अपनी कमजोरी की मार!

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आर्थिक सर्वेक्षण रिपोर्ट में कहा गया है कि मौजूदा चुनौतियों के बरक्स राज्य को अलग ढंग से संगठित एवं सक्षम बनना होगा। साथ ही कॉरपोरेट सेक्टर को बड़ी जिम्मेदारी निभानी होगी। परंतु ऐसा कैसे और कब होगा, असल मुद्दा यह है।

साल 2025-26 के आर्थिक सर्वेक्षण में सरकार ने माना है कि भारतीय रुपया बदलती भू-राजनीतिक परिस्थितियों के बीच रणनीतिक शक्ति के अभाव का शिकार बना है। 2025 में रुपये की तुलना में डॉलर छह प्रतिशत महंगा हुआ। ऐसा उस समय हुआ, जब खुद डॉलर का भाव प्रमुख मुद्राओं (यूरो, येन, स्विस फ्रैंक आदि) के बास्केट की तुलना में करीब 11 फीसदी गिरा। केंद्र के मुख्य आर्थिक सलाहकार वी. अनंत नागेश्वरन की देखरेख में तैयार सर्वे रिपोर्ट में कहा गया है कि सेवा क्षेत्र में व्यापार लाभ और विदेश स्थित भारतीयों की तरफ से कमा कर भेजी गई रकम रुपये को सहारा देने में नाकाफी साबित हुए हैं।

ये चालू खाता के घाटे की भरपाई नहीं कर पाए। जो देश ऐसे घाटे में हैं, उनकी मुद्राओं की कमजोरी खासकर भू-राजनीतिक बदलाव के दौर अधिक उभर कर सामने आई है। दूसरी तरफ जिन देशों ने मैनुफैक्चरिंग का मजबूत आधार तैयार किया, उनकी मुद्राएं स्थिर और मजबूत बनी हुई हैं। मगर इस बिंदु पर भारत की मौजूदा कमजोरी का ठोस जायजा पेश करने के बजाय रिपोर्ट अतीत की आड़ लेती मालूम पड़ी है। कहा है कि मैनुफैक्चरिंग में मजबूत देशों ने इसका आधार तब तैयार किया, जब परिस्थितियां अनुकूल थीँ।

यह मुद्दा प्रासंगिक है कि उस दौर में भारत ऐसा आधार तैयार करने से क्यों चूक गया। मगर यह प्रश्न भी उतना ही उचित है कि क्या उसका रोना रोते रहना समाधान है? यह अच्छी बात है कि रिपोर्ट में सरकार की भूमिका पर जोर दिया गया है। कहा गया है कि मौजूदा सवालों का जवाब ढूंढने के लिए राज्य को अलग ढंग से संगठित एवं सक्षम बनना होगा। साथ ही कॉरपोरेट सेक्टर को उसमें बड़ी जिम्मेदारी निभानी होगी। परंतु ऐसा कैसे और कब होगा, असल मुद्दा यह है। जिन भू-राजनीतिक बदलावों की बात की गई है, वे अब ठोस शक्ल ले रही हैं। मगर ऐसा होने के संकेत कई वर्षों से मिल रहे थे। उस समय दूरदृष्टि दिखाई गई होती, तो वर्तमान चुनौतियों का बेहतर मुकाबला किया जा सकता था। दुर्भाग्यपूर्ण है कि नीति-निर्माण के सर्वोच्च स्तर अब भी उसका अभाव ही नजर आता है।


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