समस्या कहीं गहरी है

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बिना आर्थिक भागीदारी बढ़ाए और सामाजिक परिवेश बदले सिर्फ राजनीति प्रतिनिधित्व देना प्रतीकात्मक महत्त्व भर का साबित हो सकता है। ऐसी अनेक मिसालें अभी मौजूद हैं। अतः महिला आरक्षण की बहस को अधिक बड़ा फ़लक दिए जाने की जरूरत है।

 सुप्रीम कोर्ट ने महिलाओं को ‘सबसे बड़ी अल्पसंख्यक’ बताया है। अगर इसका अर्थ निर्णय के स्थलों और नीति निर्माण की प्रक्रिया में उपस्थिति से है, तो कोर्ट की राय से सहज सहमत हुआ जा सकता है। वैसे ये टिप्पणी करते हुए जस्टिस बी।वी। नागरत्नम्मा ने आबादी में महिलाओं की संख्या का भी जिक्र किया। कहा कि कुल आबादी में महिलाएं 48।44 फीसदी हैं। यानी संख्यात्मक रूप से भी वे अल्पसंख्यक हैं। जस्टिस नागरत्नम्मा ने कहा कि संविधान में 106वां संशोधन महिलाओं को राजनीतिक न्याय देने की मिसाल है, हालांकि उन्होंने सवाल किया कि आखिर आरक्षण के प्रावधान से अलग भी राजनीति में महिलाओं को प्रतिनिधित्व क्यों नहीं दिया जा सकता।

जस्टिस नागरत्नम्मा और जस्टिस आर। महादेवन की बेंच एक याचिका पर सुनवाई कर रही है, जो विधायिका में महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण देने के लिए हुए संविधान संशोधन से संबंधित है। चूंकि उपरोक्त आरक्षण जनगणना के बाद होने वाले चुनाव में लागू होगा, तो इस कथित देर पर याचिका में सवाल खड़े किए गए हैं। मगर कोर्ट इस देर से अधिक परेशान नहीं दिखा। इसी क्रम में बिना आरक्षण लागू हुए प्रतिनिधित्व का प्रश्न उठाया गया। बहरहाल, प्रतिनिधित्व अभी मिले या जनगणना के बाद कुछ अहम सवाल कायम रहेंगे। इनमें प्रमुख यह है कि प्रतिनिधित्व दिखावटी होना चाहिए या यह वास्तविक सशक्तीकरण का परिणाम होना चाहिए? आरक्षण के प्रावधान अक्सर वंचित या पीड़ित समूहों की स्व-प्रेरणा एवं अपनी शक्ति से जुड़े मुद्दों को नजरअंदाज कर देते हैँ।

संभव है कि यही बात महिला आरक्षण के संदर्भ में भी लागू होती दिखे। सत्ता के ऊंचे स्थलों पर महिलाओं की उपस्थिति बेहद कम है, तो उसका कारण वह सामाजिक एवं सांस्कृतिक धरातल है, जिसमें बच्चियों को लड़कों से कमतर अवसर मिल पाते हैँ। खुद जस्टिस नागरत्नम्मा ने भी कहा कि राजनीति, सामाजिक एवं आर्थिक न्याय का समान महत्त्व है। तो बिना आर्थिक भागीदारी बढ़ाए और सामाजिक परिवेश बदले सिर्फ राजनीति प्रतिनिधित्व देने की कोशिश प्रतीकात्मक महत्त्व की साबित हो सकती है। फिलहाल, ऐसी अनेक मिसालें भारतीय राजनीति में मौजूद हैं। अतः महिला आरक्षण की बहस को अधिक बड़ा दायरा दिए जाने की जरूरत है।


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