राहुल की संघ पर समझ, मगर कांग्रेस संगठन पर नहीं!

राहुल का लोकसभा में बोलना, मोदी को चैलेंज करना, विभिन्न समुदायों से मिलना, सबकी आवाज उठाना और कांग्रेस के मूल सिद्धांतों गरीब समर्थक, धर्मनिरपेक्षता, प्रगतिशीलता पर अडिग रहना सब ठीक है। मगर उनसे मिलना आज भी पार्टी में सहज सुलभ नहीं माना जाता है। और उनकी सोच से हटकर उन्हे किसी अलग बात के लिए… Continue reading राहुल की संघ पर समझ, मगर कांग्रेस संगठन पर नहीं!

ममदानीः न्यूयॉर्क से नई राजनीति की ज़िद

ममदानी ने कुरान पर हाथ रख कर शपथ ली। और न्यूयार्क ने पहला मुस्लिम मेयर तथा दक्षिण एशियाई मूल का मेयर पाया। कुछ घंटे बाद उन्होंने सिटी हॉल में हजारों लोगों के सामने दोबारा शपथ ली। इस बार उनके राजनीतिक नायकों में से एक सीनेटर बर्नी सैंडर्स ने उन्हे शपथ दिलाई। दिन का समापन ब्रॉडवे… Continue reading ममदानीः न्यूयॉर्क से नई राजनीति की ज़िद

क्या रूसी लोग युद्धखोर हैं?

रूसी इतिहास में युद्ध सदियों से बार-बार की परिघटना है। अमेरिकी इतिहासकार प्रो. ग्रेगोरी कार्लटन ने अपनी पुस्तक ‘रसिया: द स्टोरी ऑफ वार‘ (2017) में रूसी इतिहास का एक रोचक आकलन किया है। … ऐतिहासिक रूप से रूसियों के लिए युद्ध उन के अस्तित्व का सामान्य अंग रहा है। रूसी सैन्य अकादमी के प्रमुख रहे… Continue reading क्या रूसी लोग युद्धखोर हैं?

सिखों के दशम गुरु — गुरु गोविंद सिंह

उन्होंने देश, धर्म और स्वतंत्रता की रक्षा के लिए सिखों को संगठित किया और उन्हें सैनिक परिवेश में ढाला। मान्यता है कि धर्म और न्याय की प्रतिष्ठा के लिए गुरु गोविंद सिंह का अवतरण हुआ था। इसी उद्देश्य को स्पष्ट करते हुए उन्होंने कहा था — “मुझे परमेश्वर ने दुष्टों का नाश करने और धर्म… Continue reading सिखों के दशम गुरु — गुरु गोविंद सिंह

नेताओं की बदजुबानी का सभी तरफ असर

लोकतंत्र में असहमति आवश्यक है, लेकिन असंसदीय भाषा उसकी आत्मा को चोट पहुंचाती है। अगर हम एक मजबूत भारत चाहते हैं, तो राजनीतिक बयानों व भाषणों को सभ्य बनाना होगा। नेता याद रखें कि वे जनता के सेवक हैं, न कि शासक। नागरिक, कार्यकर्ता और मीडिया सब मिलकर इस प्रवृत्ति को रोक सकते हैं। तभी… Continue reading नेताओं की बदजुबानी का सभी तरफ असर

संघ और भाजपा में क्या है संबंध?

सभी  बातों की बारीकियों को समझे बगैर न तो आरएसएस को समझा जा सकता है, न भारतीय जनता पार्टी को समझा जा सकता है और न दोनों संगठनों के संबंधों को समझा जा सकता है। बहुत अच्छा संयोग है जो संघ प्रमुख ने भी अपने व्याख्यानों से भ्रांतियों को दूर करने का प्रयास किया है… Continue reading संघ और भाजपा में क्या है संबंध?

मोदी सरकार, ब्रिक्स+ और श्रमिक नजरिया

ब्रिक्स+ बदलाव का एक प्रतीक है। इसलिए इसके महत्त्व को कम-से-कम श्रमिक वर्ग को अवश्य समझना चाहिए। … भारत सरकार इस मामले में जो भी रुख अपनाए, भारत के मेहनतकश तबकों को इसके महत्त्व को अवश्य समझना चाहिए। भारत सरकार ब्रिक्स+ के महत्त्व के मुताबिक इसके शिखर सम्मेलन को अहमियत दे, इसके लिए उन्हें दबाव… Continue reading मोदी सरकार, ब्रिक्स+ और श्रमिक नजरिया

क्यों बहुसंख्यक संकोच में रहे?

असल मुद्दा सांस्कृतिक आत्मविश्वास और सभ्यतागत आत्मबोध का है। जब बहुसंख्यक समाज का एक वर्ग अपने ही मजहबी-सांस्कृतिक प्रतीकों को सार्वजनिक रूप से व्यक्त करने में संकोच करता है, तो इसकी जड़े उस मानसिक औपनिवेशवाद में मिलती है, जिसमें अपनी पहचान, संस्कृति और परंपरा के प्रति उदासीनता और हीन-भावना रखने का चिंतन होता है। सच्चा… Continue reading क्यों बहुसंख्यक संकोच में रहे?

वक़्त की छटपटाहट है ‘इक्कीस’

‘इक्कीस’ कई स्तरों पर काम करती है। एक स्तर पर यह साहस और कर्तव्य की कहानी है; दूसरे स्तर पर यह उम्र और ज़िम्मेदारी के असंतुलन की पड़ताल करती है। फ़िल्म यह सवाल उठाती है कि वीरता क्या है, क्या वह डर का न होना है, या डर के बावजूद आगे बढ़ना? यहां वीरता किसी… Continue reading वक़्त की छटपटाहट है ‘इक्कीस’

राजतंत्र के फ़र्ज़ी जनतंत्र का मुख-श्रंगार

मुद्दआ तो यह है कि सब जानते हैं कि मुद्दआ क्या है, मगर सब यह पूछने से पिंड छुड़ाते भाग रहे हैं कि मुद्दआ क्या है? जब तक हम सवालों का सामना नहीं करते, तब तक हर 365 दिनों बाद एक नया बरस आएगा, हर 365 दिनों बाद एक पुराना बरस जाएगा और हम अपने… Continue reading राजतंत्र के फ़र्ज़ी जनतंत्र का मुख-श्रंगार

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