बहुपक्षीयता की बातें कम

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ईरान और यूएई के प्रतिनिधियों में हुई झड़प मिसाल है कि बदली विश्व परिस्थितियों के बीच ब्रिक्स+ के सदस्य ना सिर्फ अलग धरातल पर खड़े हैं, बल्कि वे परस्पर विरोधी रुख भी खुलेआम अपना रहे हैं।

ब्रिक्स+ देशों के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकारों की नई दिल्ली में हुई बैठक एक बार फिर इस समूह के अंदर गहरा रहे मतभेदों को उजागर कर गई। बैठक के दौरान ईरान और संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) के प्रतिनिधियों की बीच हुई झड़प मिसाल है कि बदली विश्व परिस्थितियों के बीच ब्रिक्स+ के सदस्य देश ना सिर्फ अलग धरातल पर खड़े हैं, बल्कि अब वे परस्पर विरोधी रुख भी खुलेआम अपना रहे हैं। ईरान के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार घादिर निजामीपुर ने अपने देश पर अमेरिका और इजराइल के हुए हमले में सक्रिय भूमिका निभाने का आरोप यूएई पर लगाया। जबकि यूएई ने ईरान पर उसे अनुचित निशाना बनाने का इल्जाम मढ़ा। इससे ब्रिक्स+ में सर्व-सहमत दृष्टिकोण उभरने की संभावना और कम हो जाने के संकेत मिले हैं।

मेजबान भारत की सहानुभूति यूएई के साथ अधिक है, जिसके इजराइल और अमेरिका से बेहतर रिश्ते हैं। दूसरी तरफ चीन और ईरान के प्रतिनिधियों की द्विपक्षीय बैठक से साफ हुआ कि वे दोनों देश बदल रहे वैश्विक समीकरणों के बीच समान धरातल पर खड़े हैं। ऐसे में ब्रिक्स+ की बैठक का असल महत्त्व इस मौके पर हुई द्विपक्षीय वार्ताएं ही रहीं। इनमें एक खास मौका राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोवाल और चीन के विदेश मंत्री (जो वहां के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार भी हैं) वांग यी की मुलाकात रहा। डोवाल और वांग सीमा विवाद पर अपने- अपने देशों के विशेष प्रतिनिधि भी हैं।

दोनों ने भारत- चीन संबंध के ताजा हाल की समीक्षा की। इसी तरह की द्विपक्षीय वार्ताएं अन्य देशों के प्रतिनिधियों के बीच भी हुईं। इस रूप में नई दिल्ली में उनका जुटना सार्थक रहा। बहरहाल, जहां तक ब्रिक्स+ का प्रश्न है, तो उसके महत्त्व और भूमिका को लेकर भले जो कहा जाता हो, लेकिन असल में यह समूह दिशाहीनता का शिकार होता नजर आ रहा है। इसी बात के संकेत पिछले महीने ब्रिक्स+ विदेश मंत्रियों की बैठक में भी मिले थे। सितंबर के मध्य में जब ब्रिक्स+ शिखर सम्मेलन होगा, तो उसमें कोई अलग नजारा होगा या इन देशों के सर्वोच्च नेता नजरिए में फर्क को पाट पाएंगे, इसकी संभावना भी कम ही है।


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