एक समय था जब फॉलोअर्स की संख्या से क़ीमत तय होती थी। जिसके ज़्यादा अनुयायी, वही असरदार, वही ‘प्रासंगिक’। मतलब भीड़ का आकार ही पहचान था, पहुँच थी, यहाँ तक कि ताक़त भी। लेकिन ‘द न्यूर्याकर में छपे ताजा लेख (It’s Cool to Have No Followers Now) ने बताया कि यह तर्क चुपचाप ढह चुका… Continue reading सोशल मीडिया धीरे-धीरे ढ़ह रहा है?
