‘मदर ऑफ ऑल डील्स’ कैसे प्रभावी बने?

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समझौता वैश्विक अनिश्चितताओं, जैसे कि अमेरिकी टैरिफ और चीन से व्यापार विचलन के बीच, भारत को रणनीतिक लाभ देगा। अनुमान है कि यह समझौता द्विपक्षीय व्यापार को 41-65 प्रतिशत बढ़ाएगा और जीडीपी में 0.12-0.13 प्रतिशत की वृद्धि करेगा।  यह चीन से व्यापार विचलन (5-9 प्रतिशत) को बढ़ावा देगा, जो यूरोपीय संघ की डी-रिस्किंग और भारत की विविधीकरण रणनीति से मेल खाता है।

भारत-यूरोपीय संघ मुक्त व्यापार समझौता, जिसे ‘मदर ऑफ ऑल डील्स’ के रूप में जाना जा रहा है, 27 जनवरी 2026 को संपन्न हुआ है। यह समझौता लगभग दो दशकों की लंबी वार्ताओं का परिणाम है और इसमें 2 अरब से अधिक की आबादी तथा 27 ट्रिलियन डॉलर की संयुक्त अर्थव्यवस्था शामिल है, जो वैश्विक जीडीपी का लगभग 25 प्रतिशत है। यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयेन ने इसे ‘मदर ऑफ ऑल डील्स’ कहा है, जबकि भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसे वैश्विक व्यापार का एक-तिहाई हिस्सा कवर करने वाला ऐतिहासिक कदम बताया।

यह समझौता भारत की आर्थिक महत्वाकांक्षाओं को नई ऊंचाइयों पर ले जाने का अवसर प्रदान करता है, विशेषकर ऐसे समय में जब अमेरिकी टैरिफ के कारण निर्यात प्रभावित हो रहा है। हालांकि, इसे प्रभावी बनाने के लिए सरकार को रणनीतिक कदम उठाने होंगे, जिसमें अर्थशास्त्री प्रोफेसर अरुण कुमार की चेतावनियों को ध्यान में रखना आवश्यक है।

इस समझौते के तहत यूरोपीय संघ भारत में निर्यात होने वाले 96.6 प्रतिशत सामानों पर टैरिफ को समाप्त या कम करेगा, जिससे यूरोपीय कंपनियों को सालाना लगभग 4 बिलियन यूरो (लगभग 4.7 बिलियन डॉलर) की बचत होगी। भारत ने यूरोपीय संघ को 102 सेवा उप-क्षेत्रों में पहुंच प्रदान की है, जबकि यूरोपीय संघ ने भारत को 144 उप-क्षेत्रों में अवसर दिए हैं, जिसमें वित्तीय, समुद्री और दूरसंचार सेवाएं शामिल हैं।

ऑटोमोटिव क्षेत्र में यूरोपीय कारों पर वर्तमान 110 प्रतिशत टैरिफ को धीरे-धीरे 10 प्रतिशत तक कम किया जाएगा। भारत के लिए यह समझौता टेक्सटाइल, फार्मास्यूटिकल्स, आईटी सेवाओं और इंजीनियरिंग निर्यात को बढ़ावा देगा। अनुमान है कि यह समझौता 2032 तक यूरोपीय संघ के भारत में निर्यात को दोगुना कर देगा।  साथ ही, यह अमेरिकी टैरिफ के प्रभाव को कम करने में मदद करेगा, जहां भारत के श्रम-गहन निर्यात प्रभावित हो रहे हैं।

माना जा रहा है कि यह समझौता ‘आत्मनिर्भर भारत’ और ‘मेक इन इंडिया’ योजनाओं के साथ तालमेल बैठाता है। यह न केवल निर्यात को बढ़ाएगा बल्कि प्रौद्योगिकी हस्तांतरण, निवेश और रोजगार सृजन को भी प्रोत्साहित करेगा। उदाहरण के लिए, यूरोपीय संघ के साथ समझौता भारतीय एमएसएमई को वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में शामिल होने का अवसर देगा। हालांकि, इसके लाभों को अधिकतम करने के लिए चुनौतियों का सामना करना होगा। यहां जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के सेवानिवृत्त प्रोफेसर अरुण कुमार की चेतावनियां प्रासंगिक हैं।

प्रोफेसर कुमार, जो काले धन और आर्थिक नीतियों के विशेषज्ञ हैं, ने भारत-यूरोपीय संघ एफटीए को ‘अमेरिका जैसा एक और जाल’ बताया है। उन्होंने असमान शर्तों, घरेलू उद्योगों विशेषकर कृषि और डेयरी पर जोखिम, व्यापार घाटे में वृद्धि, नीति स्थान की हानि और दीर्घकालिक आर्थिक निर्भरता की चेतावनी दी है। उनका कहना है कि पिछले एफटीए में भागीदारों को अधिक लाभ हुआ है, और निवेश नियमों, नियामक संरेखण तथा बाजार बाढ़ से आत्मनिर्भरता कमजोर हो सकती है। उन्होंने अमेरिकी व्यापार समझौतों से सबक लेने की सलाह दी है, जहां कृषि बाजार खोलने की मांग भारत के लिए कठिन है।

इन चेतावनियों को ध्यान में रखते हुए, सरकार को रचनात्मक कदम उठाने चाहिए। सबसे पहले, संवेदनशील क्षेत्रों की सुरक्षा सुनिश्चित करें। समझौते में डेयरी और कुछ कृषि उत्पादों को बाहर रखा गया है, लेकिन कुमार की चेतावनी के अनुसार, बाजार बाढ़ से बचने के लिए सख्त निगरानी तंत्र विकसित करें। सरकार कृषि क्षेत्र में सब्सिडी और समर्थन को मजबूत करे, जैसे कि फसल बीमा और बाजार लिंकेज को बढ़ावा देकर। साथ ही, एग्रीस्टैक जैसी डिजिटल पहलों को तेज करें ताकि किसान वैश्विक मानकों के अनुरूप उत्पादन कर सकें।

दूसरा, एमएसएमई और छोटे उद्योगों की तैयारी पर फोकस करें। प्रोफ़ेसर कुमार की निर्भरता की चेतावनी को संबोधित करने के लिए, उत्पादन लिंक्ड इंसेंटिव (पीएलआई) स्कीम को विस्तार दें, विशेषकर टेक्सटाइल, फार्मा और इलेक्ट्रॉनिक्स में। एमएसएमई को क्रेडिट पहुंच, कौशल विकास और निर्यात प्रशिक्षण प्रदान करें। यूरोपीय संघ के साथ संयुक्त निवेश कोष स्थापित करें जो प्रौद्योगिकी हस्तांतरण पर केंद्रित हो, ताकि ‘मेक इन इंडिया’ मजबूत हो सके।

तीसरा, पर्यावरण और सस्टेनेबिलिटी मानकों का अनुपालन। यूरोपीय संघ का कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म (सीबीएएम), जो 1 जनवरी 2026 से पूर्ण रूप से लागू है, भारतीय स्टील और एल्यूमिनियम पर कार्बन टैक्स लगा सकता है, जिससे निर्यातकों को 22 प्रतिशत तक कीमत कम करनी पड़ सकती है। सरकार को नवीकरणीय ऊर्जा में निवेश बढ़ाकर, जैसे कि 500 जीडब्ल्यू सौर लक्ष्य की दिशा में तेजी से आगे बढ़कर, इस चुनौती का सामना करना चाहिए। सीबीएएम-अनुपालन प्रमाणन प्रणाली विकसित करें और यूरोपीय संघ के साथ संयुक्त हरित प्रौद्योगिकी परियोजनाएं शुरू करें।

चौथा, व्यापार घाटे को संतुलित करने के लिए विविधीकरण। प्रोफ़ेसर कुमार की व्यापार घाटे की चेतावनी को देखते हुए, सरकार निर्यात को बढ़ावा देने के लिए नए बाजारों की तलाश करे, जैसे कि अफ्रीका और लैटिन ्ट्रीय हितों की रक्षा करे।

पांचवां, मानव संसाधन और प्रवासन पर फोकस। समझौता प्रवासन और मोबिलिटी फ्रेमवर्क से जुड़ा है, जो ‘टैलेंट एंड सिक्योरिटी’ पर केंद्रित है। सरकार को कौशल विकास कार्यक्रमों को यूरोपीय मानकों के अनुरूप बनाना चाहिए, जैसे कि आईटी और इंजीनियरिंग में। इससे युवा रोजगार बढ़ेगा और ब्रेन ड्रेन को रोका जा सकेगा।

इन सुझावों से, सरकार यदि चाहे तो प्रोफ़ेसर कुमार की चेतावनियों को अवसर में बदल सकती है। समझौता वैश्विक अनिश्चितताओं, जैसे कि अमेरिकी टैरिफ और चीन से व्यापार विचलन के बीच, भारत को रणनीतिक लाभ देगा। अनुमान है कि यह समझौता द्विपक्षीय व्यापार को 41-65 प्रतिशत बढ़ाएगा और जीडीपी में 0.12-0.13 प्रतिशत की वृद्धि करेगा।  यह चीन से व्यापार विचलन (5-9 प्रतिशत) को बढ़ावा देगा, जो यूरोपीय संघ की डी-रिस्किंग और भारत की विविधीकरण रणनीति से मेल खाता है।

राष्ट्र की दिशा में ले जाने का माध्यम बन सकता है। कबीरदास के दोहे, ‘निंदक नियरे राखिए, ऑंगन कुटी छवाय, बिन पानी, साबुन बिना, निर्मल करे सुभाय।।’ को ध्यान में रखते हुए  सरकार को प्रोफेसर कुमार की चेतावनियों को गंभीरता से लेना चाहिए और संतुलित और समावेशी दृष्टिकोण अपनाना चाहिए। इससे न केवल आर्थिक विकास होगा बल्कि आत्मनिर्भरता भी मजबूत होगी। 2047 तक ‘विकसित भारत’ का सपना साकार करने के लिए यह समझौता एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर साबित हो सकता है, बशर्ते इसे प्रभावी ढंग से लागू किया जाए।


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