सैद्धांतिक रूप से अहम

Categorized as संपादकीय

आरटीई कानून लागू हुए 16 वर्ष गुजर गए हैं। सुप्रीम कोर्ट के ताजा आदेश से जाहिर है कि सरकारों ने उस धारा के तहत अपने दायित्व को नहीं निभाया। यानी लड़कियों के लिए अलग शौचालय की जरूरत पूरी नहीं की गई।

सुप्रीम कोर्ट की इस व्याख्या का ऊंचा सैद्धांतिक महत्त्व है कि मासिक धर्म संबंधी स्वास्थ्य एवं स्वच्छता संविधान प्रदत्त जीवन के मौलिक अधिकार का अभिन्न अंग है। न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति आर. महादेवन की खंडपीठ ने कहा कि स्कूलों में लड़कियों को इससे संबंधित सुविधाएं मिलें, यह सरकारों को सुनिश्चित करना चाहिए। इस सिलसिले में लड़के, लड़कियों, और ट्रांसजेंडर्स के लिए अलग शौचालय बनाने तथा लड़कियों को सेनेटरी पैड मुहैया कराने के निर्देश दिए गए हैँ। कोर्ट की ये राय सटीक है कि मासिक धर्म संबंधी स्वास्थ्य के सुरक्षित, प्रभावी, और किफायती उपाय उपलब्ध ना होने पर लड़कियों की गरिमा प्रभावित होती है। इसलिए अदालत ने इन सुविधाओं को संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत बालिकाओं का मौलिक अधिकार बना दिया है। यानी न्यायालय ने जीवन के अधिकार संबंधी अनुच्छेद का विस्तार किया है।

ठीक ऐसा ही विस्तार एक दशक पहले कोर्ट की एक संविधान पीठ ने किया था, जब निजता को नागरिकों का मौलिक अधिकार घोषित किया गया। दरअसल, गुजरे दशकों में कोर्ट ने अपने कई महत्त्वपूर्ण निर्णयों एवं व्याख्याओं के जरिए नागरिक समाज के विभिन्न समूहों के मौलिक अधिकारों का विस्तार किया है। लेकिन बात घूम-फिर कर अमल पर आ जाती है। पूर्व निर्णय से निजता कितनी सुरक्षित हुई? खुद संसद ने जीवन के बुनियादी हक संबंधी अनुच्छेद 21 में उपधारा 21-ए जोड़कर प्राथमिक शिक्षा को बच्चों का मूल अधिकार बनाया था। उसके तहत स्कूल को खास ढंग से परिभाषित किया गया, जिसमें लड़कियों के लिए अलग से शौचालय की अनिवार्यता उपलब्धता शामिल है। यह कानून लागू हुए 16 वर्ष गुजर गए हैं। सुप्रीम कोर्ट के ताजा आदेश से जाहिर है कि सरकारों ने उस धारा के तहत अपने दायित्व को नहीं निभाया। यानी ये जरूरत पूरी नहीं की गई। तो नए आदेश पर पालन सुनिश्चित कौन कराएगा? इसका उल्लंघन होने पर जवाबदेही कैसे तय होगी? यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि अनेक संवैधानिक प्रावधान, कानून, और सर्वोच्च अदालत के महत्त्वपूर्ण आदेश आज भी अमल की ताक में हैं। अतः सुप्रीम कोर्ट को इस समस्या का भी निवारण करना चाहिए। वरना, उसका ताजा निर्णायक भी महज सैद्धांतिक रूप से महत्त्वपूर्ण बना रह जाएगा।


Previous News Next News

More News

प्रहलाद जोशी के जरिए बड़ा संदेश

July 29, 2026

ऐसी चर्चा थी कि धर्मेंद्र प्रधान शिक्षा मंत्री के पद से इस्तीफा देंगे तो डॉक्टर जितेंद्र सिंह को उनकी जगह शिक्षा का प्रभार दिया जाएगा। यह अंदाजा इस बात से लगाया जा रहा था कि कॉकरोच जनता पार्टी के आंदोलन के दौरान वे सक्रिय भूमिका निभा रहे थे। प्रधानमंत्री आवास के सामने राहुल गांधी के…

अब ई-20 पार्टी बन कर तैयार है

July 29, 2026

सरकार अभी कॉकरोच जनता पार्टी के आंदोलन से मिले जख्मों को सहला ही रही है कि इथेनॉल मिश्रित पेट्रोल यानी ई-20 पेट्रोल के खिलाफ आंदोलन की तैयारी शुरू हो गई है। इसके लिए ई-20 पार्टी का गठन हो गया है। इस पार्टी को सोशल मीडिया में पर्याप्त समर्थन भी मिल रहा है। कॉकरोच जनता पार्टी…

क्या दिपके राजनीतिक पार्टी बनाएंगे?

July 29, 2026

अभिजीत दिपके और उनके नजदीकी लोग जैसे आशुतोष रांका और सौरव दास दावा कर रहे हैं कि अभी राजनीतिक पार्टी बनाने का कोई इरादा नहीं है और न चुनाव लड़ना है। लेकिन असल में दिपके और उनकी टीम राजनीतिक दल बनाएंगे। ध्यान रहे भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के समय इंडिया अगेंस्ट करप्शन के लोग खास कर…

पीके से पूरा एनडीए लड़ रहा है

July 29, 2026

बिहार की बांकीपुर विधानसभा सीट का उपचुनाव भाजपा के लिए दुःस्वप्न साबित हो रहा है। भाजपा के कई नेता कह रहे हैं कि नितिन नबीन को सीट से इस्तीफा नहीं देना चाहिए थे। गौरतलब है कि राष्ट्रीय अध्यक्ष होने के बाद वे राज्यसभा चले गए और उन्होंने बांकीपुर सीट से इस्तीफा दे दिया। इसकी वजह…

कॉकरोच: एक शब्द का बल

July 29, 2026

द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान ब्रिटिश प्रधानमंत्री विंस्टन चर्चिल ने दिया था। उन के शब्दों ने हिटलर के सामने पस्त हो रहे इंग्लैंड को बल दिया। इस हद तक कि कई यूरोपीय देशों को टिके रह कर लड़ने का हौसला मिला।…. चर्चिल ने अंग्रेजी भाषा को बुलाया और उसे युद्धभूमि में उतार दिया।” आज कम…

logo