प्रमुख नरकों का विवरण पढ़ना चाहिए। इनमें कोई नरक ऐसा नहीं है, जिसका चित्रगुप्त (अफसर) जीतू मुंडा और कालरा मुंडा के भोलेपन को पाप मानकर उसे “धर्म विरोधी जीवन जीने के लिए बने कांटेदार पेड़ों के वन की सजा वाले ‘असिपत्रवन नरक’ में डाले। और उसी की क्रूरता में वह बेचारा श्मशान से अपनी बहन का कंकाल लेकर उसके सबूत पर अपनी रोटी का जुगाड़ करे।

28 अगस्त को जीतू मुंडा की खबर छपी तो सुबह मुझे एक पत्रकार का यह वाक्य पढ़ने को मिला, जिसका भाव था- इस खबर से सरकार के क्या मायने! सोचें, एक सनातनी के जीवन में धर्म और सत्ता के क्या अर्थ हैं? क्या वह व्यवस्था नहीं जिसमें जीव का संरक्षक वह ईश्वर (हम अवतार धारणा में जीते हैं। नरेंद्र मोदी ने कहा है कि ईश्वर ने मुझे विशेष प्रयोजन से भेजा है) है, जो धर्मतंत्र का स्वामी है। उसी में फिर अंतिम न्याय, स्पष्ट अधिकारों का एक राजा है- यमराज। और हर जीव के हर कर्म का एक सटीक रिकॉर्डधारी है- चित्रगुप्त। फिर हैं यमदूत। साथ ही दंड की दो-टूक व्यवस्था में कर्म-विशेष के अनुसार त्वरित और निश्चित स्वर्ग या नरक!

स्वर्ग-नरक की धारणा का सत्व-तत्व, प्राथमिक शर्त मानव के आचरण की है। व्यवहार, रिश्तों में संवेदना, गरिमा के वे धागे जो होमो सेपियंस की विशिष्टता हैं। इस मामले में धर्मशास्त्र का नरक, उसका यमराज, उसके अफसर, यमदूत का सिस्टम भी दो-टूक है, स्पष्ट है। वहा हर मनुष्य बराबरी की इस कसौटी में है कि जैसा करोगे वैसा भोगोगे। नरक तंत्र क्रूर है, लेकिन स्पष्ट और संगठित है। उसका यमराज न झूठ बोलता है, न छल करता है, न अहंकारी है और न मनुष्यों को बेईमान बनाने की व्यवस्थाएं, कानून बनवाता है। वह घूस नहीं खाता। वह प्रताड़ित नहीं करता। वह धर्म निभाता है। धर्मरचना की उस व्यवस्था में मनुष्य की पहचान आधार कार्ड नहीं है, वोटर कार्ड नहीं है, जन्म प्रमाणपत्र, मृत्यु प्रमाणपत्र नहीं, बल्कि स्वयं साक्षात मनुष्य है।

पर भारत की व्यवस्था में मनुष्य अब वह एक पशु है जिस पर शक, संदेह राष्ट्र धर्म है। भारत का नागरिक वोट का अधिकारी भी तब है जब सरकार की फाइल, दस्तावेज़ उसे वोटर करार दे। चुनाव आयोग उसे अपनी लिस्ट में डाले। वोट, चुनाव, लोकतंत्र की अहमियत नहीं है, पर उन बाबुओं, उन पक्षपाती यमदूतों, चित्रगुप्तों या यमराज की है जिन्हें कर्म के आधार पर नहीं, नियत, नियम, अनुकूलता में अपना नरक चलाना है। मनुष्य होना, उसका चेहरा, उसका बोलना, लिखना पर्याप्त नहीं है, न ही मानवता, मानवीय संवेदना, भावना, गरिमा का मतलब है। मतलब है सिर्फ पहचान पत्र, कागज़ और फाइल प्रोसेसिंग।

दुनिया में जहां नरक नहीं है, वहां कायदा है कि मनुष्य योनि में जन्म होना ही उसकी पहचान है! भारत में अलग कायदा है। मनुष्य को बार-बार यह साबित करना होता है कि वह ज़िंदा है, उसका केवाईसी मौजूद है। वह पहचानपत्रधारी है।

यमराज ने अपने नरक में पापियों के लिए पहचान के शायद ही ऐसे कार्ड बनवाए हों! यमराज अपने निवासियों पर संदेह नहीं करता, पर भारत करता है। वह दुनिया का नंबर एक शक्की देश है। और वह जिंदा को मरा और मरे को जिंदा भी कर देता है!

हाल में लंदन की वैश्विक पत्रिका ‘The Economist’ ने एक लंबी रिपोर्ट छापी। शीर्षक था, “उत्तर प्रदेश के ‘मृत लोगों’ का संघ”। मेरे लिए इसमें कुछ भी नया नहीं था। पचास साल के अपने अनुभव में तंत्र को मैंने इसी सच्चाई में आंका है। ‘द इकोनॉमिस्ट’ के सत्य में रामबचन राजभर का यह सत्य है कि वह अपनी ज़मीन का रिकॉर्ड निकालने गया तो पता चला कि उसकी पैतृक ज़मीन किसी और के नाम पर दर्ज हो चुकी है। कैसे? कागज़ों में उसका चचेरा भाई “मृत” घोषित था। सो, उसी आधार पर ज़मीन दूसरे के नाम पर लिख गई। यह उत्तर प्रदेश के बेचारे मनुष्यों के इलाकों में एक आम धोखाधड़ी है- जहां रिश्वत देकर जीवित व्यक्ति को सरकारी रिकॉर्ड में मृत घोषित कर दिया जाता है।

पत्रिका ने “मृतक” लाल बिहारी के अनुभव के साथ इतनी लंबी-चौड़ी रिपोर्ट लिखी है कि दुनिया के पाठकों ने पढ़कर यही सोचा होगा- भारत तो अजब ही है! ऐसा भी कोई देश हो सकता है!  इस लाल बिहारी ने 1976 में कागज़ों में मृत घोषित होने के बाद कोई 18 साल संघर्ष किया। संघर्ष से वह 1994 में “फिर से जीवित” घोषित हुआ। बाद में उसने “मृत लोगों का संघ” बनाया। इससे अनुभव साझा होते-होते मालूम हुआ कि लाखों लोग ऐसे भूमि विवाद में फंसे हुए हैं। जैसे ऊपर प्रधानमंत्री, मंत्री, सचिव, डायरेक्टर धनपतियों के क्रोनीवाद में किसी का धंधा (कंपनी) किसी चहेते के नाम लिखवा देते हैं, वैसे ही ज़मीनी स्तर पर पटवारी-तहसीलदार, कलेक्टर, अधिकारी लोग नजरानों से कृपा बरपा कर “खतौनी” (भूमि रजिस्टर) में हेरफेर कर मालिक का रिकॉर्ड बदल देते हैं। फिर लगाते रहो अदालत में चक्कर।

कभी हम हिंदुओं का जीवन श्रुति, वाणी यानी वचन और चेहरों (देवताओं) को आवाहन का सतयुग लिए हुए था। पर 1765 में ईस्ट इंडिया कंपनी के दुष्टों ने भारत के बादशाह से दीवानी अधिकार लिए और भारत बदलना शुरू किया। उससे पहले तक भारत के लोग जुबान और वचन की मनुष्य सत्यता से जीवन जीते थे। लेकिन अंग्रेजों ने नस्ल को पिंजरे में रखने के लिए कारिंदों को एक शब्द- ‘रूल’ दिया। उन्होने रूल (नियम) आधारित वह व्यवस्था, और उस व्यवस्था के संचालन में यमदूतों, कलेक्टरों, अदालतों का वह फाइल सिस्टम बनाया जिसकी पराकाष्ठा का ताजा प्रतीक वह कंकाल है जिसने अफसर के आगे उपस्थित होकर जताया- मैं मर गई हूं, मेरा पैसा मेरे भाई को दे दें। और नरक के कारिंदे ने रूल अनुसार जवाब दिया, ‘मुझे आज ही इस बारे में पता चला है। हम देखेंगे कि इस मुद्दे को सुलझाने के लिए क्या किया जा सकता है’!


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