यह लाख टके का सवाल है कि केंद्र सरकार किस तरह से यह निगरानी करेगी कि दुकानदार यूपीआई के जरिए होने वाले लेनदेन में एमडीआर शुल्क यानी केंद्र सरकार ने दो हजार से ऊपर के लेनदेन पर जो 0.40 फीसदी शुल्क लगाया है वह खुद दे रहा है या ग्राहक से ले रहा है? सरकार की ओर से ऐसी बात कही गई है। यह शुल्क लगाने के बाद जब विवाद बढ़ा तो सरकार की ओर से कहा गया कि ग्राहकों को शुल्क नहीं देना होगा। हालांकि सब जानते हैं कि दुकानदार इस तरह का कोई भी शुल्क अपनी जेब से नहीं चुकाता है। वह अपने मुनाफे में से सरकार को शुल्क नहीं देगा। किसी न किसी रूप में वह ग्राहक से ही पैसा वसूलेगा।
जब इस बात का मुद्दा बना तब सरकार ने कहा कि वह एमडीआर शुल्क की निगरानी करेगी। लेकिन इसका कोई मॉडल नहीं है। यह सिर्फ आंख में धूल झोंकने वाली बात है। पिछले साल भारत में 24 हजार करोड़ ट्रांजेक्शन हुए हैं, जिसमें 413 लाख करोड़ रुपए का कारोबार हुआ है। इसका अर्थ है कि हर महीने औसतन दो हजार करोड़ ट्रांजेक्शन हो रहे हैं। करोड़ों छोटी छोटी दुकानों या रेहड़ी, पटरी पर इसका इस्तेमाल हो रहा है। क्या सरकार के पास इतने लोग हैं या ऐसी तकनीकी सलाहियात है कि वह सबको मॉनिटर करे? सरकार जब सामानों में मिलावट और उनकी तौल में होने वाली गड़ब़ड़ियों को नहीं पकड़ पा रही है तो हर ट्रांजेक्शन को कैसे मॉनिटर करेगी। फिर भी लोगों को बरगलाने के लिए एक बयान दे दिया गया।
