भारत की वेंचर कैपिटल केवल मृगतृष्णा

Categorized as लेख

सरकारी विज्ञप्तियों में जिन यूनिकॉर्न का जश्न मनाया जाता है, उनके मुकाबले हजारों स्टार्टअप्स ऐसे हैं जिन्हें इस योजना की पूंजी कभी नहीं मिली। मान्यता प्राप्त स्टार्टअप्स में से केवल 1 से 2 प्रतिशत को ही लाभ मिला। वेंचर फंड्स से कंपनियों तक वास्तविक निवेश में देरी रही। मंजूरी चक्र लंबे हुए।… भारत वेंचर कैपिटल को अनुदान मानेगा या रणनीतिक औजार, यही असली दांव है।

नई दिल्ली में अक्सर बजट की पंक्ति के साथ महत्वाकांक्षाओं के जुमले खुलते है। इस महीने वह 1.1 अरब डॉलर के नए “फंड ऑफ फंड्स” के रूप में आई है। केंद्रीय मंत्रिमंडल ने कृत्रिम बुद्धिमत्ता, उन्नत विनिर्माण और अन्य डीप-टेक क्षेत्रों में भारतीय स्टार्टअप्स को गति देने के लिए इस राज्य-समर्थित कोष को मंजूरी दी है। यह 2016 की उस पहल का विस्तार है, जब स्टार्टअप इंडिया के तहत सरकार ने लगभग 10,000 करोड़ रुपये सीधे कंपनियों को नहीं, बल्कि निजी वेंचर फंड्स के माध्यम से लगाने का फैसला किया था। सिडबी को नौकरशाही आवंटक नहीं, बल्कि उत्प्रेरक निवेशक की भूमिका दी गई थी। एक दशक बाद सवाल यह नहीं कि प्रयोग चला या नहीं, बल्कि यह है कि क्या वह भारत की ज़रूरत के अनुरूप चला, और क्या लगभग उसी पैमाने पर दोहराना महत्वाकांक्षा है या सावधानी।

कागज़ पर 2016 का फंड ऑफ फंड्स सफल दिखता है। सिडबी की प्रतिबद्धताओं ने 140 से अधिक वेंचर फंड्स को सहारा दिया, जिन्होंने मिलकर लगभग 1,300 स्टार्टअप्स में 25,000 करोड़ रुपये से अधिक जुटाए। 22 कंपनियां यूनिकॉर्न बनीं। डीप-टेक उपक्रमों में हजारों करोड़ आए। महिला-नेतृत्व वाली कंपनियों और टियर-2, टियर-3 शहरों के उद्यमियों तक पूंजी पहुंची। लाखों नौकरियां बनीं। संरचना चतुर थी। मंत्रालय से सीधे चेक लिखने के बजाय सरकार ने निजी फंड्स को एंकर किया और उनसे सार्वजनिक धन के साथ अतिरिक्त पूंजी जुटाने को कहा। सिद्धांत यह था कि दिल्ली का एक रुपया मुंबई, सिंगापुर या सिलिकॉन वैली से कई रुपये खींच लाएगा। इस मापदंड पर गुणक असर काम करता दिखा। आज भारत खुद को दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा स्टार्टअप इकोसिस्टम कहता है, जहां दो लाख से अधिक पंजीकृत स्टार्टअप हैं, जबकि एक दशक पहले गिनती सैकड़ों में थी। सस्ता डेटा, डिजिटल सार्वजनिक ढांचा और विशाल घरेलू बाजार इस उछाल के आधार रहे। 2025 में जब वैश्विक वेंचर निवेश धीमा पड़ा, तब राज्य-एंकर पूंजी ने सहारा भी दिया।

लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती। सरकारी विज्ञप्तियों में जिन यूनिकॉर्न का जश्न मनाया जाता है, उनके मुकाबले हजारों स्टार्टअप्स ऐसे हैं जिन्हें इस योजना की पूंजी कभी नहीं मिली। मान्यता प्राप्त स्टार्टअप्स में से केवल 1 से 2 प्रतिशत को ही लाभ मिला। वेंचर फंड्स से कंपनियों तक वास्तविक निवेश में देरी रही। मंजूरी चक्र लंबे हुए। औसत निवेश लगभग 18 करोड़ रुपये, यानी करीब 20 लाख डॉलर प्रति स्टार्टअप बैठता है। यह राशि डीप-टेक जैसे क्षेत्रों के लिए अपर्याप्त है, जहां 1 से 2 करोड़ डॉलर तक की शुरुआती पूंजी चाहिए होती है। विस्तृत इकोसिस्टम में पतली फैली पूंजी प्रतीकात्मक बन जाती है, परिवर्तनकारी नहीं।

और अधिक गंभीर प्रश्न यह है कि इनमें से कितनी कंपनियां टिकती हैं। वैश्विक स्तर पर अधिकांश स्टार्टअप पांच वर्षों में असफल हो जाते हैं। भारत भी अलग नहीं। स्वतंत्र अध्ययनों के अनुसार फंड समर्थित कंपनियों का प्रदर्शन औसत से थोड़ा बेहतर है, पर दीर्घकालिक डेटा सीमित है। सरकार यूनिकॉर्न और रोजगार गिनती है, अर्थशास्त्री स्थायी राजस्व, निर्यात और पेटेंट देखते हैं। मूल्यांकन स्थायित्व नहीं है। और स्थायित्व ही तय करता है कि कोई राष्ट्र क्षमता बनाता है या केवल अटकलों का मंच बनता है।

पहला फंड उस समय आया जब भारत तेजी से डिजिटलीकरण कर रहा था और वैश्विक पूंजी प्रचुर थी। विश्वास था कि सीमित सार्वजनिक एंकरिंग निजी जोखिम को प्रेरित करेगी। पर वेंचर कैपिटल केवल धन नहीं, जोखिम की संस्कृति है। सरकारी धन, भले निजी प्रबंधकों के जरिए आए, सावधानी की ओर झुकाव लाता है। अनुपालन की मानसिकता निवेश समितियों में उतरती है। सुरक्षित दांव विवेकपूर्ण लगने लगते हैं। फंड्स त्वरित राजस्व वाले प्लेटफॉर्म की ओर झुकते हैं, लंबी अवधि वाली प्रयोगशालाओं से दूर रहते हैं। यह भ्रष्टाचार नहीं, स्वभाव है। जब राज्य सबसे भरोसेमंद निवेशक बनता है, जोखिम का पैमाना बदल जाता है।

इसीलिए सॉफ्टवेयर, फिनटेक और उपभोक्ता ऐप्स फले-फूले, पर हार्डवेयर, सेमीकंडक्टर उपकरण, औद्योगिक रोबोटिक्स और जलवायु विज्ञान जैसे क्षेत्रों में निवेश कम रहा। ये क्षेत्र धीमे, कठिन और कम आकर्षक हैं। इनमें धैर्य चाहिए, जो बाजार और मंत्रालय दोनों से अक्सर नहीं मिलता।

नया फंड डीप-टेक पर जोर देने की बात करता है। यह स्वागतयोग्य है। पर यदि संरचना में बदलाव नहीं हुआ, मंजूरी तेज नहीं हुई, निवेश आकार बड़ा नहीं हुआ और फंड मैनेजरों को वास्तविक स्वायत्तता नहीं मिली, तो यह अपने पूर्ववर्ती की सीमाएं दोहराएगा।

भारत यह कदम शून्य में नहीं उठा रहा। वैश्विक तकनीकी व्यवस्था बदल रही है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता आर्थिक संतुलन नया लिख रही है। आपूर्ति शृंखलाएं पुनर्गठित हो रही हैं। राष्ट्र तय कर रहे हैं कि वे भविष्य बनाएंगे या केवल उपभोग करेंगे। भारत की युवा आबादी सदा लाभांश नहीं रहेगी। उच्च मूल्य उद्योगों के बिना वही बोझ बन सकती है।

प्रश्न पैमाने का है। यदि 2016 से अर्थव्यवस्था लगभग दोगुनी हुई, तो वेंचर कोष लगभग उसी स्तर पर क्यों है। यदि तकनीकी संप्रभुता लक्ष्य है, तो पेंशन और बीमा फंड अब भी हिचक क्यों रहे हैं। यदि टिकाऊपन महत्वपूर्ण है, तो दीर्घकालिक प्रदर्शन डेटा मूल्यांकन का केंद्र क्यों नहीं है। ये लेखांकन के नहीं, सभ्यतागत प्रश्न हैं।

परिवर्तनकारी दृष्टिकोण अलग होगा। वह निर्णय विकेंद्रीकृत करेगा, क्षेत्रीय फंड्स को स्वायत्तता देगा। घरेलू संस्थागत पूंजी को स्पष्ट नियमों से खोलेगा। मूल्यांकन को राजस्व, निर्यात और पेटेंट से जोड़ेगा। और असफलता को नवाचार का हिस्सा मानेगा। वेंचर इकोसिस्टम घोषणाओं से नहीं बनता, प्रयोग और पुनरावृत्ति से बनता है। राज्य की सर्वोत्तम भूमिका माहौल बनाना है, परिणाम लिखना नहीं।

पहले दशक ने पूंजी बढ़ाई, भागीदारी विस्तृत की, पर गहरे वैज्ञानिक जोखिम की सीमाएं भी दिखाईं। नया 1.1 अरब डॉलर उदारता की नहीं, कल्पनाशीलता की परीक्षा है। भारत वेंचर कैपिटल को अनुदान मानेगा या रणनीतिक औजार, यही असली दांव है। यह सिर्फ वित्तीय जुआ नहीं, यह तय करेगा कि राज्य प्रतिभा का संरक्षक बनेगा या उसका सावधान लेखाकार।


Previous News Next News

More News

सत्रावसान में देरी का एक रिकॉर्ड तो टूटा

September 29, 2026

संसद का मानसून सत्र समाप्त हुए डेढ़ महीने से ज्यादा हो गए। सत्र 13 अगस्त को स्थगित हुआ था। लेकिन अभी तक सत्रावसान नहीं किया गया है। संसद स्थघित हुए 47 दिन हो गए हैं। आमतौर पर अनिश्चितकाल तक के लिए स्थगित होने के एक हफ्ते में सत्रावसान कर दिया जाता है। उसके बाद जब…

सीपीएम का अपना एजेंडा है

September 29, 2026

देश की सबसे बड़ी कम्युनिस्ट पार्टी सीपीएम के महासचिव एमए बेबी ने विपक्षी गठबंधन की बैठक बुलाने की पहल की। इस पहल पर ममता बनर्जी ने सबसे पहले जवाब दिया और उन्होंने बेबी से फोन पर बात की। कांग्रेस ने भी इस पर सकारात्मक प्रतिक्रिया दी और उसके बाद 30 सितंबर की बैठक तय हुई।…

सपा-कांग्रेस की मुस्लिम वोट की खींचतान

September 29, 2026

वैसे उत्तर प्रदेश के मुसलमानो के मन में कोई भ्रम नहीं है। वे अखिलेश यादव और समाजवादी पार्टी के साथ हैं क्योंकि उनको लग रहा है कि सपा ही इस बार भाजपा से लड़ने वाली मुख्य ताकत है। पिछले लोकसभा चुनाव मे उन्होंने देखा कि भाजपा के समर्थक मतदाताओं में भी अगर भाजपा से नाराजगी…

यूपीएससी के सवाल क्या एआई बना रहा है?

September 29, 2026

यह बहुत परेशान करने वाला सवाल है क्योंकि संघ लोक सेवा आयोग यानी यूपीएससी एकमात्र ऐसी संस्था है, जिस पर प्रतियोगी परीक्षाओं में शामिल होने वाले अभ्यर्थी आज भी आंख मूंद कर भरोसा करते हैं। इसका भरोसा इतना गहरा है कि सुप्रीम कोर्ट ने दो बार अपनी सुनवाई में नेशनल टेस्टिंग एजेंसी यानी एनटीए और…

साहब अच्छे एक्टर नहीं!

September 29, 2026

कारण जो हो, साहब का विदेशियों के प्रति प्रेमिल झुकाव, और देसियों के प्रति रूखा बर्ताव बेढब है। फिर, बार-बार सीमित अंदाज, ऊँचे, हवाई दावे, वैज्ञानिकों विशेषज्ञों जैसे ऑडियेंस में भी घिसे-पिटे मुहावरे, उपदेश, आदि उन की समझ का भी सीमित दायरा दिखाता है। ऊँचे पद से वह थोड़ा ढँका जरूर रहा, पर छिपा नहीं…

logo