ज्ञान-विज्ञान से तौबा!

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हैरतअंगेज है कि जिस समय सरकारी अधिकारी रिसर्च एंड डेवलपमेंट की जरूरत पर लंबे व्याख्यान दे रहे हों, खुद सरकार उस दिशा में छात्रों को ले जाने वाली योजनाओं पर विराम लगा रही है!

क्या केंद्र सरकार ने इन्सपायर स्कॉलरशिप फॉर हायर एजुकेशन (इन्सपायर-एसएचई) को गुपचुप बंद कर दिया है? इस छात्रवृत्ति के आकांक्षी उत्तर प्रदेश के एक छात्र की आरटीआई अर्जी पर जो जवाब आया, उससे ये सवाल खड़ा हुआ है। हर साल सितंबर में इन्सपायर-एसएचई के लिए सरकार विज्ञापन निकाल देती थी। मगर 2025 में इश्तहार नहीं आया। छह महीने इंतजार करने के बाद उस छात्र ने आरटीआई अर्जी दी। महीने भर बाद उसे दो-टूक जवाब मिला कि 2025 का विज्ञापन जारी नहीं होगा। तब उसने केंद्रीकृत सार्वजनिक शिकायत निवारण एवं निगरानी सिस्टम में शिकायत दर्ज कराई। वहां से भी वही जवाब मिला।

इस योजना के तहत 17 से 22 वर्ष तक उम्र के छात्रों को 12वीं पास करने के बाद सालाना 80 हजार रुपये की छात्रवृत्ति दी जाती थी। मकसद बुनियादी एवं प्राकृतिक विज्ञान की पढ़ाई को प्रोत्साहित करना था। 2022 में किशोर वैज्ञानिक प्रोत्साहन योजना को इन्सपायर-एसएचई का हिस्सा बना दिया गया। 2024-25 के बजट में छात्रवृत्ति के लिए लगभग 900 करोड़ रुपये रखे गए थे, मगर संशोधित अनुमान के मुताबिक वास्तविक खर्च तकरीबन 544 करोड़ रुपये का ही हुआ। 2025-26 और 2026-27 के बजटों में इस मद में कोई प्रावधान नहीं किया गया। तभी योजना को लेकर आशंकाएं पैदा हुई थीं। अब उनकी पुष्टि होती दिख रही है।

हैरतअंगेज है कि जिस समय सरकारी अधिकारी रिसर्च एंड डेवलपमेंट की जरूरत पर लंबे व्याख्यान दे रहे हों, खुद सरकार उस दिशा में छात्रों को ले जाने वाली योजनाओं पर विराम लगा रही है! पिछले हफ्ते केंद्र के मुख्य आर्थिक सलाहकार वी. अनंत नागेश्वरन ने चेतावनी दी थी कि भारत में बने ग्लोबल कैपिसिटी सेंटर्स (जीसीसी) ने आरएंडडी को अहमियत नहीं दी, तो भारत को इनका मेजबान बनने में मिली सफलता आगे चल कर हाथ से निकल सकती है। बेशक, नागेश्वरन का यह संदेश निजी क्षेत्र के लिए था, लेकिन उन्होंने यह भी कहा कि सरकार का काम लॉन्च पैड बनाना है, जहां से निजी क्षेत्र को खुद उड़ान भरनी चाहिए। प्रश्न है कि क्या इन्सपायर-एसएचई जैसी योजनाओं पर विराम लगाकर सरकार लॉन्च पैड बनाने के अपने दायित्व पीछे नहीं हट रही है?


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