हाफिज सईद का कांटा

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सरकार ने पिछले साल ऑपरेशन सिंदूर का सहारा लिया। लेकिन, उसे दहशतगर्द ठिकानों तक सीमित रखा गया। फिर अंजाम तक पहुंचने से पहले ही कार्रवाई रोक दी गई। ऐसे में सईद को कैसे सजा मिलेगी?

राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) ने पहलगाम आतंकवादी हमला कांड में दायर पूरक चार्जशीट में पाकिस्तान स्थित हाफिज सईद का नाम भी शामिल किया है। अनुमान लगाया जा सकता है कि एनआईए ने ठोस सबूत मिलने के बाद ही पाकिस्तान स्थित आतंकवादी संगठन लश्कर-ए-तय्यबा के संस्थापक को इस कांड में आरोपित किया है। मगर यह सवाल कायम है कि सईद को उसके कृत्यों की सज़ा कैसे मिलेगी? 76 वर्षीय सईद को साल 2000 में लाल किला पर हमले का मास्टरमाइंड बताया गया था। 2001 में संसद पर हुए हमले, 2002 में अहमदाबाद में अक्षरधाम मंदिर पर हुए हमले और 2006 में मुंबई की लोकल ट्रेनों में हुए सिलसिलेवार हमलों में भी उसे आरोपित किया गया। 2008 में मुंबई पर भीषण आतंकवादी हमलों के बाद भारत ने औपचारिक रूप से पाकिस्तान से हाफिज सईद को प्रत्यर्पित करने को कहा था। मगर पाकिस्तान पर इन तथ्यों से कोई फर्क नहीं पड़ा। बताया जाता है कि सईद को वहां सरकारी संरक्षण हासिल है, जिसमें रहते हुए वह आतंकवादी हमलों की साजिशें रचता है। ऐसे में भारत के पास क्या रास्ता है? स्पष्टतः एक विकल्प सैनिक ताकत के जरिए पाकिस्तान को यह संदेश देने का है कि भारत केंद्रित आतंकवाद को संरक्षण देना उसे महंगा पड़ेगा। दूसरा रास्ता कूटनीतिक अभियानों के जरिए अंतरराष्ट्रीय दबाव बनाने का है, ताकि पाकिस्तान के लिए आतंक को संरक्षण देना कठिन हो जाए। भारत के अभियान का ही परिणाम था कि 2008 में अमेरिका ने सईद को अंतरराष्ट्रीय आतंकवादी घोषित किया। ये वो दौर था, जब भारत के कूटनीतिक अभियान एक हद तक कामयाब होते दिखे थे। नतीजतन, पाकिस्तान पर अंतरराष्ट्रीय निगरानियों का घेरा कसा। मगर वो दौर निकल चुका है। अब बड़ी शक्तियां पाकिस्तान का अंतरराष्ट्रीय पुनर्वास कर चुकी हैँ। ऐसे मौजूदा सरकार ने पिछले साल ऑपरेशन सिंदूर का सहारा लिया। लेकिन, उसमें सीधे पाकिस्तान को निशाने पर लेने के बजाय दहशतगर्द ठिकानों तक सीमित रखा गया। फिर अंजाम तक पहुंचने से पहले ही कार्रवाई रोक दी गई। ऐसे में सईद तक कानून के हाथ कैसे पहुंचेंगें? इस संबंध में भारत सरकार की क्या रणनीति है? देश को यह बताया जाना चाहिए।


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