वक़्त की छटपटाहट है ‘इक्कीस’

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इक्कीसकई स्तरों पर काम करती है। एक स्तर पर यह साहस और कर्तव्य की कहानी है; दूसरे स्तर पर यह उम्र और ज़िम्मेदारी के असंतुलन की पड़ताल करती है। फ़िल्म यह सवाल उठाती है कि वीरता क्या है, क्या वह डर का न होना है, या डर के बावजूद आगे बढ़ना? यहां वीरता किसी एक बड़े क्षण में नहीं, बल्कि छोटे-छोटे निर्णयों की शृंखला में आकार लेती है।

सिने-सोहबत

हिंदी सिनेमा में युद्ध आधारित जीवनियां अक्सर या तो नारेबाज़ी में फंस जाती हैं या फिर भावुकता की अतिशयोक्ति में। ऐसे में ‘इक्कीस’ का आना अपने आप में एक महत्वपूर्ण सिनेमाई घटना है। इस फ़िल्म के निर्देशक हैं श्रीराम राघवन जिन्हें हम ‘अंधाधुन’, ‘बदलापुर’ और ‘जॉनी गद्दार’ जैसी फ़िल्मों के लिए जानते हैं। श्रीराम राघवन यहां अपने सिग्नेचर सस्पेंस से अलग एक ऐसे विषय को चुनते हैं, जहां सन्नाटा, अनुशासन और बलिदान तीनों मिलकर एक गहरी मानवीय कथा रचते हैं। ‘इक्कीस’ केवल एक युद्ध-फिल्म नहीं, बल्कि कर्तव्य, उम्र, भय और साहस के द्वंद्व पर आधारित एक गंभीर सिनेमाई दस्तावेज़ है।

‘इक्कीस’ का केंद्रीय बिंब एक ऐसे युवा सैनिक का है, जिसकी उम्र भले ही कम हो, पर ज़िम्मेदारी असाधारण। शीर्षक ‘इक्कीस’ सिर्फ़ एक संख्या नहीं, बल्कि एक अवस्था है, युवा मन की वह दहलीज़ जहां आदर्श और यथार्थ पहली बार आमने-सामने आते हैं। राघवन इस फ़िल्म को किसी “वीर-गाथा” की तरह नहीं, बल्कि एक आत्मसंघर्ष की कथा की तरह रचते हैं। यहां युद्ध का शोर है, पर उससे भी ज़्यादा भीतर का शोर मसलन डर, दुविधा, और फिर दृढ़ निश्चय।

निर्देशक का निर्णय सराहनीय है कि वे कथा को न तो महिमामंडन में बहने देते हैं और न ही उसे निहायत निजी डायरी बना देते हैं। ‘इक्कीस’ संतुलन साधती है। इस फ़िल्म में राष्ट्र की पुकार है, पर व्यक्ति का अस्तित्व भी उतना ही महत्वपूर्ण है। यही संतुलन फ़िल्म की सबसे बड़ी ताक़त बन कर उभरता है।

फ़िल्म की पटकथा सधी हुई है जिसे श्रीराम राघवन के साथ साथ पूजा लाढा सुर्ती और अरिजीत बिस्वास ने लिखा है। यह घटनाओं की सीधी रेखा नहीं खींचती, बल्कि स्मृतियों, वर्तमान और युद्ध-क्षणों के बीच सहज आवाजाही करती है। शुरुआती हिस्से में किरदार-निर्माण पर दिया गया समय कहानी को गहराई देता है। हम नायक को केवल वर्दी में नहीं, बल्कि घर, प्रशिक्षण और आंतरिक संवादों में भी देखते हैं। इससे युद्ध में लिया गया हर निर्णय और हर जोखिम दर्शक के लिए बेहद अर्थवान बनता है।

राघवन की खासियत रही है कि वे सस्पेंस को संवादों से नहीं, स्थितियों से रचते हैं। ‘इक्कीस’ में भी यह शैली स्पष्ट है। युद्ध के दृश्य तेज़ कट्स और शोर से नहीं, बल्कि प्रतीक्षा, मौन और अचानक घटने वाली घटनाओं से प्रभाव पैदा करते हैं। पटकथा कहीं-कहीं जान बूझकर धीमी होती है। यह धीमापन फ़िल्म की कमज़ोरी नहीं, बल्कि उसका नैतिक आग्रह है: युद्ध को तमाशा नहीं, अनुभव की तरह दिखाना।

फ़िल्म का अभिनय पक्ष संयमित और प्रभावशाली है। नायक की भूमिका में नवोदित अभिनेता अगस्त्य नंदा ने उम्र की मासूमियत और सैनिक की परिपक्वता दोनों को साथ साथ बखूबी साधा है। उनकी आंखों में डर भी है और संकल्प भी; आवाज़ में संकोच है और आदेश का आत्मविश्वास भी। यह द्वैत अभिनय को विश्वसनीय बनाता है। जयदीप अहलावत और धर्मेंद्र की परदे पर उपस्थिति मात्र फ़िल्म को एक नए स्तर तक ले जाती है।

सहायक भूमिकाएं, विशेषकर वरिष्ठ अधिकारियों और साथी सैनिकों की, इस कहानी को ठोस आधार देती हैं। यहां कोई भी पात्र ‘स्टॉक कैरेक्टर’ नहीं लगता। हर एक की अपनी सीमाएं, अपने भय और अपने छोटे-छोटे साहस हैं। एक अनुभवी अधिकारी का शांत संयम और एक युवा साथी का आवेग, ये विरोधाभास फिल्म के भावनात्मक तापमान को नियंत्रित रखते हैं।

‘इक्कीस’ के संवाद कम हैं, पर असरदार हैं। यह फिल्म लंबे भाषणों में विश्वास नहीं करती। यहां एक-एक पंक्ति वजन लेकर आती है, कभी आदेश की तरह, कभी स्वीकारोक्ति की तरह। युद्ध के बीच बोले गए साधारण वाक्य भी जीवन-मरण का अर्थ धारण कर लेते हैं। हिंदी-उर्दू की मिश्रित भाषा, सैन्य शब्दावली और स्थानीय मुहावरों का संतुलित प्रयोग फिल्म को प्रामाणिक बनाता है।

फ़िल्म की सिनेमैटोग्राफी की बात करें तो दृश्य-रचना फ़िल्म की आत्मा है। कैमरा युद्ध को ऊपर से नहीं, ज़मीन से देखता है ,जहां धूल है, ठंड है, और हर कदम के साथ अनिश्चितता। लंबे वाइड शॉट्स युद्ध-क्षेत्र की विशालता दिखाते हैं, जबकि क्लोज़-अप्स मन के भीतर की हलचल को पकड़ते हैं। रोशनी का प्रयोग, ख़ासकर रात के दृश्यों में, तनाव और अकेलेपन को उभारता है।

राघवन का यह निर्णय उल्लेखनीय है कि वे खून-खराबे को अनावश्यक रूप से नहीं उछालते। हिंसा यहां प्रभाव पैदा करने का साधन नहीं, बल्कि कहानी की अनिवार्यता है। यही वजह है कि जब भी हिंसा होती है, वह विचलित करती है क्योंकि वह अचानक और अपरिहार्य लगती है।

‘इक्कीस’ का बैकग्राउंड स्कोर बेहद संयमित है। सचिन-जिगर का संगीत भावनाओं को निर्देशित नहीं करता, बल्कि उन्हें जगह देता है। कई महत्वपूर्ण दृश्यों में सन्नाटा ही सबसे बड़ा स्कोर बनकर उभरता है। जब संगीत आता है, तो वह भीतर तक उतरता है न कि दृश्य को ढक देता है। देशभक्ति यहां गीतों के ज़रिए नहीं, बल्कि स्थितियों के माध्यम से व्यक्त होती है।

ध्वनि-डिज़ाइन विशेष उल्लेख के योग्य है। गोलियों की आवाज़, दूर से आती रेडियो कॉल, और अचानक छा जाने वाला मौन—ये सब मिलकर युद्ध का एक इमर्सिव अनुभव रचते हैं।

फिल्म का संपादन चुस्त है, पर उतावला नहीं। राघवन दर्शक को सोचने का, महसूस करने का समय देते हैं। कुछ दर्शकों को मध्यांतर के बाद की धीमी गति चुनौतीपूर्ण लग सकती है, पर यही धीमापन फ़िल्म की नैतिक ज़रूरत है। युद्ध की थकान, मानसिक दबाव और समय का खिंचाव, इन सबको एक साथ महसूस कराने के लिए यह गति आवश्यक है।

‘इक्कीस’ कई स्तरों पर काम करती है। एक स्तर पर यह साहस और कर्तव्य की कहानी है; दूसरे स्तर पर यह उम्र और ज़िम्मेदारी के असंतुलन की पड़ताल करती है। फ़िल्म यह सवाल उठाती है कि वीरता क्या है, क्या वह डर का न होना है, या डर के बावजूद आगे बढ़ना? यहां वीरता किसी एक बड़े क्षण में नहीं, बल्कि छोटे-छोटे निर्णयों की शृंखला में आकार लेती है।

फिल्म राष्ट्रवाद को भी एक परिपक्व दृष्टि से देखती है। यहां नारे नहीं, बल्कि मूल्य हैं। तिरंगा लहराता है, पर कैमरा उस चेहरे पर ठहरता है जो उसकी कीमत चुकाता है। यही दृष्टि ‘इक्कीस’ को भीड़ से अलग करती है।

श्रीराम राघवन इस फिल्म में अपने शिल्प के शिखर पर दिखते हैं। निर्देशक कहीं भी अपने पुराने फार्मूलों को दोहराते हुए नहीं बल्कि स्वयं को नए सिरे से गढ़ते हुए नज़र आते हैं। उन्होंने यह साबित किया है कि निर्देशक होने का मतलब एक ही तरह की फिल्में बनाना नहीं, बल्कि हर विषय के लिए उपयुक्त भाषा खोजना है। ‘इक्कीस’ में उनकी संवेदनशीलता, शोध और नैतिक स्पष्टता एक साथ दिखाई देती है।

फिल्म की सबसे बड़ी सीमा वही है जो उसकी ताक़त भी है, उसका संयम। जो दर्शक तेज़-तर्रार युद्ध दृश्य या स्पष्ट भावुकता की अपेक्षा रखते हैं, उन्हें ‘इक्कीस’ अपेक्षाकृत ठंडी और गंभीर लग सकती है। कुछ सहायक पात्रों को और विस्तार मिल सकता था, ताकि उनका प्रभाव और गहरा होता। फिर भी, ये कमियां फ़िल्म के समग्र प्रभाव को कम नहीं करतीं।

‘इक्कीस’ एक ऐसी फ़िल्म है जो देखने के बाद ख़त्म नहीं होती। वह आपके भीतर चलती रहती है। यह नायकत्व को मंच पर नहीं, मैदान में परिभाषित करती है; और देशभक्ति को शोर में नहीं, सन्नाटे में। श्रीराम राघवन ने यहां एक ईमानदार, संवेदनशील और सशक्त फिल्म रची है जो युद्ध को जीत-हार की कहानी से आगे ले जाकर मनुष्यता के सवालों तक पहुंचाती है।

यह फ़िल्म हमें याद दिलाती है कि असली वीरता अक्सर चुपचाप होती है और उसकी उम्र कभी-कभी सिर्फ़ ‘इक्कीस’ होती है।

आपके नज़दीकी सिनेमाघर में है। देख लीजिएगा।

(पंकज दुबे मशहूर बाइलिंगुअल उपन्यासकार और चर्चित यूट्यूब चैट शो ‘स्मॉल टाउन्स बिग स्टोरीज़” के होस्ट हैं।


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