मौलाना मदनी का जुल्म

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जमाते उलेमा के नेता मौलाना महमूद मदनी ने गत ३० नवंबर को भोपाल में एक सभा में कहा कि ‘इस्लाम और मुसलमानों के दुश्मनों ने जिहाद जैसी इस्लाम की पवित्र धारणा को दुर्व्यवहार, अव्यवस्था और हिंसा से जुड़े शब्दों में बदल दिया है। … कहीं पर कोई आतंकवादी घटना हो जाती है तो उसको जिहाद बता दिया जाता है। मुसलमानों के ऊपर गलत आरोप लगाए जाते हैं।  जब-जब जुल्म होगा तब-तब जिहाद होगा।’

उस पर भाजपा नेता, और बिहार के राज्यपाल, आरिफ मुहम्मद खान ने कहा कि मौलाना मदनी के देवबंदी मदरसे में पढ़ाया जाता है कि ‘दीन ए हक की तरफ बुलाने और जो उसे कुबूल ना करे उससे जंग करने को जिहाद कहते हैं।’ यानी जो मुसलमान बनने के लिए कहे जाने पर मना कर दे, उस से लड़ना जिहाद है।

यह प्रसंग जिहाद को ठीक से समझने की माँग करता है। विशेषकर हिन्दुओं को, जो इसे उतना ही जानते हैं जितना वृन्दावन की गाय। भाजपा नेताओं की प्रतिक्रियाएं भी यह दिखाती हैं। किसी ने जिहाद पर कुछ न कहा, केवल मदनी को बुरा-भला कहने बैठ गये! यानी, साँप छोड़ बस लकीर पीटते रहना।

पहली बात, मदनी किन्हें ‘इस्लाम और मुसलमान के दुश्मन’ बता रहे हैं?

मूल इस्लामी किताबें — कुरान, हदीस (मुहम्मद के कथन), और सीरा (मुहम्मद की जीवनी) — ही दूसरे सब को दुश्मन बताती है। कुरान (2:98) के अनुसार ‘जो अल्लाह के कहे से इन्कार करते हैं’ वे काफिर हैं, और ‘अल्लाह काफिरों का दुश्मन है’। सो इस्लाम ही गैर-मुस्लिमों को दुश्मन कह कर उन्हें मिटाने, अपमानित करने की खुली घोषणा करता है। इस अपनी ठानी दुश्मनी को स्थाई भी बताता है (कुरान, 60:4)।

तब दुश्मनी का दोषी कौन है, मौलाना?

कुरान की लगभग चार सौ आयतों में काफिरों, यानी गैर-मुस्लिमों का जिक्र है। सभी में मानो पानी पी-पीकर ‘मूर्तिपूजा’, ‘झूठे ईश्वर’, ‘बहुदेवपूजा’, आदि दूसरे धर्मों और उन्हें मानने वालों को कोसा गया है। उन्हें मिटा देने के निर्देश हैं। यही ‘अल्लाह का काम’ यानी जिहाद है। इस का अर्थ मुहम्मद के शब्दों में: ‘जो इस्लाम का वर्चस्व बनाने के लिए लड़ता है, वही अल्लाह के लिए लड़ता है।’ (सहीह बुखारी, 1:3:125)।

यह जिहाद मुस्लिम समाज के लिए बाध्यकारी भी है, ‘जब तक कि पूरी दुनिया अल्लाह की नहीं हो जाती’ (कुरान, 8:39)। मुहम्मद के अनुसार, यदि कोई मुसलमान ‘बिना जिहाद में हिस्सा लिए मर जाता है, जिस ने जिहाद में हिस्सा लेने की ख्वाहिश नहीं की, वह एक मुनाफिक (पाखंडी) की मौत मरता है।’ (सहीह मुस्लिम, 20:4696)। मुहम्मद ने मुनाफिक को घृणित कहा है। यानी, जिहाद लड़ना न चाहने वाला भी हेच है। सो उन मुसलमानों को भी धमकाया गया है, जो जिहाद लड़ने से बचना चाहें।

तब ‘मूर्तिपूजकों और ‘कई देवी-देवताओं को पूजने वाले’ हिन्दुओं, बौद्धों, जैनियों, आदि को इस्लाम के प्रति क्या रुख रखना चाहिए? यह मदनी ही बताएं।‌

असल में, इस्लाम केवल रिलीजन नहीं है। वह मुख्यत: राजनीति है। उस की तीनों मूल किताबें आधे से अधिक बस दूसरों को मुस्लिम बनाने या मिटाने की फिक्र से भरी हैं। इस प्रकार, राजनीतिक इस्लाम से सभी प्रभावित होते हैं। इसीलिए उस की आलोचना सब का अधिकार ही नहीं, कर्तव्य भी है। हिन्दुओं, बौद्धों, सिखों, जैनियों व नास्तिकों के लिए भी अपने धर्म, संस्कृति, विचार-विश्वास, समाज और कानूनों की रक्षा का कर्तव्य।

फिर, इस्लामी शब्दावली में ‘जुल्म’ का भी अलग ही अर्थ है! यह संकेत आरिफ मुहम्मद खान की टिप्पणी में भी है। कुरान में ‘सब से बड़ा जुल्म’ है — मूर्तिपूजा करना! कुरान की आयतें 31:13, 4:48, 4:116, आदि कहती हैं कि मूर्तिपूजा सब से बड़ा जुल्म, ‘जुल्मो-अजीम’ है। इस हद तक कि, बाकी सब माफ हो सकता है, परन्तु शिर्क या मूर्तिपूजा नहीं। विविध देवी-देवताओं, या उन की मूर्ति की पूजा करना सब से बड़ा ‘जुल्म’ है। इस प्रकार, मदनी की बात का इस्लामी अर्थ है कि जब तक मूर्तिपूजा रहेगी, तब तक उसे मिटाने को जिहाद चलता रहेगा। महमूद गजनवी से लेकर तालिबान तक सतत इतिहास भी यही है। काशी, मथुरा, अयोध्या में और क्या हुआ था? जिहादियों ने ‘जुल्म’ ही खत्म किया था!

इसलिए, देवबंदी मदरसों द्वारा ‘जुल्म’ का अर्थ इस्लाम में आने का निमंत्रण अस्वीकार करना बताना सही है। यानी यह पढ़ाना कि जब तक मूर्तिपूजा, बहुदेवपूजा करने वाले लोग मुसलमान नहीं बन जाते, तब तक उन के खिलाफ जिहाद रहेगा। यह केवल कोरा सिद्धांत नहीं, वरन पूरी चौदह सदियों का इस्लामी व्यवहार भी है। पिछले सात-आठ दशकों में ही पूर्वी बंगाल, कश्मीर, और पश्चिमी पंजाब के हजारों मंदिरों व देवमूर्तियों का क्या हुआ? उन का अस्तित्व ही ‘जुल्म’ था — यह बात हिन्दू नेता न समझना चाहें, पर तमाम इस्लामी समझते हैं।‌ इसलिए उन्हें नेस्तनाबूद करना अपना फर्ज मानते हैं।‌ यह किसी मौलाना की निजी राय नहीं, बल्कि इस्लाम का उसूल है। यही है मौलाना मदनी का: ‘जुल्म के खिलाफ जिहाद।’

मदनी यह सब बेहतर जानते हैं। पर तेवर दिखाते हैं मानो मुसलमानों पर ही अत्याचार हो रहा हो! जिहाद की असलियत छिपा कर किसी तरह मुसलमानों को भड़काना चाहते है। क्योंकि बड़ी संख्या में मुसलमान भी दूसरे धर्म वालों का खात्मा करना बेजा समझते हैं। पर जिहाद को ‘पवित्र’ बताकर, ‘वन्दे मातरम्’ का बहाना गढ़कर मदनी अपनी ओर से मुसलमानों को ललकार रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट को धमका रहे हैं। जबकि कोई किसी को ‘वन्दे मातरम्’ कहने के लिए मजबूर नहीं करता। सो, मदनी सिर्फ उत्तेजना और डर पैदा करना चाहते हैं। ताकि हिन्दू असहज और आतंकित हों, और जिहाद को ‘पवित्र’ मान कर उस पर चुप रहें। यह राजनीतिक इस्लाम का‌ क्लासिक तेवर है।

यह कुरान में  लिखा है कि काफिर को आतंकित किया जा सकता है (8:12) —  “याद करो तुम्हारे अल्लाह ने फरिश्तों को कहा, ‘मैं तुम्हारे साथ हूँ। सो तुम मोमिनो को मजबूती से खड़ा रखो। मैं काफिरों के दिल में आतंक भर दूँगा। फिर तुम उन की गर्दनों पर मारो और उन की हर ऊँगलियों को।’”

अब सोचें, किसी मुस्लिम द्वारा काफिरों की गर्दन और ऊँगलियाँ काट देना आतंकवाद है, या जिहाद?

इसी तरह, कुरान दूसरों को अपमानित करने भी कहता है (9:29) — ‘‘किताब वाले लोग जो अल्लाह पर ईमान नहीं लाते, न अखीरत को मानते हैं, न वे चीजें छोड़ते हैं जिसे अल्लाह ने अपने रसूल के माध्यम से हराम ठहराया, उन से तब तक लड़ो जब तक वे अपमानित हो कर जजिया (टैक्स) देने के लिए तैयार नहीं हो जाते।’’

विचार करें — ऐसे निर्देश रिलीजन है या पॉलिटिक्स? कुरान ऐसे निर्देशों से ओत-प्रोत है।

तब मदनी जिसे ‘आतंकवादी घटना’ कहकर अपने ‘पवित्र जिहाद’ से अलग दिखाना चाहते हैं, उस का मतलब क्या है? क्योंकि जिन भी कामों — किसी की गर्दन काट देना, किसी काफिले या गाँव पर हमलाकर लोगों से इस्लाम कबूल करवाने, गुलाम बनकर बेचने, जिम्मी बना कर अपमानित, नीच दरजे का जीवन जीने को मजबूर करना, उन की स्त्रियों-बच्चों को ‘लूट का माल’ मान कर मुस्लिम लड़ाकों में बाँटना, आदि — को आतंकवाद कहा जाता है, वह मुहम्मद ने स्वयं किए थे। यह सब सीरा में बारं-बार दर्ज है। इन सब कामों को मुहम्मद ने जिहाद कहा था। अतः इसे ‘आतंकवादी घटना’ नहीं कहा जा सकता। यह राजनीतिक इस्लाम की सामान्य गतिविधि है।

मुहम्मद ने खुद कहा था कि, ‘’मुझे पाँच चीजें मिली हैं जो पहले किसी और को नहीं मिली थी।’ जिस में पहली ही चीज यह थी:  ‘अल्लाह ने आतंक द्वारा मुझे जीत दिलाई… मेरे दुश्मनों को आतंकित करके।’ तीसरी चीज थी: ‘लड़ाई में लूटा गया माल मेरे लिए जायज बनाया, जो कि मुझसे पहले किसी और के लिए जायज नहीं था।’ (सहीह बुखारी, 1:7:301)।

सो, आतंक का उपयोग करना, और काफिरों का माल लूटना इस्लाम के राजनीतिक सिद्धांत का अंग है। क्योंकि इस्लाम पूरी तरह मुहम्मद के वचन और कर्म से बना है, जिन्होंने काफिरों पर अक्सर आकस्मिक, छिप कर अनेक हमले किए थे। अपने जीवन के अंतिम नौ वर्षों में मुहम्मद ने औसतन हर छः सप्ताह एक हिंसक घटना को अंजाम दिया। इसलिए मुसलमान द्वारा आतंक का उपयोग करना एक मजहबी कार्य है। वे इस का गर्व भी करते हैं कि काफिर उन से डरते हैं।

कोई भी वैज्ञानिक सर्वेक्षण पुष्टि करेगा कि लोकतांत्रिक देशों में इस्लामी माँगों के सामने झुकना, और मुस्लिम नेताओं की उग्र बयानबाजी और जबरदस्ती (जैसे सड़कों को घेर कर नमाज पढ़ना) को बर्दाश्त करना, मुख्यतः डर से होता है। यह डर राजनीति का है, रिलीजन का नहीं। वह राजनीति ही इस्लाम का प्रमुख रूप है।

मौलाना मदनी जैसे अधिकांश मुस्लिम नेताओं का अंदाज भी इस की पुष्टि करता है। वे मीडिया, सरकार, और सुप्रीम कोर्ट पर धौंस-धमकी की भाषा का प्रयोग मजे से करते हैं। देश का राष्ट्रगान ‘वन्दे मातरम्’ नहीं गाने के लिए मुसलमानों को ललकारते हैं। जबकि कहीं जबरिया ‘वन्दे मातरम्’ गवाने का, या ‘मुसलमानों पर गलत आरोप लगाने’ का उदाहरण नहीं देते। किसी ‘आतंकवादी घटना’ का ठोस उल्लेख नहीं करते, ‘जिसे जिहाद कह दिया’ जाता है।

यह सब साफ-साफ हुज्जत, धमकी और धौंस की भाषा है। जिहाद के स्थाई निशाने पर काफिरों को ही अपराध-बोध से भरना कि वही मुसलमानों पर ‘जुल्म’ कर रहे हैं। जैसे, विगत दशकों में कश्मीरी हिन्दुओं ने मुसलमानों पर ‘जुल्म’ किया था — जिस कारण मुसलमानों को जिहाद करके उन का खात्मा करना पड़ा।

इस स्थाई शिकायती, हुज्जती भंगिमा और उग्र बयानबाजी में कोई ईश्वरीय बात नहीं है। कोई रिलीजियस तत्व नहीं है। यह सब शुद्ध राजनीति है। आक्रामक राजनीति। मौलाना मदनी अभी मौखिक हिंसा का ही उपयोग कर रहे हैं जो जिहाद का ही रूप है। (साभार- जारी)


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