ट्रंप और राहुल एक जैसे! भारत के उदय से असहज

राहुल कांग्रेस की उस व्यवस्था से आते हैं, जिसमें भारतीय परंपरा-स्वाभिमान उत्सव का नहीं, बल्कि तथाकथित पिछड़ेपन, उत्पीड़न और महिला-विरोध का प्रतीक माना जाता है। दशकों तक भारतीय संस्कृति के प्रति हीन-भावना रखने वालों को मतदाता लगातार खारिज कर रहे है। समय कई बार ऐसी चौंकाने वाली समानताएं हमारे सामने रख देता है, जो राजनीति-जीवन… Continue reading ट्रंप और राहुल एक जैसे! भारत के उदय से असहज

भोजपुरी की आवाज आखिर तक अनसुनी रहेगी?

भोजपुरी केवल एक बोली नहीं, बल्कि गंगा-सरयू-गंडक के दोआब से लेकर समुद्र पार मॉरीशस, सूरीनाम, फ़िज़ी, त्रिनिदाद तक फैली एक विश्वव्यापी सांस्कृतिक भाषा है। इसे बोलने वालों की संख्या लगभग 20 करोड़ है। यही वह भाषा है जो प्रवासी भारतीयों के बीच पहचान, स्मृति और स्वाभिमान की मुख्य कड़ी बनी हुई है। 21 फरवरी को… Continue reading भोजपुरी की आवाज आखिर तक अनसुनी रहेगी?

‘ओ’ रोमियो’: माफ़िया, मोहब्बत और मिज़ाज का शेक्सपीरियन संगम

सिने-सोहबत फ़िल्म पत्रकार-लेखक हुसैन ज़ैदी की किताब ‘द माफ़िया क्वींस ऑफ़ मुंबई‘ से प्रेरित है, जिसका स्क्रीनप्ले ख़ुद विशाल भारद्वाज ने लिखा है। ज़ैदी की लेखनी जहां अपराध जगत की स्त्रियों की जटिल दुनिया को दस्तावेज़ी सटीकता के साथ खोलती है। आज के ‘सिने-सोहबत’ में विशाल भारद्वाज की फ़िल्म ‘ओ’ रोमियो’ पर विमर्श करते हैं।… Continue reading ‘ओ’ रोमियो’: माफ़िया, मोहब्बत और मिज़ाज का शेक्सपीरियन संगम

एआई: जीवनसाथी या शत्रु?

एआई का सबसे घातक प्रभाव रचनात्मकता पर पड़ रहा है। पहले कलाकार, लेखक और संगीतकार अपनी कल्पना से कृतियां रचते थे। अब मिडजर्नी या डैल-ई जैसे टूल्स प्रॉम्प्ट पर चित्र बना देते हैं, वो भी सुंदरता भरे। लेकिन क्या यह रचनात्मकता है? शिखर सम्मेलन में भारतीय कलाकारों ने प्रदर्शन किया कि एआई जनित कला में… Continue reading एआई: जीवनसाथी या शत्रु?

भीड़ का बड़ा पैमाना होना, तकनीक में आगे होना नहीं

भारत ने ज़्यादा ध्यान उन तकनीकों को अपनाने और लागू करने पर दिया जो बाहर विकसित हुईं। हमारे कई श्रेष्ठ शोधकर्ता विदेश चले गए। अनुसंधान और विकास पर हमारा खर्च जीडीपी का लगभग 0.64 प्रतिशत है, जबकि अमेरिका 3.5 प्रतिशत और चीन 2.5 प्रतिशत खर्च करते हैं। यह फर्क सिर्फ आंकड़ों का नहीं, शक्ति का… Continue reading भीड़ का बड़ा पैमाना होना, तकनीक में आगे होना नहीं

यह न केवल चेतावनी बल्कि दावं पर भविष्य

आयोजन की अव्यवस्था एक रूपक बन गई। भीड़ से भरे हॉल, कमजोर कनेक्टिविटी और कड़ी सुरक्षा ने उन सहज संवादों को बाधित किया, जहां से नए विचार जन्म लेते हैं। यदि भारत नेतृत्व चाहता है तो उसे पैमाने के साथ-साथ सटीकता भी साधनी होगी—वह शांत दक्षता जो घोषणाओं को टिकाऊ संस्थाओं में बदलती है।….उत्सवी मॉडल… Continue reading यह न केवल चेतावनी बल्कि दावं पर भविष्य

साम्प्रदायिक चश्मे से वन्दे मातरम् देखना गलत

सरकार का कहना है कि 1937 में हटाए गए चार अंतरे औपनिवेशिक दबाव में हटाए गए थे और अब उन्हें वापस लाना सांस्कृतिक सम्मान का प्रश्न है। कुछ मुस्लिम और ईसाई समुदायों का तर्क है कि उनके धर्म में ईश्वर के अलावा किसी और को देवी रूप में मानना उचित नहीं है, इसलिए वे इसे… Continue reading साम्प्रदायिक चश्मे से वन्दे मातरम् देखना गलत

भारत की वेंचर कैपिटल केवल मृगतृष्णा

सरकारी विज्ञप्तियों में जिन यूनिकॉर्न का जश्न मनाया जाता है, उनके मुकाबले हजारों स्टार्टअप्स ऐसे हैं जिन्हें इस योजना की पूंजी कभी नहीं मिली। मान्यता प्राप्त स्टार्टअप्स में से केवल 1 से 2 प्रतिशत को ही लाभ मिला। वेंचर फंड्स से कंपनियों तक वास्तविक निवेश में देरी रही। मंजूरी चक्र लंबे हुए।… भारत वेंचर कैपिटल… Continue reading भारत की वेंचर कैपिटल केवल मृगतृष्णा

एचबीए1-सी टेस्ट और डायबिटीज

अध्ययन के अनुसार, दक्षिण एशियाई लोगों में एचबीए1सी और वास्तविक ब्लड ग्लूकोज के बीच सहसंबंध कमजोर है। उदाहरण के लिए, एनीमिया वाले क्षेत्रों में एचबीए1सी पर निर्भरता से डायबिटीज का निदान 20-30% मामलों में गलत हो सकता है। यह न केवल निदान को प्रभावित करता है, बल्कि उपचार को भी, अनावश्यक दवाएं या देरी से… Continue reading एचबीए1-सी टेस्ट और डायबिटीज

नफरत की खेती के नतीजे भुगतता पाकिस्तान

पाकिस्तान में लगभग 4 करोड़ शिया बसते हैं। पिछले दो दशकों में 4,000 से अधिक शिया मुसलमान इस्लाम के नाम पर जिहादी हमलों में मारे जा चुके हैं। यह दर्दनाक मौतें प्रशासनिक विफलता का परिणाम नहीं, बल्कि उस जहरीली सोच का स्वाभाविक नतीजा है, जिसका आधार ही असहिष्णुता और घृणा हैं। ….क्या मस्जिद में नमाज… Continue reading नफरत की खेती के नतीजे भुगतता पाकिस्तान

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