मानक इतना ना गिराएं

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क्या अमेरिका के साथ द्विपक्षीय व्यापार समझौते को अंतिम रूप देने के क्रम भारत अमेरिका को इस बात पर राजी कर पाएगा कि वह दोनों देशों के कारोबार में गैर-व्यापार बाधाएं खड़ी ना करे?

भारत के साथ द्विपक्षीय व्यापार समझौते को “अंतिम रूप देने” के लिए अमेरिका के व्यापार प्रतिनिधि जेमिसन ग्रीयर भारत में हैं। उन्हें आशा है कि मंगलवार और बुधवार की वार्ताओं के दौरान ऐसा हो जाएगा। मगर मुद्दा है कि क्या बातचीत का आधार द्विपक्षीय समझौते का वही फ्रेमवर्क है, जिस पर पिछले फरवरी में सहमति बनी थी? या बदली परिस्थितियों के मद्देनज़र भारत फिर से सौदेबाजी कर रहा है? फ्रेमवर्क के एलान के बाद अमेरिका के सुप्रीम कोर्ट ने डॉनल्ड ट्रंप प्रशासन के लगाए टैरिफ को असंवैधानिक ठहरा दिया था। उससे भारत सरकार को नया मौका मिला। उसका लाभ उठाकर वह उन आलोचनाओं को दूर कर सकती है, जिनसे इस मामले में उस पर समर्पण करने के आरोप लगे हैं।

इस बीच अमेरिका ने उत्पादन में “जबरिया मजदूरी” के इस्तेमाल का आरोप लगाकर भारत के कई निर्यातों पर 12.5 प्रतिशत का अतिरिक्त टैरिफ लगाया है। “अनुचित व्यापार व्यवहार” के इल्जाम में उसने भारत के खिलाफ जांच चला रखी है। इनमें “अत्यधिक औद्योगिक क्षमता और अमेरिकी उद्योगों को नुकसान पहुंचाने वाली नीतियों” के आरोप शामिल हैं। क्या समझौते को “अंतिम रूप देने” के क्रम भारत अमेरिका को इस बात पर राजी कर पाएगा कि वह दोनों देशों के कारोबार में ऐसी गैर-व्यापार बाधाएं खड़ी ना करे? भारत सरकार के रुख से इन मुद्दों पर दृढ़ रुख अपनाए जाने के संकेत नहीं मिले हैं।

वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने हाल में कहा कि भारत- अमेरिका ट्रेड डील को तब तक लागू नहीं किया जाएगा, जब तक भारत के लिए प्रतिस्पर्धात्मक लाभ सुनिश्चित नहीं हो जाता। इसका अर्थ है कि भारत पर लगने वाले शुल्क दरों को अमेरिका बांग्लादेश, वियतनाम और कुछ मामलों में चीन पर लगे टैरिफ से कुछ नीचे कर दे, तो डील भारत को स्वीकार्य हो जाएगा। स्पष्टतः यह अपने मानक को काफी नीचे रखना है। फ्रेमवर्क में शामिल अमेरिका से अनिवार्य खरीदारी, ऊर्जा खरीद पर उसकी अनुचित शर्तों को मानने, और अपने बाजार को उसके लिए पूरी तरह खोलने जैसी शर्तें शामिल हैं। उन्हें फिर वार्ता की मेज पर लाने के बजाय भारत का निम्न मानक को अपनाना दुर्भाग्यपूर्ण होगा।


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