शहर रहने योग्य बनें

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यह इंडेक्स संदेश देता है कि भारत को अपने शहरों को अधिक रहने योग्य बनाना है, तो उसे क्या करना चाहिए। ये इंडेक्स उन्हीं कसौटियों पर तैयार किया जाता है, जो गरिमामय जिंदगी के लिए जरूरी हैं। 

मानसून की शुरुआत से ही शहरों की ढहती नागरिक सुविधाओं की कहानी सुर्खियों में है। यह हर साल की बात है। अनुमान लगाया जा सकता है कि इस बार भी इनसे कुछ नहीं बदलेगा। इसी नजरिए का परिणाम है कि भारतीय शहरों के बारे में अंतरराष्ट्रीय मान्यता लगातार बिगड़ती जा रही है। इस बात की मिसाल इकोनॉमिस्ट इंटेलिजेंस यूनिट (ईआईयू) का ताजा ग्लोबल लिवेबिलिटी इंडेक्स है। इसमें सभी भारतीय शहर टॉप 100 से बाहर हैं। भारतीय शहरों के बीच नई दिल्ली इसमें सबसे ऊपर 120वें स्थान पर है। दरअसल, दिल्ली और मुंबई जैसे सबसे बड़े महानगर भी लैटिन अमेरिका के मध्यम दर्जे वाले शहरों के समान रैंक पर हैं। ईआईयू यह इंडेक्स शहर की स्थिरता, स्वास्थ्य सेवा, संस्कृति एवं पर्यावरण, शिक्षा और बुनियादी ढांचे के आधार पर तैयार करती है। इस बार इसमें दुनिया के 173 शहर शामिल हैं। भारतीय शहरों के बीच ताजा इंडेक्स में नई दिल्ली के बाद मुंबई 121वें, चेन्नई 123वें, और बंगलुरू 127वें स्थान पर है।

ईआईयू के मुताबिक इंफ्रास्ट्रक्चर का दबाव, ट्रैफिक की समस्या, और वायु प्रदूषण जैसी चुनौतियां भारतीय शहरों को रैंकिंग को नीचे खींच लेती हैं। भारतीय शहरों को सुरक्षा और स्थिरता के मोर्चे पर मिलने वाले अंकों में गिरावट देखी गई है, जिसका सीधा असर कुल रैंकिंग पर पड़ा है। इंडेक्स के मुताबिक इंडेक्स में चीन के शहर भारतीय शहरों के मुकाबले काफी तेजी से आगे बढ़ रहे हैं, जिस कारण दोनों देशों के शहरों के बीच की खाई और चौड़ी हो गई है। चीन के शामिल सभी 19 शहरों के हेल्थकेयर स्कोर में भारी सुधार दर्ज हुआ है। सामाजिक बीमा के विस्तार और मेडिकल इंफ्रास्ट्रक्चर के आधुनिकीकरण के कारण चीन के पांच शहर हेल्थकेयर कैटेगरी में 80 से अधिक का स्कोर कर चुके हैं। इसके विपरीत भारतीय शहरों में बुनियादी स्वास्थ्य सुविधाओं पर दबाव बना हुआ है। तो कुल मिला कर ये रैंकिंग संदेश देती है कि भारत को अगर अपने शहरों को अधिक रहने योग्य बनाना है, तो उसे क्या करना चाहिए। दरअसल, ये इंडेक्स उन्हीं कसौटियों पर तैयार किया जाता है, जो किसी इनसान की गरिमामय जिंदगी के लिए जरूरी हैं।


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