अब फिक्र भी नहीं!

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जिस दौर में सरकारों की मेधा पर्यावरण संरक्षण कानूनों को इस तरह तोड़ने- मरोड़ने में लगी हो, जिससे ये प्राकृतिक संसाधनों के अंधाधुंध दोहन में आड़े ना आएं, उनसे किसी प्रकार के हल की उम्मीद रखना बेबुनियाद ही है।

राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र पर छाये स्मॉग से जल्द राहत मिलने की संभावना नजर नहीं आती। इसका खतरनाक प्रभाव यहां के बाशिंदों पर हो रहा है। खुद भारत सरकार ने कहा है कि अस्पतालों में सांस संबंधी मरीजों की संख्या बढ़ रही है, जिनका सीधा संबंध प्रदूषित हवा से है। स्वास्थ्य राज्यमंत्री विक्रमजीत एस. साहनी ने राज्यसभा में बताया कि 2022 से 2024 तक सांस संबंधी दो लाख मरीजों को अस्पताल में भर्ती होना पड़ा। बाल रोग विशेषज्ञों के हवाले से छपी एक मीडिया रिपोर्ट में बताया गया है कि जहरीली हवा के दुष्प्रभाव से त्वचा रोग के मामले बढ़े हैं। खासकर इसका शिकार बच्चे हो रहे हैं।

बुजुर्गों के लिए बाहर निकलना कितना जोखिम भरा हो गया है, सोशल मीडिया ऐसी चर्चाओं से भरा-पड़ा है। मगर इतना गंभीर हाल होने के बावजूद हुक्मरान बेफ्रिक्र बने हुए हैं। जब कभी सूरत बेहद बिगड़ जाती है, तो वे पंजाब में पराली जलने की चर्चा कर अपने कर्त्तव्य से मुक्त हो जाते हैं! ये दलील बेतुकेपन की इस हद तक पहुंच चुकी है कि सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान प्रधान न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत ने अधिकारियों को ऐसा बहाना ना बनाने की सलाह दी। उचित ही उन्होंने कहा कि प्रदूषित हवा की वजहें ढांचागत रूप ले चुकी हैं। समाधान उनका ढूंढा जाना चाहिए। मगर जिस दौर में सरकारों की मेधा पर्यावरण संरक्षण कानूनों को इस तरह तोड़ने- मरोड़ने में लगी हो, जिससे प्राकृतिक संसाधनों के अंधाधुंध दोहन की गुंजाइश मिल जाए, उनसे ऐसे हल की उम्मीद रखना बेबुनियाद ही है।

हाल में अरावली पहाड़ियों में खनन के बारे में जैसे दिशा-निर्देश तैयार किए गए हैं, उनसे साफ है कि सत्ताधारी नेताओं को पर्यावरण या प्रदूषण की तनिक भी चिंता नहीं है। अभी कुछ वर्ष पहले तक इस सीजन में स्मॉग छाने पर ऑड- इवन जैसे परिवहन नियमों पर बात होती थी। उससे कम-से-कम यह तो जरूर होता था कि लोगों में जागरूकता आती थी। लेकिन अब वैसी भी कोई फिक्र नजर नहीं आती। अब तो बस ये कोशिश है कि जब तक ये सीजन निकल नहीं जाता, सूरत पर जितना संभव है परदा डाले रखा जाए!


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